
पाली। चुनाव की घोषणा के साथ ही मकान-दुकान की खाली दीवारें पोस्टर बन जाती थी। पेंटर अलग-अलग पार्टियों के चुनाव चिन्ह के साथ अपील लिखकर कोरी दीवार रंग-बिरंगी कर देते थे। इस परंपरा को देखते हुए चुनावी साल में दिवाली की पुताई के दौरान कई लोग अपने घरों की बाहरी दीवारें कोरी ही छोड़ देते थे। जनस पर्क के साथ प्रत्याशी अपने कार्यकर्ताओं को फोन कर भी तैनात करते थे। इन कार्यकर्ताओं का जिम्मा टेलीफोन डायरेक्टरी में से अपने क्षेत्र में रहने वालों के फोन नम्बर तलाश कर वोट की अपील करना था। मतदाताओं की भीड़ जुटाने के लिए नुक्कड़ नाटक, भजन-कीर्तन जैसी गतिविधियां कराई जाती थी। -प्रवीणसिंह रातड़ी, सामाजिक कार्यकर्ता
2003- बात करने कार्यकर्ता देते थे सिर्फ मिस कॉल
मोबाइल फोन का पहली बार जमकर इस्तेमाल 2003 के विधानसभा चुनावों में हुआ। प्रत्याशियों के साथ नए-नवेले कार्यकर्ता भी मोबाइल लेकर घूमने लगे। हालांकि, कॉल दर महंगी होने से छोटे कार्यकर्ता पदाधिकारियों को मिस कॉल देते थे। इनके मिस कॉल देखकर पदाधिकारी कार्यालय के लैंडलाइन से फोन करते थे। बैठकों की सूचना और एजेंडे मैसेज के जरिए शेयर होने लगे। एक बड़ा बदलाव लैक्स का भी रहा। स्क्रीन प्रिंटिग से तैयार होने वाले बैनरों की जगह लैक्स ने ले ली। ये लैक्स ज्यादा मजबूत चमकीले और आकर्षित करते थे। चुनावी वाहनों के साथ गली-मोहल्लों और चौराहों पर भी पार्टी के लैक्स लगने लगे। -बंटी पंवार, युवा कार्यकर्ता
2008- झंडे- बैनर देख अंदाजा लगा लेते थे कौन जितेगा
चुनावों में पार्टी और प्रत्याशी के हैंडबिल जनसम्पर्क से पहले घर-घर पहुंचाए जाते थे। इससे प्रत्याशी का बायोडाटा और पार्टी के घोषणा पत्र के बिन्दु शामिल होते थे। इनके जरिए प्रत्याशी के बारे में जानकारी मिलती थी। कट्टर समर्थकों के घरों पर पार्टी के झंडे और खिडक़ी-दरवाजों पर स्टिकर भी चिपकाए जाने लगे। इन झंडों की संख्या देखकर हार-जीत के परिणामों का अनुमान लगाया जाता था। चुनाव से दो या तीन दिन पहले कार्यकर्ता फिर घर-घर जाते और वोट की अपील के साथ मतदाताओं को पर्चियों का वितरण करते। अब पर्चियों के वितरण का काम निर्वाचन आयोग ने ही ले लिया है। - आशीष तिवाड़ी, चेंजमेकर्स
2013- अब जनता भी पूछने लगी है नेताजी से सवाल
इस चुनाव में सोशल नेटवर्क की भूमिका भी बढ़ गई थी। पिछले विधानसभा चुनाव में जनता तक अपनी बात पहुंचाने के लिए ऐसा कोई सशक्त माध्यम नहीं था, जिसके जरिए ज्यादा लोगों तक अपनी बात पहुंचाई जा सके। ऐसे में घर-घर जाकर ही जनस पर्क करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। गत चुनाव की बात करतें तो सबसे बड़ा बदलाव यह आया कि अब जनता भी सवाल पूछने लगी है। कई इलाकों में प्रत्याशियों को विकास, गुंडागर्दी और भ्रष्टचार के मुद्दों पर जवाब देना मुश्किल पड़ रहा है। आचार संहिता की सख्ती के कारण चुनाव का शोर-गुल भी कम हो गया। क्षेत्रों में गिनती की गाडिय़ां ही प्रचार के लिए निकल रही हैं। -राकेश पंवार, युवा नेता
2018- अब बहुत कुछ सोशल मीडिया पर ही निर्भर
इस चुनाव में सोशल मीडिया की भूमिका सर्वाधिक बढ़ गई। हर राजनीतिक दल और प्रत्याशी सोशल मीडिया को मजबूत आधार बनाकर चुनाव कैं पेन में उतरा है। पार्टी की नीतियां हो या प्रत्याशी के कार्य, सभी सोशल मीडिया के माध्यम से मतदाताओं तक पहुंचाए जा रहे हैं। राजनीतिक दलों का विस्तार भी गांव-ढाणी तक बढ़ गया। हर जगह कार्यकर्ता सुलभ हो जाते हैं। प्रत्याशियों को भी व्यक्तिगत रूप से अथक प्रयास करने पड़ते हैं। तकनीक के कारण मतदाताओं से सम्पर्क के माध्यम भी बढ़े हैं। प्रत्याशियों की एक अलग सेल सोशल मीडिया पर ही विशेष रूप से कार्य करती है। अब मतदाता नाराजगी प्रकट करने में भी पीछे नहीं रहता। -दीपक सोनी, युवा एक्टिविस्ट