
fire Security
डॉ. रिपुन्जय सिंह
पूर्व सदस्य, राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड
भारत के शहर विकास, आधुनिकता और आर्थिक प्रगति के प्रतीक माने जाते हैं। ऊंची-ऊंची इमारतें, बहुमंजिला आवासीय परिसर, स्मार्ट सिटी परियोजनाएं और विस्तृत शहरी बुनियादी ढांचा विकास की कहानी कहते हैं। किंतु इन चमकदार उपलब्धियों के पीछे एक ऐसी वास्तविकता भी छिपी है, जो समय-समय पर भयावह अग्निकांडों के रूप में सामने आती है। हाल के वर्षों में देश के विभिन्न शहरों में आवासीय इमारतों में लगी आग ने एक बार फिर शहरी प्रशासन की उस गंभीर कमजोरी को उजागर किया है, जिसे हम बार-बार अनदेखा करते रहे हैं।
हर बड़ी आग के बाद लगभग एक जैसी तस्वीर दिखाई देती है। मासूम लोगों की मौत, परिवारों का उजडऩा, करोड़ों रुपए की संपत्ति का नुकसान, प्रशासनिक संवेदनाएं, जांच समितियों की घोषणा, मुआवजे की घोषणाएं और भविष्य में सख्त कार्रवाई के आश्वासन। लेकिन कुछ दिनों बाद जब मीडिया का ध्यान किसी अन्य मुद्दे की ओर चला जाता है, तब इस त्रासदी के मूल कारण भी चर्चा से बाहर हो जाते हैं। यही कारण है कि ऐसी घटनाएं बार-बार दोहराई जाती हैं।
हाल ही में सामने आए आंकड़े स्थिति की गंभीरता को और स्पष्ट करते हैं। जून 2025 में जारी जानकारी के अनुसार, महानगरों और बड़े शहरों की लगभग 90 प्रतिशत कार्यरत सहकारी समूह आवासीय सोसायटियों के पास वैध अग्नि सुरक्षा अनापत्ति प्रमाण-पत्र नहीं है। इसका अर्थ है कि लाखों लोग ऐसी इमारतों में रह रहे हैं जो संभवत: न्यूनतम अग्नि सुरक्षा मानकों को भी पूरा नहीं करतीं। तेजी से ऊध्र्वाधर विस्तार कर रहे भारतीय शहरों के लिए यह एक अत्यंत चिंताजनक संकेत है। यह समस्या केवल कागजी औपचारिकताओं तक सीमित नहीं है। अग्नि सुरक्षा प्रमाण-पत्र किसी फाइल पर लगी मोहर मात्र नहीं होता। यह इस बात का प्रमाण होता है कि भवन में कार्यशील फायर अलार्म, स्प्रिंकलर सिस्टम, आपातकालीन निकास मार्ग, अग्निरोधक सामग्री, पर्याप्त जल भंडारण और अग्निशमन वाहनों के लिए सुगम पहुंच उपलब्ध है। जब ये व्यवस्थाएं अनुपस्थित हों या उनका रखरखाव न किया जाए, तो किसी भी दुर्घटना का परिणाम विनाशकारी हो सकता है।
सुरक्षा मानकों से समझौता सामान्य बात
कई शहरों की स्थिति वास्तव में देश के अधिकांश शहरों की स्थिति का प्रतिबिंब है। तीव्र शहरीकरण, बढ़ती भूमि कीमतें, आवास की बढ़ती मांग, सीमित शहरी संसाधन और कमजोर प्रवर्तन तंत्र ने मिलकर ऐसा वातावरण बना दिया है जिसमें सुरक्षा मानकों से समझौता सामान्य बात बन गई है। नियम मौजूद हैं, कानून भी हैं, दिशा-निर्देश भी हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अक्सर दिखाई नहीं देता। यही वह खतरनाक अंतर है जो नीति और व्यवहार के बीच मौजूद है।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि आग लगने के जोखिम न तो अज्ञात हैं और न ही अप्रत्याशित। अग्निशमन विभाग, नगर नियोजक, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन और स्थानीय निकाय वर्षों से संभावित खतरों की ओर संकेत करते रहे हैं। बंद या अवरूद्ध सीढिय़ां, आपातकालीन निकास मार्गों पर अतिक्रमण, खराब अग्निशामक यंत्र, अग्निशमन उपकरणों का अपर्याप्त रखरखाव, भवनों में अनधिकृत परिवर्तन, अवैध पार्किंग तथा जर्जर विद्युत व्यवस्था जैसी समस्याएं लगभग हर शहर में देखी जा सकती हैं। कई आवासीय परियोजनाएं निर्माण के समय आवश्यक स्वीकृतियां प्राप्त कर लेती हैं, लेकिन समय के साथ सुरक्षा मानकों का पालन कमजोर पड़ जाता है। उपकरण खराब हो जाते हैं, सुरक्षा ऑडिट केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं और नियमित निरीक्षण अनियमित हो जाते हैं। कई बार स्वयं निवासी भी अनजाने में खतरे को बढ़ा देते हैं। सामान्य क्षेत्रों को भंडारण स्थल में बदल देना, अतिरिक्त निर्माण कर लेना, ज्वलनशील पदार्थों का संग्रहण करना, बिजली की अनधिकृत वायरिंग कराना अथवा सुरक्षा अभ्यासों की उपेक्षा करना आग के जोखिम को कई गुना बढ़ा देता है।
पुरानी आवासीय सोसायटियों में अधिक गंभीर समस्या
समस्या विशेष रूप से उन पुरानी आवासीय सोसायटियों में अधिक गंभीर है, जिनका निर्माण दशकों पहले हुआ था। उस समय न तो जनसंख्या घनत्व इतना अधिक था और न ही अग्नि सुरक्षा मानक इतने कठोर। आज वही इमारतें कहीं अधिक लोगों, वाहनों, विद्युत उपकरणों और ऊर्जा खपत का बोझ उठा रही हैं। यदि इन भवनों का वैज्ञानिक तरीके से पुनरोद्धार और आधुनिकीकरण नहीं किया गया, तो वे भविष्य में बड़े हादसों का कारण बन सकते हैं। शहरी अग्निकांड सामान्यत: किसी एक कारण से नहीं होते। वे कई स्तरों की विफलताओं का संयुक्त परिणाम होते हैं। विद्युत शॉर्ट सर्किट, ओवरलोड ट्रांसफॉर्मर, खराब वायरिंग, गैस रिसाव, ज्वलनशील निर्माण सामग्री, रखरखाव की कमी और आपातकालीन प्रतिक्रिया में देरी मिलकर एक छोटी सी चिंगारी को बड़े हादसे में बदल देते हैं। सबसे दुखद बात यह है कि इन कारणों में से अधिकांश को समय रहते रोका जा सकता था ।
आपदा रोकथाम पर अपेक्षित ध्यान नहीं
आग लगने की घटना केवल जान-माल की तत्काल हानि तक सीमित नहीं रहती। यह परिवारों की वर्षों की कमाई को समाप्त कर देती है, लोगों को बेघर बना देती है और मानसिक आघात छोड़ जाती है। बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांग व्यक्तियों के लिए ऐसी परिस्थितियां और भी अधिक खतरनाक होती हैं। कई परिवार वर्षों तक आर्थिक और मानसिक संकट से उबर नहीं पाते। इसके बावजूद भारत में शहरी आपदाओं के प्रति हमारी प्रतिक्रिया आज भी मुख्यत: प्रतिक्रियात्मक है। दुर्घटना होने के बाद सक्रियता दिखाई जाती है, लेकिन उससे पहले नहीं। मुआवजे की घोषणा कर देना अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन दुर्घटना को रोकने के लिए निरंतर निवेश, निगरानी और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है। मुआवजा किसी खोए हुए जीवन को वापस नहीं ला सकता। वह किसी बच्चे के माता-पिता, किसी परिवार के मुखिया या किसी बुजुर्ग की सुरक्षा का विकल्प नहीं हो सकता। यह स्थिति हमारे शासन तंत्र की एक गंभीर प्रवृत्ति को उजागर करती है, जहां आपदा प्रबंधन पर तो ध्यान दिया जाता है, लेकिन आपदा रोकथाम पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जाता। जबकि वास्तविक आवश्यकता रोकथाम करने की है। इसके लिए दीर्घकालिक निवेश, संस्थागत समन्वय, राजनीतिक प्रतिबद्धता और नागरिक सहभागिता अनिवार्य है।
अग्नि सुरक्षा नियम तभी सार्थक हैं जब उनका पालन सुनिश्चित हो
सुधार की शुरुआत प्रभावी प्रवर्तन से होनी चाहिए। अग्नि सुरक्षा नियम तभी सार्थक हैं जब उनका पालन सुनिश्चित किया जाए। सभी बहुमंजिला आवासीय परिसरों, विशेषकर पुरानी सोसायटियों का नियमित निरीक्षण होना चाहिए। केवल स्वयं-प्रमाणन या कागजी रिपोर्टों पर निर्भर रहने के बजाय स्वतंत्र सुरक्षा ऑडिट को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। तकनीक इस दिशा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अग्नि सुरक्षा प्रमाण-पत्रों की स्थिति, निरीक्षण रिपोर्ट, उपकरणों के रखरखाव और अनुपालन की जानकारी सार्वजनिक की जा सकती है। यदि नागरिकों को यह जानकारी आसानी से उपलब्ध हो, तो पारदर्शिता और जवाबदेही दोनों बढ़ेंगी। सार्वजनिक निगरानी स्वयं एक प्रभावी दबाव तंत्र का कार्य कर सकती है। साथ ही, शहरी नियोजन को भी जोखिम-संवेदनशील बनाना होगा। अनेक आवासीय क्षेत्रों की आंतरिक सडक़ें इतनी संकरी हैं कि अग्निशमन वाहन समय पर घटनास्थल तक पहुंच ही नहीं पाते। अनधिकृत निर्माण, अव्यवस्थित पार्किंग और खुले स्थानों की कमी आपदा के समय स्थिति को और जटिल बना देती है। आग लगने की स्थिति में कुछ मिनटों की देरी भी दर्जनों जानें ले सकती है।
भविष्य की शहरी परियोजनाओं में अग्नि जोखिम मूल्यांकन को स्वीकृति प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाना चाहिए। प्रत्येक आवासीय परिसर में पर्याप्त चौड़ी सडक़ें, आपातकालीन निकासी मार्ग, जल स्रोत और अग्निशमन वाहनों के लिए पहुंच सुनिश्चित की जानी चाहिए। पुराने क्षेत्रों में भी चरणबद्ध तरीके से जोखिम कम करने वाले सुधार किए जा सकते हैं। नागरिक सहभागिता इस पूरी प्रक्रिया का महत्त्वपूर्ण आधार है। अग्नि सुरक्षा को केवल सरकार की जिम्मेदारी मानना पर्याप्त नहीं होगा। आवासीय सोसायटियों और रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों को तैयारी और जागरूकता की संस्कृति विकसित करनी होगी। नियमित फायर ड्रिल, आपातकालीन प्रशिक्षण, सुरक्षा जागरूकता अभियान और उपकरणों का रखरखाव सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहिए।
अग्नि सुरक्षा शिक्षा को बढ़ावा देने की आवश्यकता
आज भी बड़ी संख्या में लोग यह नहीं जानते कि आग लगने पर सबसे सुरक्षित निकास मार्ग कौनसा है, अग्निशामक यंत्र का उपयोग कैसे किया जाता है या धुएं से भरे वातावरण में स्वयं को कैसे सुरक्षित रखा जाए। विद्यालयों, सामुदायिक केंद्रों और आवासीय परिसरों में अग्नि सुरक्षा शिक्षा को बढ़ावा देना समय की आवश्यकता है। बीमा व्यवस्था को भी मजबूत बनाने की आवश्यकता है। यद्यपि बीमा आग को रोक नहीं सकता, लेकिन वह आपदा के बाद पुनर्वास और पुनर्निर्माण में महत्त्वपूर्ण सहायता प्रदान कर सकता है। सरकार, बीमा कंपनियां और आवासीय संस्थाएं मिलकर व्यापक अग्नि बीमा कवरेज को प्रोत्साहित कर सकती हैं। अग्नि सुरक्षा केवल अग्निशमन विभाग का विषय नहीं है। इसमें नगर निगम, विकास प्राधिकरण, विद्युत विभाग, आवास नियामक, शहरी नियोजन एजेंसियां और आपातकालीन सेवाएं सभी शामिल हैं। जब जिम्मेदारियां बिखरी हुई होती हैं, तो जवाबदेही भी कमजोर हो जाती है। इसलिए स्पष्ट भूमिकाओं और जवाबदेही के साथ एक समन्वित ढांचे की आवश्यकता है।
आवश्यकता सुरक्षा को विकास की परिभाषा का हिस्सा बनाने की
निजी क्षेत्र, विशेषकर बिल्डरों और डवलपर्स की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। परियोजना पूरी होने और स्वीकृति प्राप्त कर लेने के बाद उनकी जिम्मेदारी समाप्त नहीं होनी चाहिए। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि शुरुआती वर्षों में सुरक्षा अवसंरचना पूरी तरह कार्यशील रहे और निवासी समितियों को उसके रखरखाव का उचित प्रशिक्षण मिले। नीति-निर्माताओं को यह भी समझना होगा कि अग्नि सुरक्षा सामाजिक न्याय का विषय है। निम्न आय वर्ग की बस्तियां, अनौपचारिक आवासीय क्षेत्र और पुराने भवन अपेक्षाकृत अधिक जोखिम में होते हैं। संसाधनों की कमी के कारण वे सुरक्षा उपायों पर पर्याप्त निवेश नहीं कर पाते। इसलिए किसी भी व्यापक अग्नि सुरक्षा नीति में कमजोर और संवेदनशील समुदायों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। आज आवश्यकता केवल नियम बनाने की नहीं, बल्कि सुरक्षा को विकास की परिभाषा का हिस्सा बनाने की है। किसी शहर की प्रगति केवल उसकी ऊंची इमारतों, चौड़ी सडक़ों या आर्थिक गतिविधियों से नहीं मापी जाती। उसका वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि वह अपने नागरिकों के जीवन और सुरक्षा की कितनी रक्षा कर सकता है। जब तक अग्नि जोखिमों के मूल कारणों को नियमित निरीक्षण, सुरक्षित शहरी नियोजन, तकनीकी निगरानी, नागरिक सहभागिता और नियमों के कठोर क्रियान्वयन के माध्यम से संबोधित नहीं किया जाएगा, तब तक ऐसी त्रासदियां बार-बार होती रहेंगी। लोग मरते रहेंगे, परिवार उजड़ते रहेंगे और मुआवज़े की घोषणाएं होती रहेंगी। अग्नि सुरक्षा कोई विलासिता नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का मौलिक अधिकार है। और जब तक यह अधिकार हर आवासीय भवन, हर सोसायटी और हर शहर में सुनिश्चित नहीं होता, तब तक हमारे शहरी विकास की कहानी अधूरी रहेगी।
Published on:
11 Jun 2026 07:45 pm
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