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घूंघट को परंपरा, संस्कार, इज्जत बताकर ढोते जाना दकियानूसी

व्यावहारिक बुद्धि भी यही कहती है कि रक्षित की जाने वाली वस्तु को ढांप दिया जाए लेकिन अगर किसी से अपना चेहरा छुपाकर बचाना पड़े तो सामने वाले व्यक्ति का कैसा सम्मान हुआ! कन्या अपने जनयिता और कुटुंब संबंधियों का सम्मान करती है, पर्दा नहीं करती। इसे समझना जरूरी है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jun 12, 2026

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प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो-फ्रीपिक)


डॉ. इंदिरा, स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार

आवृत इकाई रहस्य में रहती है और अनावृत प्रत्यक्ष होती है। रहस्य और प्रत्यक्ष दो शब्द भर नहीं हैं। घूंघट के संदर्भ में समाजशास्त्र और मनोवैज्ञानिक नजरिए से देखने पर दोनों के महीन भेद को समझा जा सकता है। एक दुविधामय और अविश्वास से भरा तो दूसरा स्पष्ट और आत्मविश्वास से पूर्ण। जिस समाज ने सौंदर्य के पैमाने तय किए, उसी ने इसे ढांपने के नियम भी गढ़े। आवरण में रहकर रूप पहेली बना रहता है। एक तनावपूर्ण कशमकश में देख लेने की अमिट चाह बनी रहती है। आवरण नहीं तो रहस्य भी नहीं। सब कुछ साक्षात है, स्पष्ट है। कोई व्याकुल ईप्सा भी नहीं।
मध्ययुग में सल्तनत-मुगल प्रभुत्व के दौरान घूंघट का अनुकरण शासक वर्ग से उच्च वर्गों में हुआ। लिहाजा इसे प्रतिष्ठित महिला की पहचान के रूप में चस्पा दिया गया और फिर क्रमिक रूप से अन्य वर्ग भी इसे अपनाने लगा। विचारणीय है कि राजनीतिक कारणों से यह प्रथा उत्तर भारत में ही पनपी। आक्रांताओं से बचाव हो या मरुस्थल जैसी विषम जलवायु में पहनावे का तौर-तरीका, यह सुविधा और सुरक्षा के लिए बनाई गई ढाल थी। लेकिन जब ढाल बोझ बन जाए तो उतार देना ही उचित है, लेकिन हो इसके विपरीत रहा है। शिक्षित और सभ्य समाज को इसका विरोध करना चाहिए, किंतु संदर्भ बदलकर इसका बचाव किया जाने लगा है। मिसाल के तौर पर अक्सर सुनने में आता है- 'घूंघट घुटन नहीं, सम्मान है।' वस्तुत: परंपरा और संस्कार के नाम पर इस कुप्रथा को जिंदा रखने की चेष्टा को समझा जा सकता है। वयोवृद्धों के प्रति आदर और कद्र दिखाने के लिए उनके समक्ष घूंघट खींचना रिवाज बन गया है। मध्यकाल में यह आचरण सुरक्षा के तौर पर किया जाता था। व्यावहारिक बुद्धि भी यही कहती है कि रक्षित की जाने वाली वस्तु को ढांप दिया जाए लेकिन अगर किसी से अपना चेहरा छुपाकर बचाना पड़े तो सामने वाले व्यक्ति का कैसा सम्मान हुआ! कन्या अपने जनयिता और कुटुंब संबंधियों का सम्मान करती है, पर्दा नहीं करती। इसे समझना जरूरी है। हिंदी साहित्य में रीतिकालीन कवियों ने घूंघट में छिपी नायिका के सौंदर्य का वर्णन किया है। किंतु प्रेम न पर्दे में कुंठित होता है और न अनावृत होकर उच्छृंखल। समकालीन सामाजिक, भौगोलिक और मनोवैज्ञानिक परिप्रेक्ष्य में घूंघट का औचित्य सिद्ध नहीं होता। घूंघट को परंपरा, संस्कार, गर्व, इज्जत जैसे नाम देकर ढोते जाना दकियानूसी है।
प्रतिष्ठा और संस्कार से जोडक़र घूंघट की सराहना करने के अभ्यस्त समाज में इसके विरोध का साहस रखने वाले मनीषी विशेष सम्मान के पात्र हैं। घूंघट की सामंती मनोवृत्ति को पहचानकर समाज को इससे बचना ही होगा।