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Opinion: बुरी है घर का ‘आईना’ छोड़ पड़ोसी की खिड़की से खुद को देखने की आदत

Indian Media Freedom Analysis: डॉ. देवेन्द्र नाथ तिवारी (जनसंचार, संस्कृति के अध्येता लेखक, दिल्ली विश्वविद्यालय के राम लाल आनंद कॉलेज में सहायक आचार्य) की राय में भारत को आंकने-मापने का पैमाना भी भारतीय परिवेश और परिस्थितियों पर आधारित होना चाहिए।

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भारत

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Saurabh Mall

Jun 12, 2026

Opinion Press Freedom Index

ओपिनियन: अपने ही घर का ‘आईना’ छोड़कर हम पड़ोसी की खिड़की से खुद को देखने लगे हैं। (AI जनरेटेड इमेज)

Opinion Press Freedom Index: आजकल एक अजीब-सी आदत हमारे सार्वजनिक जीवन में घर कर गई है। अपने ही घर का ‘आईना’ छोड़कर हम पड़ोसी की खिड़की से खुद को देखने लगे हैं। और वह पड़ोसी भी कोई अपना नहीं, बल्कि दूर बैठे वे संस्थान हैं, जिनकी भाषा, दृष्टि और सरोकार हमसे अलग हैं। वे हमें रैंक करते हैं। हमें आंकते हैं। हम बिना सोचे-समझे उस पैमाने को अपना सही मान लेते हैं। अभी हाल में एक नॉर्वेजियन पत्रकार का प्रसंग सुर्खियों में रहा। एक सवाल, फिर उससे पैदा हुआ शोर। शोर ऐसा कि मानो लोकतंत्र का सारा सच उसी एक घटना में कैद हो। सवाल पूछना प्रेस का अधिकार है। मूल कर्म भी। पर जवाब सुनना भी उतना ही जरूरी है। जब सवाल एकतरफा हो जाए, या पूर्वग्रह से भरा हो, तो वह संवाद नहीं, प्रदर्शन बन जाता है। और प्रदर्शन का उद्देश्य सत्य नहीं, सनसनी पैदा करना होता है।

नॉर्वे के ही एक बड़े अखबार ‘आफ्टेनपोस्टेन’ में भारत के प्रधानमंत्री को सपेरे के रूप में चित्रित किया गया। एक औपनिवेशिक बिंब, जिसने सदियों तक भारत को 'अजीब', 'पिछड़ा' और ‘सांप-सपेरों का देश’ साबित करने का काम किया। साथ में टिप्पणी भी, ‘चालाक और थोड़ा परेशान करने वाला व्यक्ति।’ यदि कोई भारतीय अखबार किसी पश्चिमी नेता को ऐसे औपनिवेशिक प्रतीकों में बाँधकर प्रस्तुत करे, तो उसे 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' कहा जाएगा या 'नस्लीय पूर्वाग्रह'?

फ्रीडम इंडेक्स में भारत की स्थिति

पर, जिस प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की स्थिति का हवाला देकर सवाल पूछा गया, जरा उसकी हकीकत भी जान लीजिए। पेरिस स्थित एनजीओ 'रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स', वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स जारी करता है। नवीनतम इंडेक्स में भारत 151वें स्थान पर है (180 देशों में), जबकि 2024 में 159वां और 2023 में 161वां (सबसे निचला) था। वहीं नेपाल 90वां पैदान पर है। दक्षिण एशिया में पहला। कतर को 79वां स्थान मिला है। मध्य पूर्व में पहला। नाइजीरिया को, 112वां स्थान जबकि वहां चुनावों में हिंसा, पत्रकारों पर हमले के अनेक मामले सामने आये हैं। कांगो, 133वें नंबर पर है। युद्ध प्रभावित। एम-23 विद्रोह से वहां की मीडिया जूझ रही है। उसकी आजादी खतरे में है। सोमालिया, 136वें स्थान पर है। अफ्रीका का सबसे खतरनाक मुल्क। याद रखिए वहां 50 से अधिक पत्रकार मारे गए, विभिन्न घटनाओं में।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र

भारत से पहले क्यों हैं, ये देश? भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। यहाँ हर पाँच साल में करोड़ों लोग मतदान करते हैं। सत्ता बदलती है। सैकड़ों भाषाएँ और विविधताएँ साथ-साथ चलती हैं। फिर भी यह सूचियों में नाइजीरिया, कांगो, सोमालिया, नेपाल या कतर से पीछे दिखाया जाता है। सवाल यह है कि क्या इन सूचियों के पैमाने हमारे समाज की जटिलताओं को समझते हैं? ‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' की पद्धति पाँच श्रेणियों पर आधारित है। राजनीतिक वातावरण, कानूनी ढाँचा, आर्थिक परिदृश्य, सामाजिक-सांस्कृतिक माहौल और पत्रकारों की सुरक्षा। सभी को समान भार। लेकिन क्या ये पाँच प्रश्न भारतीय लोकतंत्र की बहुलता, उसकी जीवंतता, उसकी निरंतर बहसों को माप सकते हैं? या वे पश्चिमी लोकतंत्र के अपने अनुभव को सार्वभौमिक मानकर उसी कसौटी पर सबको कसते हैं?

याद रखिए अब भारत दुनिया में मजबूत ताकत बनने की राह पर है। तब भी पश्चिमी मीडिया का पूर्वाग्रह, भारत को कमजोर करने का मानस, न सिर्फ यथावत है, बल्कि 2014 के बाद तेज हुआ है। यह मानसिकता औपनिवेशिक का अवशेष है, जहाँ अपने पर अविश्वास और बाहर पर अंधविश्वास सहज हो जाता है। सोमालिया जहां 50 से अधिक पत्रकार मारे गए हैं और वह अफ्रीका का सबसे खतरनाक देश है, फिर भी भारत से 15 अंक ऊपर है। सीरिया जिसके पास 2025 में 15.82 अंक थे और असद शासन के तहत दुनिया के सबसे बुरे देशों में से एक था, फिर भी भारत से 26 अंक का अंतर है।

इसका मतलब यह नहीं कि भारत में सब कुछ अच्छा ही है। यहाँ भी कमियाँ हैं। चुनौतियां हैं। और उन पर गंभीर बहस होनी चाहिए। लेकिन वह बहस अपने अनुभव, अपने संदर्भ और अपनी समझ के आधार पर होनी चाहिए। न कि उधार के पैमानों पर।

लोकतंत्र कोई रैंकिंग नहीं है, जिसे हर साल अपडेट किया जाए। वह एक सतत प्रक्रिया है। जीवंत, जटिल और कभी-कभी अव्यवस्थित भी। उसे एक अंक या स्थान में बांध देना, उसके साथ अन्याय है। हमें तय करना होगा कि हम अपने लोकतंत्र को किस नजर से देखेंगे? अपने अनुभव की आंख से, या किसी दूर बैठे विश्लेषक की रिपोर्ट से। क्योंकि अंततः सवाल रैंकिंग का नहीं, आत्मबोध का है। और यह भी कि हमें आईना कौन दिखा रहा है? और कौन पाठ पढ़ा रहा है।