महिला किसानों को प्रशिक्षण, तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक आसान पहुंच मिलनी चाहिए। कृषि विस्तार सेवाओं में लैंगिक दृष्टिकोण अपनाना होगा, ताकि महिलाओं की वास्तविक जरूरतों को समझकर योजनाएं बनाई जा सकें।
डॉ. एम.एल. जाट - आईसीएआर महानिदेशक
भारत की कृषि केवल अर्थव्यवस्था का एक हिस्सा भर नहीं, बल्कि हमारी सभ्यता और संस्कृति की आत्मा है। इस धरती को सदियों से जिन हाथों ने सींचा है, उनमें महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। वे केवल खेतों में श्रम करने वाली सहयोगी नहीं, बल्कि भारतीय कृषि की असली आधारशिला हैं। विभिन्न अध्ययनों के अनुसार देश में कृषि और उससे जुड़े कार्यों में लगभग 60 से 70 प्रतिशत श्रम योगदान महिलाओं का है। लेकिन विडंबना यह है कि कृषि में इतना बड़ा योगदान देने के बाद भी महिलाओं को संसाधनों और निर्णय-निर्माण में बराबरी का स्थान नहीं मिल पाया है। भूमि स्वामित्व के मामले में उनकी हिस्सेदारी बहुत कम है। आधुनिक तकनीक, कृषि प्रशिक्षण, वित्तीय सेवाओं और बाजार तक उनकी पहुंच भी सीमित रहती है। यह असंतुलन केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं है, बल्कि कृषि विकास की दृष्टि से भी बड़ी चुनौती है।
खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) की एक रिपोर्ट बताती है कि यदि महिलाओं को पुरुषों के समान संसाधन, तकनीक और अवसर मिलें, तो कृषि उत्पादकता में 20 से 30 प्रतिशत तक वृद्धि संभव है। इससे दुनिया भर में करोड़ों लोगों की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है। स्पष्ट है कि महिला किसान का सशक्तीकरण केवल समानता की बहस नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और आर्थिक विकास की अनिवार्य शर्त है।
आज कृषि की परिभाषा भी बदल रही है। पहले खेती केवल खेत तक सीमित मानी जाती थी, लेकिन अब यह एक व्यापक कृषि-खाद्य प्रणाली का हिस्सा बन चुकी है, जिसमें उत्पादन से लेकर भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, विपणन और उपभोग तक की पूरी मूल्य शृंखला शामिल है।
इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका लगातार बढ़ रही है। वे केवल उत्पादन में ही नहीं, बल्कि उद्यमिता और नवाचार के क्षेत्र में भी आगे आ रही हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में महिला स्वयं सहायता समूहों द्वारा चलाए जा रहे छोटे खाद्य उद्योग, जैविक उत्पादों का उत्पादन और स्थानीय बाजारों में उनकी सक्रिय भागीदारी इसका उदाहरण हैं। जलवायु परिवर्तन के दौर में भी महिला किसान की भूमिका विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो जाती है। बदलते मौसम, अनियमित वर्षा और प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच महिलाएं पारंपरिक ज्ञान और टिकाऊ कृषि पद्धतियों को आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं।
बीज संरक्षण, जैविक खेती, जल प्रबंधन और पोषण आधारित कृषि जैसी पद्धतियां अक्सर महिलाओं के अनुभव और ज्ञान से ही विकसित हुई हैं। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि महिला किसान केवल जलवायु परिवर्तन की पीडि़त नहीं, बल्कि समाधान की वाहक भी हैं। इन परिस्थितियों में आवश्यक है कि कृषि नीतियों में महिलाओं की भूमिका को केंद्र में रखा जाए। महिला किसानों को प्रशिक्षण, तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म तक आसान पहुंच मिलनी चाहिए। कृषि विस्तार सेवाओं में लैंगिक दृष्टिकोण अपनाना होगा, ताकि महिलाओं की वास्तविक जरूरतों को समझकर योजनाएं बनाई जा सकें। भूमि अधिकार, वित्तीय समावेशन और बाजार तक सीधी पहुंच, ये तीन ऐसे स्तंभ हैं जिन पर महिला किसान का सशक्तीकरण टिक सकता है। इसके साथ ही कृषि बजट और योजनाओं में लैंगिक दृष्टिकोण को शामिल करना समय की आवश्यकता है। महिला किसान को केवल श्रमशक्ति के रूप में नहीं, बल्कि कृषि विकास की निर्णायक शक्ति के रूप में पहचान देना आवश्यक है।