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हर्ष काबरा, वरिष्ठ पत्रकार एवं विश्लेषक
पर्यावरणवाद की एक धारा प्रकृति को आधुनिकता से पृथक एक नैतिक आश्रयभूमि के रूप में देखती आई है। इस दृष्टिकोण ने पर्यावरण के प्रति जागरूकता तो बढ़ाई है, लेकिन उसे आर्थिक यथार्थ से काटकर संरक्षण को कठिन बना दिया है। दिलचस्प बात यह है कि ‘इकोलॉजी’ और ‘इकोनॉमिक्स’ दोनों ही शब्दों की उत्पत्ति यूनानी शब्द ‘ओइकोस’ से हुई है, जिसका अर्थ है ‘घर’ या ‘परिवेश’। एक इस घर को समझने का माध्यम है, तो दूसरा इसके प्रबंधन का विज्ञान। ऐसे में प्रकृति और आर्थिक विकास को एक-दूसरे का दुश्मन मान लेना नासमझी है। जैव विविधता संरक्षण के लिए केवल कानून और सरकारी बजटीय आवंटन पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए बड़े निजी निवेश, बीमा और बाजार के ऐसे तरीकों की दरकार है, जो पर्यावरण की रक्षा करने वालों को पुरस्कृत करें और नुकसान पहुंचाने वालों को दंडित। सही दिशा मिलने पर पूंजीवाद विनाश की कीमत तय कर प्रकृति को भौतिक समृद्धि की बुनियाद के तौर पर वैधता दिला सकता है।
निजी क्षेत्र की भागीदारी और मजबूत जवाबदेही भी जरूरी
भारत के संदर्भ में यह और भी महत्त्वपूर्ण है। विश्व के 17 सर्वाधिक जैव-विविध देशों में शामिल भारत हिमालय, पश्चिमी घाट, भारत-बर्मा क्षेत्र और निकोबार द्वीप जैसे अतिसंवेदनशील पारितंत्रों का घर है। हालिया अध्ययनों ने पूर्वी तट और गुजरात में फैले मैंग्रोव तथा कार्बन सोखने वाले तटीय पारितंत्रों के पर्यावरणीय और आर्थिक महत्त्व को रेखांकित किया है। भारत में पर्यटन, मत्स्य पालन, जलविद्युत, कृषि यहां तक कि जलवायु आपदाओं से लडऩे की शहरी क्षमता भी इन पारितंत्रों पर टिकी है। भारत आज भी जैव विविधता को प्रशासनिक और विनियामक नजरिए से देखता है, लेकिन देश में जैव-विविधता बचाने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी और मजबूत जवाबदेही भी जरूरी हैं।
भारत को करनी चाहिए इस बदलाव की अगुवाई
भारत को मुख्यत: दो कारणों से इस बदलाव की अगुवाई करनी चाहिए। पहला कारण घरेलू है। भारत के पास विशाल प्राकृतिक संपदा है, लेकिन वह गंभीर पर्यावरणीय संकटों से भी जूझ रहा है। हिमालय में जंगलों का क्षरण, प्रायद्वीपीय भारत में पानी की कमी, तटीय कटाव, जानलेवा लू, जंगलों की आग, पश्चिमी घाट में जैव-विविधता का नुकसान और मैंग्रोव तथा आर्द्रभूमियों पर बढ़ता शहरी दबाव। कई क्षेत्रों में समस्या केवल संसाधनों के अधिक दोहन की नहीं, बल्कि उपेक्षा और कमजोर स्थानीय अर्थव्यवस्था की भी है। देश का 36 प्रतिशत से अधिक वन क्षेत्र आग-प्रवण है। संकटग्रस्त कृषि क्षेत्रों से पलायन बढ़ता है और मिट्टी कमजोर होती जाती है। कई संवेदनशील क्षेत्रों में मजबूत स्थानीय अर्थव्यवस्था के अभाव में जैव-विविधता और संरक्षण दोनों कमजोर पड़ते हैं। पश्चिमी घाट और हिमालय पर 2025 के वैज्ञानिक अध्ययनों ने चेतावनी दी है कि ‘ग्रीन कवर’ बढऩे के दावे अक्सर प्राकृतिक वनों के भीतर हो रहे वास्तविक पारिस्थितिक नुकसान को छिपा देते हैं, खासकर जब यह वृद्धि बाहरी प्रजातियों के कारण होती है। दूसरा कारण वैश्विक है। भारत हिंद महासागर क्षेत्र, दक्षिण एशिया और विकासशील देशों में प्रकृति पर आधारित विकास मॉडल का नेतृत्व करने की मजबूत स्थिति में है। इंटरनेशनल सोलर अलायंस, जलवायु साझेदारियों और विकास परियोजनाओं के जरिए भारत ने अफ्रीका, दक्षिण-पूर्व एशिया और छोटे द्वीपीय देशों के साथ मजबूत संबंध बनाए हैं। ये ऐसे क्षेत्र हैं जो जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता के संकट से सर्वाधिक प्रभावित हैं। भारतीय बैंक और वित्तीय संस्थान संवेदनशील क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, नवीकरणीय ऊर्जा, बंदरगाहों, कृषि व्यवसाय और तटीय विकास परियोजनाओं में निवेश कर रहे हैं। भारत प्रकृति और विकास के बीच संतुलित वित्तीय मॉडल का वैश्विक नेतृत्व कर सकता है।
जैव-विविधता आर्थिक और सरकारी नीतियों का हिस्सा
कई देश जैव-विविधता को अपनी आर्थिक और सरकारी नीतियों का हिस्सा बना रहे हैं। ब्रिटेन ने जैव-विविधता के संरक्षण में निजी निवेश बढ़ाने और दिखावटी पर्यावरणीय दावों पर रोक लगाने के लिए सरकारी मानक और दिशा-निर्देश लागू किए हैं। ब्रिटेन और फ्रांस ने मिलकर जैव-विविधता संरक्षण के लिए वैश्विक वित्तीय ढांचा तैयार करने वाली एक अंतरराष्ट्रीय समिति को आर्थिक सहायता देने की घोषणा की है। नॉर्वे ने उष्णकटिबंधीय जंगलों की रक्षा करने वाले देशों को प्रोत्साहित करने के लिए बनाई गई ‘ट्रॉपिकल फॉरेस्ट फॉरएवर फैसिलिटी’ नामक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के लिए 3 अरब डॉलर तक देने की घोषणा की है।
राष्ट्रीय रणनीति की जरूरत
भारत के पास जैव-विविधता संरक्षण के लिए निजी निवेश आकर्षित करने वाली स्पष्ट राष्ट्रीय रणनीति नहीं है। सरकार को बैंकों, निवेशकों और कंपनियों को मैंग्रोव संरक्षण, जलस्रोत पुनर्जीवन और ग्रामीण आजीविका से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। इसके लिए पर्यावरण, वित्त, ग्रामीण विकास और विदेश मंत्रालयों सहित नाबार्ड, सिडबी और गिफ्ट सिटी जैसे संस्थानों को मिलाकर राष्ट्रीय ‘नेचर फाइनेंस’ रणनीति बनाई जा सकती है। निजी क्षेत्र की भागीदारी सख्त मानकों, पारदर्शिता, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वास्तविक पर्यावरणीय परिणामों पर आधारित होनी चाहिए। आर्थिक प्रोत्साहन, स्थानीय आजीविका और पूंजी प्रवाह की अनदेखी करनेवाले संरक्षण मॉडल भारत जैसे विशाल और विकास के लिहाज से जटिल देश में बड़े पैमाने पर सफल नहीं हो सकते। जैव विविधता के संरक्षण और प्रकृति वित्तपोषण में मार्गदर्शक वैश्विक भागीदार बनने के लिए भारत के पास प्राकृतिक संपदा, वित्तीय ढांचा, वैज्ञानिक विशेषज्ञता और भू-राजनीतिक साख मौजूद हैं। जरूरत है मजबूत कानूनों, निजी वित्तपोषण, जवाबदेह बाजारों और ऐसे संस्थानों की जो पर्यावरण और दीर्घकालिक आर्थिक रणनीति में तालमेल बिठा सकें।
Published on:
10 Jun 2026 06:22 pm
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