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‘जैसे को तैसा’ की रणनीति पर काम, रंग लाएगा तिब्बत के कई स्थानों के नाम बदलने का अभियान

चीन के कब्जे वाले तिब्बत के अनेक स्थानों की एक सूची तैयार की गई है, जिसमें ऐतिहासिक अभिलेखों से भारतीय भाषाओं में उनके प्राचीन नामों को पुन: प्राप्त करते हुए नए नाम दिए जाएंगे।

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Jun 17, 2024

चीन के खिलाफ आखिरकार भारत को भी 'जैसे को तैसा' की रणनीति अपनानी पड़ी है। चीन द्वारा अरुणाचल प्रदेश के कई स्थानों का नाम बदलने को भारत ने गंभीरता से लिया है। आक्रामक रवैया अपनाते हुए भारत इसका जवाब तिब्बत में देने की रणनीति बना रहा है। चीन द्वारा जबरन कब्जा किए गए तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में भारत दो दर्जन से अधिक स्थानों का नाम बदलने के अभियान की योजना पर काम कर रहा है। सीमा विवाद के मसले पर चीन लम्बे समय से भारत पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिशें कर रहा है।

गौरतलब है कि जून 2020 में गलवान घाटी में हुई खूनी सैन्य झड़प को चार साल बीत चुके हैंं। लेकिन कई दौर की सैन्य और राजनयिक वार्ताओं के बावजूद चीन की हठधर्मिता के कारण अभी तक तनाव कम नहीं हो पाया है। हिंद महासागर में तो भारत और उसके सहयोगी देशों के पास अनेक अंतर्निहित क्षमताएं हैं, लेकिन जमीन पर मामला थोड़ा उलझा हुआ है। भारत के अधिकांश इंडो-पैसिफिक साझेदार अपना ध्यान फिलहाल चीन की समुद्री चुनौती पर केंद्रित कर रहे हैं, जिससे भारत को जमीनी सीमा पर अपनी सुरक्षा खुद करनी पड़ रही है। चीन द्वारा खासकर अरुणाचल प्रदेश में कई स्थानों का नाम बदलने का उद्देश्य पूर्वोत्तर भारत के सबसे बड़े प्रांत पर चीन के झूठे संप्रभुता दावे को मजबूत करना है।

चीन इसे 'दक्षिणी तिब्बत' का नाम देता है। अरुणाचल प्रदेश में बदले गए भारतीय इलाकों के नामों पर चीन के दावों की हवा निकालने के भारतीय प्रयासों ने अब तेजी पकड़ ली हैं। यही नहीं, चीन के कब्जे वाले तिब्बत के अनेक स्थानों की एक सूची तैयार की गई है जिसमें ऐतिहासिक अभिलेखों से भारतीय भाषाओं में उनके प्राचीन नामों को पुन: प्राप्त करते हुए नए नाम दिए जाएंगे। इस वैश्विक अभियान की फिलहाल बहुत ज्यादा जरूरत है क्योंकि चीन का दुस्साहस बढ़ता ही जा रहा है। इसी मार्च में चीन ने भारत के पूर्वोत्तर राज्य में वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के साथ 30 स्थानों का नाम बदल दिया था जिनमें आवासीय क्षेत्र, पहाड़, नदियां, झील, पहाड़ी दर्रा शामिल हैं। स्मरण रहे कि पूर्वी क्षेत्र में सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में एलएसी पर लम्बे समय से दोनों देशों के बीच सीमा विवाद है।

भारत के परम्परागत रुख के विपरीत चीन, मैकमहोन रेखा को 'साम्राज्यवादी विरासत' के रूप में खारिज करता है। हाल ही के सालों में यह चौथा अवसर है जब चीन ने अरुणाचल प्रदेश में स्थानों का एकतरफा नाम बदलने का भड़काऊ काम किया है। इससे पहले कथित नए नामों की सूची 2017, 2021 और 2023 में चीन द्वारा जारी की गई थी जिसे भारत ने बार-बार नकारा है। यह रेखांकित करते हुए कि फर्जी नामकरण से जमीनी हकीकत में कोई बदलाव नहीं आता, विदेश मंत्री एस. जयशंकर दो टूक कह चुके हैं कि 'अगर आज मैं आपके घर का नाम बदल दूं तो क्या वह मेरा हो जाएगा? अरुणाचल प्रदेश भारत का राज्य था, है और रहेगा।'

शी जिनपिंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना अपनी सीमाओं का हर तरफ और हम कीमत पर विस्तार करना चाह रही है। चीन अपने कई पड़ोसी देशों के खिलाफ क्षेत्रीय दावों को मजबूत करने और संप्रभुता पर असहमति का कोई मामला अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में जाने की स्थिति में उन दावों के लिए सबूत बनाने के लिए इन स्थानों का नाम बदल रहा है। जापान, इंडोनेशिया, मलेशिया, फिलीपींस, ताइवान, वियतनाम और भारत पिछले एक दशक से चीन के झूठे संप्रभुता दावों को झेल रहे हैं। मई 2024 में उपग्रह चित्रों से तो यह भी पता चला है कि भूटान के भीतर चीनी बस्तियों का तेजी से विस्तार हो रहा है। जमीन हड़पने के लिए चीन द्वारा की जा रही ये हरकतें इतिहास के पुनर्लेखन का निर्लज्ज प्रयास हंै। वैसे भी चीन कभी भरोसेमंद देश नहीं रहा क्योंकि उसने समय-समय पर कई देशों की पीठ में छुरा घोंपा है।

देखा गया है कि चीन केवल उन्हीं देशों के सामने घुटने टेकता है जो ताकत का जवाब ताकत से देते हैं। अब भारतीय सूची जारी होने से अरुणाचल प्रदेश और विवादित सीमा के अन्य हिस्सों पर चीन के झूठे दावों का मजबूती से जवाब मिलेगा। चूंकि नए नाम व्यापक ऐतिहासिक शोध के आधार पर रखे जा रहे हैं, इसलिए भारत के 'जैसे को तैसा' अभियान की विश्वसनीयता को मजबूती मिलेगी। इससे भी ज्यादा इसका दूरगामी मनोवैज्ञानिक परिणाम यह होगा कि पिछले पांच दशक में पहली बार भारत द्वारा तिब्बत के प्रश्न को अप्रत्यक्ष रूप से फिर से उठाया जाएगा। इससे निश्चित रूप से चीन पर दबाव पड़ेगा, लेकिन इतिहास को देखते हुए उससे सावधान भी रहना होगा और सीमा पर सतर्कता बरतनी होगी।

एक अच्छे पड़ोसी के रूप में भारत ने हमेशा तिब्बत को लेकर कोई विवाद पैदा नहीं किया है, लेकिन ऐसा लग रहा है कि चीन की मानचित्रण और नामकरण वाली कूटनीति की आक्रामकता की धार कम करने के लिए भारत सरकार ने भी कमर कस ली है। भारतीय सेना ने कई विवादित इलाकों में चीन के दावों की धज्जियां उड़ाने के लिए अनेक ठोस कदम उठाए हैं। भारत का लक्ष्य वैश्विक मीडिया के माध्यम से विवादित सीमा पर भारत के पक्ष को आगे बढ़ाना है, जो ठोस ऐतिहासिक शोध पर आधारित है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि नरेन्द्र मोदी ने एक गठबंधन सरकार के प्रधानमंत्री के तौर पर अपना तीसरा कार्यकाल आंरभ किया है और शासन के लिए उन्हें सहयोगी दलों की आवश्यकता होगी। इस बदली हुई आंतरिक राजनीतिक परिस्थिति के बावजूद भारत की विदेश नीति में कोई खास बदलाव की गुंजाइश नहीं है। देश के तमाम राजनीतिक दल इस बात पर एकजुट हैं कि चीन का मुकाबला करने के लिए भारत को अपनी वैश्विक शक्ति में वृद्धि करने की आवश्यकता है।

— विनय कौड़ा

Published on:
17 Jun 2024 03:28 pm
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