हमारी यह सोच है कि विकसित देशों में महिलाओं को उनके कार्यस्थलों में समानता का दर्जा प्राप्त है, परन्तु यह मिथक भर है
- डॉ. ऋृतु सारस्वत, समाजशास्त्री
आधुनिक कार्य संस्कृति में ज्यादा नुकसान महिलाओं को उठाना पड़ रहा है। वहीं जब विविधता की बात आती है तो नियोक्ता पारंपरिक रूप से ‘पाइपलाइन प्रॉब्लम’ को दोष देते हैं। काम पर रखने के लिए पर्याप्त महिलाएं हैं ही नहीं। यह वक्तव्य बिजनेस वुमेन मेलिंडा गेट्स ने दिया है। मूल समस्या महिलाओं के प्रति दोयम दर्जे की सोच और उनके प्रति बरते जानी वाली असंवेदनशीलता की है। उनकी कार्यक्षमताओं को कठघरे में खड़ा करने वाली मानसिकता इस जुगत में रहती है कि संपूर्ण कार्यव्यवस्था को इतना कठोर और दबावपूर्ण बना दिया जाए कि महिलाएं स्वयं काम छोड़ दें। ऐसा हो भी रहा है और इसका कारण, उनकी क्षमताओं में कमी नहीं बल्कि उनके साथ निरंतर बरते जाना वाला भेदभाव है।
हमारी यह सोच है कि विकसित देशों में महिलाओं को उनके कार्यस्थलों में समानता का दर्जा प्राप्त है, परन्तु यह मिथक भर है। विकसित देश हो या विकासशील, महिलाओं को लेकर कमोबेश सभी की सोच एक जैसी है। भारत में कामकाजी महिलाओं की स्थिति का विश्लेषण किया जाए तो स्पष्ट होता है कि उनके प्रति संपूर्ण कार्यव्यवस्था असंवेदनशील है। एक जैसा काम करने के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में 25 प्रतिशत कम वेतन मिलता है।
एक तरफ यह मानकर चल रहे हैं कि स्त्री आत्मनिर्भर हुई है और दूसरी ओर ये आंकड़े उनकी खराब स्थिति की ओर इशारा कर रहे हैं। पुरुषात्मक समाज में स्त्रियों को उतनी ही स्वतंत्रता दी जाती है, जितनी कि उनके परिवार के सदस्य उनके लिए सुनिश्चित करते हैं। महिलाओं को दफ्तर की तरफ भागते देख, हम यह सोचने लगते हैं कि महिलाएं उन्नति कर रही हैं परन्तु वास्तविकता में ये वे महिलाएं हैं जो परिवार के आर्थिक उत्तरदायित्वों को बांटने के लिए घर से निकली अवश्य हैं पर न तो परिवार और न ही कार्यस्थल उनके प्रति संवेदनशील है।
निचले स्तर पर काम करने वाली महिलाएं अपनी खिलाफ हुए शोषण का विरोध करने से भी डरती हैं। वह ऐसा साहस करे भी तो 65.2 प्रतिशत यौन शोषण के मामलों में कोई कार्यवाही ही नहीं होती। महिलाओं के हित किसी के लिए कोई मायने नहीं रखते। संपूर्ण सामाजिक व्यवस्था का ढांचा ही कुछ ऐसा है कि महिलाओं के प्रति हो रहे दुव्र्यवहार के लिए उन्हें ही जिम्मेदार माना जाता है और यह भी स्वीकार किया जाता है कि ऐसी घटनाएं कार्यव्यवस्था का हिस्सा है। महिलाओं को विश्व अर्थव्यवस्था का हिस्सा माना ही नहीं जा रहा और पुरुषवादी मानसिकता अर्थव्यवस्था के विभिन्न संसाधनों को पूर्णत: अपने नियन्त्रण में रखना चाहती है।