कुलिश जी केवल एक संपादक या संस्थापक नहीं, बल्कि उस दौर में युवाओं के लिए प्रेरणा, विचार और मार्गदर्शन के केंद्र थे। उनके निर्भीक लेखन और संपादकीयों का युवाओं पर इतना गहरा प्रभाव था कि वे उन्हें अपने पथप्रदर्शक के रूप में देखते थे।
कुलिश जी केवल एक संपादक या संस्थापक नहीं, बल्कि उस दौर में युवाओं के लिए प्रेरणा, विचार और मार्गदर्शन के केंद्र थे। उनके निर्भीक लेखन और संपादकीयों का युवाओं पर इतना गहरा प्रभाव था कि वे उन्हें अपने पथप्रदर्शक के रूप में देखते थे।
इसी भाव से वर्ष 1996 में भीलवाड़ा के कुछ युवाओं ने उनके सम्मान में एक अनोखी अभिनन्दन यात्रा का संकल्प लिया। भीलवाड़ा से जयपुर तक 285 किलोमीटर की "उल्टी दौड़" करते हुए यह यात्रा राष्ट्रीय एकता, युवा जागृति, पर्यावरण संरक्षण, नारी सशक्तीकरण और सामाजिक सद्भाव का संदेश लेकर निकली।
यूथ स्टूडेंट्स क्लब के बैनर तले राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त उल्टी दौड़ धावक बादल सिंह के नेतृत्व में छह सदस्यीय दल ने यह यात्रा पूरी की। सबसे भावुक क्षण तब आया, जब कुलिश जी ने हमारे आग्रह को सहर्ष स्वीकार किया। यात्रा के दौरान गांव-कस्बों में लोगों ने आत्मीय स्वागत किया। जयपुर पहुंचने पर आदरणीय गुलाब कोठारी जी ने दल का स्वागत किया। बाद में एक समारोह में कुलिश जी ने भावुक होकर कहा कि वे अशोक सोडाणी के स्नेहपूर्ण आग्रह को टाल नहीं पाए। यह संस्मरण आज भी युवाओं और कुलिशजी के गहरे भावनात्मक रिश्ते की मिसाल है।
प्रेषकः अशोक सोडाणी, भीलवाड़ा
माटी की सौंधी गंध लिए, टोंक धरा का लाल महान, सोडा गांव की धूल से उठकर, रचा सत्य का नया विधान।
पांच सौ रुपयों की पूंजी थी, पर संकल्पों में जान थी, जयपुर की उन गलियों से, जन्मी एक नई पहचान थी।
नाम 'कुलिश' सार्थक किया, वज्र-स्वर सा आह्वान बना, लेखनी मात्र धातु नहीं, जन-मन की धड़कन प्राण बना।
सत्ता के गलियारे कांपे, जब सत्य का सूरज साथ चला, बिना झुके, बिना बिके, वो स्वार्थों से सदा पार चला।
'पोलमपोल' की मिठास में, ढाणी-ढाणी का सार लिखा, 'अमेरिका' एक विहंगम दृष्टि' से, जीवन का विस्तार लिखा।
उत्तर वय में मोड़ लिया, वेदों की उन गहराइयों में, 'शब्द वेद' का ज्ञान दिया, चिंतन की ऊंचाइयों में।
सादा जीवन, ऊंचे विचार, मुख पर गम्भीर प्रकाश था, वेदों के विज्ञान सा, उनका अद्भुत विकास था।
'पाठक ही परमेश्वर हैं', यह मंत्र जिसका आधार बना, कागज का वो एक टुकड़ा, जनता की आवाज बना।
गुलाब, निहार और सिद्धार्थ, सहेज रहे विरासत की ज्योति, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों में, चमक रही उनकी शुचि मोती।
डाक टिकट पर मुस्काता चेहरा, हर भारतीय का मान है, सत्य, साहस और स्वाभिमान का, वो जाग्रत हिंदुस्तान है।
संसार से विदा ली, पर अमर है उनकी कीर्ति-कथा, हर कलम के सिपाही की, मिटा रहे वो मन की व्यथा।
कर्पूर चन्द्र कुलिश आज भी, कण-कण में मुस्काते हैं, पत्रिका के हर पन्ने में, वो बनकर साक्षी आते हैं।
डॉ. मोना अग्रवाल, डीडवाना कुचामन