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जलवायु परिवर्तन एक गंभीर वैश्विक स्वास्थ्य संकट

जलवायु परिर्वतन एक गंभीर समस्या है लेकिन सामूहिक साझेदारी से हर स्तर पर छोटे-छोटे बदलाव करके भी हम एक बड़ा अंतर ला सकते हैं, जरूरत है तो सिर्फ दृढ़ इच्छा शक्ति की।

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भारत

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Opinion Desk

Jun 10, 2026

jalvayu parivartan

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डॉ. पंकज जैन, वरिष्ठ चिकित्सक

पिछले कुछ दशकों में यह बात फिर से जोर पकडऩे लगी है कि स्वास्थ्य एक मौलिक मानव अधिकार है और एक विश्व व्यापी सामाजिक लक्ष्य भी है जो बुनियादी मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति और जीवन की बेहतर गुणवत्ता व खुशहाली के लिए अति आवश्यक है। मनुष्य के स्वास्थ्य की कुंजी काफी हद तक उसके पर्यावरण में निहित है। वास्तव में मनुष्य की अधिकांश अस्वस्थता का कारण जलवायु परिवर्तन ही है जिसके चलते मानव प्रजाति गर्मी, बाढ़, सूखा, तूफान एवं चरम मौसम की मार झेलने को मजबूर है। ये घटनाएं आगे चलकर बीमारी, चोट और यहां तक कि मानव की अकाल मृत्यु का कारण भी बन सकती है। जलवायु परिवर्तन के चलते प्रतिकूल पर्यावरणीय कारक जैसे जल प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, वायु प्रदूषण, आवास की खराब स्थितियां, वेक्टर जनित बीमारियां मनुष्य के स्वास्थ्य के लिए लगातार खतरा पैदा कर रहे है।

बदल रहा है मौसम का पैटर्न
अक्सर मनुष्य ही शहरीकरण, औद्योगिकीकरण एवं अन्य मानवीय गतिविधियों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार है। ऊर्जा एवं परिवहन के लिए मानव प्रजाति द्वारा जीवाश्म ईंधन जैसे कोयला, तेल, गैस आदि का अंधाधुंध दोहन किया जा रहा है। यूनाइटेड नेशंस की एक रिपोर्ट के अनुसार जीवाश्म ईंधन वैश्विक जलवायु परिवर्तन में अब तक का सबसे बड़े योगदानकर्ता है जो वैश्विक ग्रीन हाऊस गैस उत्सर्जन के 75 प्रतिशत से अधिक और सभी कार्बन डाइऑक्साइड उत्सर्जन के लगभग 90 प्रतिशत के लिए जिम्मेदार है।
इसके चलते ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन होता है। यह गर्म तापमान आगे चलकर मौसम के पैटर्न को बदल रहा है और प्रकृति के सामान्य संतुलन में अड़चन पैदा कर रहा है जो मनुष्यों एवं अन्य जीवों के लिए कई जोखिम पैदा करता है। लंबे समय तक गर्मी के संपर्क में रहने से थकावट, हीट स्ट्रोक, किडनी व हृदय रोग और गर्भावस्था संबंधी समस्याएं हो सकती हैं।

जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार मानवीय गतिविधियां
जलवायु परिवर्तन हेतु जिम्मेदार अन्य मानवीय गतिविधियों में वनों की कटाई एवं औद्योगिकीकरण शामिल है। गर्म तापमान की परिस्थितियां टिक्स व मच्छरों को पनपने में मदद करती है जो कीट और टिक्स संबंधी रोगों में वृद्धि करती है, जिसमे डेंगू, जीका, चिकन गुनिया, वेस्ट नाइल वायरस व मलेरिया मुख्य रूप से शामिल हैं। पानी, भोजन एवं हवा की गुणवता प्रभावित होने से जठरांत्र संबंधी जीवाणु जनित बीमारियों की संभावना बढ़ जाती है। जंगल की आग और सूखे से उत्पन्न धूल वायु की गुणवत्ता घटाती है जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से हृदय रोग, स्ट्रोक, अस्थमा, एलर्जी एवं अन्य श्वास संबंधी रोग, गर्भावस्था संबंधी जटिलताएं और कुछ कैंसर के लिए जिम्मेदार है। जलवायु परिवर्तन के तात्कालिक व दीर्घकालिक प्रभाव मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी खतरा पैदा करते हैं। जंगल में आग, तूफान, बाढ जैसी प्राकृतिक आपदाएं मानव को अस्थिरता, भय, खौफ की भावनाओं के साथ आर्थिक नुकसान भी पहुंचाती है जो कहीं ना कही चिंता, अवसाद एवं तनाव को बढ़ाती है।

प्लास्टिक इस्तेमाल का न कहें
स्वास्थ्य संबंधी खराब शारीरिक व मानसिक स्थितियां लोगों व समुदायों के लिए बड़ी चिकित्सा लागत पैदा करती है। साथ ही, कार्य स्थल पर अनुपस्थिति भी बढ़ाती है जो अंतत: किसी भी देश की अर्थ व्यवस्था के लिए घातक साबित हो सकती है। जलवायु परिवर्तन के इन प्रतिकूल प्रभावों से पूरे विश्व की बचाने के लिए अथवा इन्हें कम करने के लिए हमें शुरू से ही व्यक्तिगत, निजी संस्थानों एवं सरकारी सभी स्तर पर मिलकर काम करना होगा। व्यक्तिगत स्तर पर हमें बिजली के उपकरणो का कम इस्तेमाल एवं कम बिजली खपत वाले उपकरणों को प्राथमिकता देकर ऊर्जा के उपभोग में कटौती करनी होगी। अपने घरों की छत व दीवारों को अच्छी तरह से इंसुलेट करना होगा। सभी यह ठान लें कि कार का इस्तेमाल कम करें और सार्वजनिक परिवहन, कार पूल, साइकिल या पैदल चलने को प्राथमिकता दें। इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दे। विमान यात्रा को कम करें। कचरा कम से कम करें और उसे रिसाइकल करने की कोशिश करें। प्लास्टिक इस्तेमाल का न कहें। अधिक कार्बन अवशोषित करने के लिए प्रकृति को पुनस्र्थापित करें और ज्यादा से ज्यादा पेड़ लगाएं एवं उनके बड़ा होने तक पूरी देखभाल करें। पानी की बर्बादी रोकें।

सामूहिक साझेदारी आवश्यक
समुदाय एवं सरकार के स्तर पर आवश्यकता है कि नवीकरणीय ऊर्जा जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, लहर, ज्वार और भूतापीय ऊर्जा में निवेश बढ़े एवं जीवाश्म ईधन पर निर्भरता कम कर उसे जमीन में ही रहने दें। औद्योगिक प्रक्रियाओं में ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन कम करने की पहल हो। वनरोपण और वनीकरण को बढ़ावा दिया जाए। जलवायु परिर्वतन के लिए बनी राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय नीतियों की कड़ाई से पालना सुनिश्चित हो। लोगों को जलवायु परिवर्तन एवं इसके दुष्प्रभावों के बारे में जागरूक करने के लिए पर्यावरण शिक्षा को बढ़ावा दिया जाए। जलवायु परिर्वतन एक गंभीर समस्या है लेकिन सामूहिक साझेदारी से हर स्तर पर छोटे-छोटे बदलाव करके भी हम एक बड़ा अंतर ला सकते हैं, जरूरत है तो सिर्फ दृढ़ इच्छा शक्ति की।