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श्मशान घाट में संवेदनहीनता परिजनों के लिए दूसरा आघात

परिवारों, समुदायों और सामाजिक संस्थाओं को यह समझना होगा कि मृत्यु के बाद के कुछ दिन संवेदना के लिए होने चाहिए, सौदेबाजी के लिए नहीं। उत्तराधिकार एक यक्ष प्रश्न है लेकिन वे कुछ दिन प्रतीक्षा कर सकते हैं। किसी टूटे हुए मन को संभालने का अवसर यदि निकल जाए, तो वह वापस नहीं आता।

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भारत

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Opinion Desk

Jun 10, 2026

shamshan ghat

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लोकेश त्रिपाठी, वरिष्ठ पत्रकार व स्तंभकार

श्मशान घाट पर किसी अपने की चिता अभी पूरी तरह बुझी भी न थी कि कुछ तथाकथित अपने घर जाने की जल्दी में दिख रहे थे। घाट से लौटते समय परिवार के कुछ सदस्य गहरे शोक में डूबे थे, जबकि वही तथाकथित अपने संपत्ति, बैंक खातों और उत्तराधिकार की चर्चा में व्यस्त हो चुके थे। जिस व्यक्ति ने कुछ घंटे पहले अपने प्रियजन को मुखाग्नि दी थी, उसके लिए यह दूसरा आघात था। पहला मृत्यु का और दूसरा संवेदनहीनता का। मृत्यु जीवन का एक ऐसा सत्य है जिसके सामने मनुष्य स्वयं को सबसे अधिक असहाय अनुभव करता है। किसी प्रियजन के निधन के बाद शोकाकुल परिवार केवल एक व्यक्ति को नहीं खोता, बल्कि अपने जीवन के एक हिस्से, अनेक स्मृतियों और भावनात्मक सहारे को भी खो देता है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार निकट संबंधी की मृत्यु व्यक्ति के जीवन की सबसे तनावपूर्ण और आघातकारी घटनाओं में से एक होती है। ऐसे समय में परिवार को सलाह, तर्क या अधिकारों की नहीं, बल्कि सहानुभूति, धैर्य और मानवीय उपस्थिति की आवश्यकता होती है।

आर्थिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न परिवारों में रिश्तों पर हावी
भारतीय समाज की विशेषता यह रही है कि संकट की घड़ी में परिवार और समुदाय साथ खड़े होते रहे हैं। आज भी लाखों लोग शोकग्रस्त परिवारों की सहायता करते हैं। अंतिम संस्कार की व्यवस्थाएं संभालते हैं, आर्थिक और भावनात्मक सहयोग प्रदान करते हैं तथा बिना किसी अपेक्षा के उनके दुख में सहभागी बनते हैं। यही हमारी सामाजिक संस्कृति की सबसे बड़ी शक्ति है लेकिन इसके समानांतर एक दूसरा यथार्थ भी उभर रहा है। मृत्यु के तुरंत बाद उत्तराधिकार, संपत्ति और आर्थिक अधिकारों से जुड़े प्रश्न कई परिवारों में रिश्तों पर हावी होते दिखाई देते हैं। कभी-कभी सांत्वना के लिए आए लोगों की बातचीत बहुत जल्दी बैंक खातों, भूमि, मकान, वसीयत और हिस्सेदारी तक पहुंच जाती है। दुखद यह नहीं है कि ये प्रश्न मौजूद हैं। दुखद यह है कि कई बार ये प्रश्न शोक से भी अधिक महत्त्वपूर्ण बना दिए जाते हैं।

भावनात्मक रूप से तोड़ सकती अधिकारों की बहस
यह परिवर्तन अचानक नहीं आया है। पिछले कुछ दशकों में भारतीय समाज ने तीव्र आर्थिक और सामाजिक बदलाव देखे हैं। शहरीकरण बढ़ा है, संयुक्त परिवारों का स्थान छोटे परिवारों ने लिया है और भूमि तथा संपत्तियों का आर्थिक मूल्य कई गुना बढ़ा है। परिणामस्वरूप, पारिवारिक संबंधों के भीतर आर्थिक हितों का महत्त्व भी बढ़ा है। जहां कभी संपत्ति परिवार की सामूहिक विरासत मानी जाती थी, वहीं अब वह कई बार व्यक्तिगत अधिकार और आर्थिक अवसर के रूप में देखी जाने लगी है। निस्संदेह, यह भी सत्य है कि मृत्यु के बाद कुछ कानूनी और आर्थिक प्रक्रियाएं अनिवार्य होती हैं। बैंक खाते, बीमा दावे, ऋण, उत्तराधिकार प्रमाण-पत्र और अन्य प्रशासनिक कार्य समय पर पूरे करने पड़ते हैं। इसलिए संपत्ति या अधिकारों की चर्चा अपने-आप में अनुचित नहीं है। समस्या इन विषयों के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उनके समय, भाषा और संवेदनशीलता में है। जब किसी व्यक्ति का दु:ख अभी ताज़ा हो,तब अधिकारों की बहस उसे भावनात्मक रूप से और अधिक तोड़ सकती है।

शोक की संस्कृति को पुन: मानवीय बनाएं
विडंबना यह है कि हम मृत व्यक्ति की आत्मा की शांति के लिए धार्मिक अनुष्ठानों का पूरा ध्यान रखते हैं लेकिन उसके पीछे छूटे परिवार की मानसिक शांति की उपेक्षा कर बैठते हैं। हम कर्मकांडों की सूक्ष्मताओं पर घंटों चर्चा कर सकते हैं लेकिन कई बार यह भूल जाते हैं कि शोकाकुल परिवार को सबसे अधिक आवश्यकता मौन सहारे की होती है। किसी दु:खी व्यक्ति के पास बैठ जाना, उसकी बात सुन लेना या केवल उसके साथ खड़े रहना भी कई बार किसी बड़े उपदेश से अधिक मूल्यवान होता है। दरअसल, श्मशान घाट केवल मृत्यु का स्थल नहीं है। वह समाज का दर्पण भी है। वहां मनुष्य का वास्तविक चरित्र सामने आता है। कोई व्यक्ति वहां सेवा और सहानुभूति का परिचय देता है, तो कोई अवसर और लाभ की संभावनाएं खोजने लगता है। यही कारण है कि श्मशान का अनुभव अक्सर लोगों की रिश्तों के प्रति समझ को बदल देता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम शोक की संस्कृति को पुन: मानवीय बनाएं। परिवारों, समुदायों और सामाजिक संस्थाओं को यह समझना होगा कि मृत्यु के बाद के कुछ दिन संवेदना के लिए होने चाहिए, सौदेबाजी के लिए नहीं। उत्तराधिकार एक यक्ष प्रश्न है लेकिन वे कुछ दिन प्रतीक्षा कर सकते हैं। किसी टूटे हुए मन को संभालने का अवसर यदि निकल जाए, तो वह वापस नहीं आता। किसी व्यक्ति की मृत्यु केवल उसके जीवन का अंत नहीं होती; वह पीछे छूटे लोगों के जीवन में एक कठिन अध्याय की शुरुआत भी होती है। ऐसे समय में हमारा व्यवहार ही यह तय करता है कि हम एक संवेदनशील समाज का हिस्सा हैं या केवल हितों से संचालित समूह का। आखिरकार, मृतक की अंतिम यात्रा श्मशान में समाप्त हो जाती है लेकिन जीवितों की नैतिक परीक्षा वहीं से शुरू होती है। चिता की अग्नि कुछ घंटों में बुझ जाती है लेकिन उस दिन दिखाई गई संवेदनशीलता या संवेदनहीनता परिवार की स्मृति में जीवनभर दर्ज रहती है।