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‘छोटू’ की स्वीकार्यता के पीछे ओझल होते बच्चों के अधिकार

हर वर्ष 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। वर्ष 2026 की आधिकारिक थीम है, ‘बाल श्रम को लाल कार्ड दिखाइए, बच्चों को उनका बचपन और वयस्कों को सम्मानजनक रोजगार दिलाइए।’ थीम स्पष्ट करती है कि बाल श्रम का समाधान केवल बच्चों को काम से हटाने में नहीं, बल्कि उनके परिवारों को आर्थिक सुरक्षा और वयस्कों को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने में निहित है।

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जयपुर

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Opinion Desk

Jun 12, 2026

Child Labour

बालश्रम पर एक्शन फोटो। एआइ

उमा व्यास, स्वतंत्र लेखिका एवं स्तंभकार

चौराहे पर लाल बत्ती होते ही कुछ बच्चे हाथों में गुब्बारे या खिलौने लेकर वाहनों की ओर बढ़ जाते हैं। कोई गाडिय़ों के शीशे साफ करता दिखाई देता है, तो कोई भीख मांगता है। चाय की थड़ी पर काम करता बच्चा, ढाबे पर बर्तन साफ करता किशोर या किसी मरम्मत की दुकान पर काम सीखता कोई अन्य मासूम, ये दृश्य हमारे समाज में इतने आम हो चुके हैं कि अक्सर हम इनके पीछे छिपे गंभीर प्रश्नों पर विचार ही नहीं करते। जबकि इन बच्चों की सही जगह विद्यालय, खेल का मैदान और एक सुरक्षित बचपन है।
हर वर्ष 12 जून को विश्व बाल श्रम निषेध दिवस मनाया जाता है। यह समस्या केवल कारखानों तक सीमित नहीं है। वैश्विक स्तर पर लगभग 61 प्रतिशत बाल श्रमिक कृषि क्षेत्र में कार्यरत हैं, जबकि शेष बच्चे सेवा और औद्योगिक क्षेत्रों से जुड़े हैं। जब इन बच्चों के परिवारों से पूछा जाता है कि बच्चा विद्यालय क्यों नहीं जाता, तो अक्सर जवाब मिलता है, ‘घर की मजबूरी है’ या ‘यही हमारा सहारा है।’ इसी संदर्भ में एक बड़ा प्रश्न हमारी मानसिकता से भी जुड़ा है। चाय की थडिय़ों, ढाबों और दुकानों पर काम करने वाले बच्चों को ‘छोटू’ कहकर पुकारा जाता है। यह शब्द इतना आम हो चुका है कि इसके पीछे छिपे बच्चे की परिस्थितियां और उसके अधिकार हमारी नजरों से ओझल हो जाते हैं। वर्ष 2026 की आधिकारिक थीम है, ‘बाल श्रम को लाल कार्ड दिखाइए, बच्चों को उनका बचपन और वयस्कों को सम्मानजनक रोजगार दिलाइए।’ थीम स्पष्ट करती है कि बाल श्रम का समाधान केवल बच्चों को काम से हटाने में नहीं, बल्कि उनके परिवारों को आर्थिक सुरक्षा और वयस्कों को सम्मानजनक रोजगार उपलब्ध कराने में निहित है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन और यूनिसेफ की संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार वर्तमान में विश्व के लगभग 13.8 करोड़ बच्चे बाल श्रम में संलग्न हैं। इनमें से लगभग 5.4 करोड़ बच्चे ऐसे कार्यों में लगे हैं जो उनके स्वास्थ्य, सुरक्षा और विकास के लिए खतरनाक हैं। हालांकि वर्ष 2020 से 2024 के बीच वैश्विक स्तर पर बाल श्रमिकों की संख्या में लगभग 2.2 करोड़ की कमी आई है, फिर भी चुनौती गंभीर बनी हुई है। संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य 8.7 के तहत वर्ष 2025 तक बाल श्रम के सभी रूपों को समाप्त करने का लक्ष्य रखा गया था, किंतु इसे निर्धारित समय सीमा के भीतर प्राप्त नहीं किया जा सका।
भारत में वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 5 से 14 वर्ष आयु वर्ग के लगभग 1.01 करोड़ बच्चे किसी न किसी प्रकार के श्रम में लगे हुए थे। विश्व बाल श्रम निषेध दिवस पर आत्ममंथन यही है कि क्या हम एक ऐसे समाज का निर्माण कर पा रहे हैं जहां बच्चों की पहचान उनके श्रम से नहीं, बल्कि उनके सपनों से हो। जब तक हम बच्चों को केवल ‘छोटू’ के रूप में देखते रहेंगे, बाल श्रम के विरुद्ध हमारी लड़ाई अधूरी रहेगी।