नालंदा के जिस मंदिर में आज भगदड़ मची, वो गुप्त काल से जुड़ा है। यह वही स्थल है, जहां चीनी यात्री फाहियान और ह्वेनसांग ने भी शांति की तलाश की थी। इस मंदिर के में कई खास परंपरा और नियम भी है। लेकिन सबसे खास है बसियौरा, जिसके तहत पूरे गांव में एक दिन के लिए एक भी चूल्हा नहीं जलाया जाता।
Shitla Mata Mandir Nalanda:बिहार के नालंदा जिले में बिहारशरीफ से महज कुछ किलोमीटर दूर पंचाने नदी के मुहाने पर स्थित मघड़ा गांव आज एक दर्दनाक हादसे का गवाह बना। जिस सिद्धपीठ शीतला माता मंदिर की चौखट पर चीनी यात्रियों ने शांति खोजी थी, वहां आज चैती मंगलवार के अवसर पर भगदड़ में 8 महिलाओं की जान चली गई। यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि सदियों पुरानी परंपराओं, गुप्तकालीन वैभव और अटूट लोक विश्वास का प्रतीक है।
मघड़ा शीतला मंदिर का महत्व केवल स्थानीय नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर है। इतिहास के पन्ने गवाह हैं कि यह स्थान प्राचीन काल से ही अध्यात्म का केंद्र रहा है। गुप्तकाल को मंदिर निर्माण का स्वर्ण युग माना जाता है और इसी काल में इस क्षेत्र का धार्मिक महत्व अपने चरम पर पहुंच गया था। चीन के प्रसिद्ध यात्री फाहियान और ह्वेनसांग जब भारत आए थे, तब उन्होंने नालंदा विश्वविद्यालय के साथ इस क्षेत्र का भी भ्रमण किया था। कहा जाता है कि उन्होंने यहां की प्राकृतिक शांति, पंचाने नदी के किनारे की ठंडक और मंदिर के वातावरण का अपने यात्रा वृत्तांत में उल्लेख किया है।
फाहियान को शांति का हुआ था अनुभव: चीनी यात्री फाहियान महान गुप्त सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय के शासनकाल के दौरान भारत आए थे। अपने लेखों में, उन्होंने इसी शीतला मंदिर का विशेष रूप से जिक्र किया है। फाहियान लिखते हैं कि पंचाने नदी के संगम पर उन्होंने जिस शीतलता और शांति का अनुभव किया, वह वास्तव में अद्वितीय थी।
ह्वेनसांग का विश्राम: जब महान चीनी विद्वान ह्वेनसांग नालंदा विश्वविद्यालय में शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, तब वे अक्सर मघड़ा मंदिर परिसर में जाकर, वहां नीम और पीपल के पेड़ों की छांव में विश्राम किया करते थे। उन्होंने अपनी पुस्तकों में इस स्थान के शांत वातावरण की प्रशंसा की है।
माता शीतला का उल्लेख स्कंद पुराण में भी मिलता है और मघड़ा की मान्यता इसी पौराणिक कथा से जुड़ी है। कथा के अनुसार, दक्ष प्रजापति ने एक महायज्ञ किया था, जिसमें उन्होंने अपनी पुत्री सती और भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया। माता सती को यह अपमान सहन नहीं हुआ, उन्होंने यज्ञ स्थल पर ही अग्निकुंड में आत्मदाह कर लिया। इस घटना के बाद भगवान शिव क्रोधित हो गए और माता सती के शरीर को लेकर ब्रह्मांड में घूमने लगे। जब भगवान विष्णु को यह बात पता चली तो उन्होंने सृष्टि की रक्षा के लिए माता सती के शरीर के 108 टुकड़े कर दिए। जहां-जहां माता सती के ये अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हो गए।
मान्यता है कि माता सती के 108 टुकड़े होने के बाद भगवान शिव ने अपने कंधे पर चिपके सती के शरीर के अवशेषों को एक घड़े में रखा और पंचाने नदी के पश्चिमी तट पर धरती में छुपाकर अंतर्ध्यान हो गए। वर्षों बाद, राजा वृक्षकेतु को स्वप्न में माता ने दर्शन देकर उस स्थान की खुदाई कराने को कहा। जब खुदाई हुई, तो वहां से मां शीतला की दिव्य प्रतिमा प्रकट हुई। जिस स्थान पर खुदाई हुई, वही आज मिट्ठी कुआं के रूप में जाना जाता है। आश्चर्य की बात यह है कि इस कुएं का पानी आज तक कभी नहीं सूखा। मंदिर के प्रसाद और पूजा में इसी कुएं के जल का उपयोग किया जाता है।
इस मंदिर का गर्भगृह लगभग 10 गुणा 10 फीट चौड़ा और 12 फीट ऊंचा है। इसी गर्भगृह के केंद्र में काले पत्थर से निर्मित मां शीतला की लगभग 12 इंच लंबी अत्यंत दिव्य प्रतिमा स्थापित है। माता का यह स्वरूप विशिष्ट प्रतीकों से सुसज्जित है। उनके मुकुट पर नौ रेखाएं हैं, जिन्हें नौ देवियों का साक्षात प्रतीक माना जाता है। प्रतिमा के दायीं ओर भगवान सूर्य और बायीं ओर चंद्रमा विराजमान हैं, जो ब्रह्मांडीय संतुलन को दर्शाते हैं।
माता की चार भुजाएं उनके कल्याणकारी स्वरूप की व्याख्या करती हैं, जिनमें से एक हाथ में अमृत कलश, दूसरे में श्री शीतलाष्टक की पवित्र पुस्तक, तीसरे में विषहरणी (नीम की डाली) और चौथे हाथ में विभूति व फल की झोली सुशोभित है। माता का यह संपूर्ण विग्रह न केवल रोगों के नाश का संदेश देता है, बल्कि भक्तों के बीच उनके शांत और रक्षक रूप की महिमा को भी जीवंत करता है।
मघड़ा की सबसे अद्भुत परंपरा बसियौरा पूजा है, जो त्याग और कड़े नियमों का प्रतीक है। इस परंपरा के अनुसार शीतला अष्टमी के दिन पूरे मघड़ा गांव में किसी भी घर में चूल्हा नहीं जलता है। यहां तक कि घरों में झाड़ू तक नहीं लगाई जाती। सप्तमी के दिन जो दाल, चावल और सब्जी बनाई जाती है, उसे ही अगले दिन मां को अर्पित किया जाता है। श्रद्धालु इसे बसियौरा के रूप में ग्रहण करते हैं।
मघड़ा मंदिर की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां दिन में दीपक, धूप, अगरबत्ती या हुमाद जलाना पूरी तरह वर्जित है। माना जाता है कि माता शीतला के शरीर में अत्यधिक जलन (लहर) रहती है। अग्नि या धुएं से उनकी जलन बढ़ सकती है, इसलिए उन्हें शीतलता प्रदान करने के लिए ऐसा किया जाता है, साथ ही हर सुबह माता को दही और चीनी से स्नान कराया जाता है। कहा जाता है कि यदि कोई भूलवश दिन में अगरबत्ती या दीपक जलाता है, तो उसके अपने शरीर में भी तेज जलन होने लगती है। सूर्यास्त के बाद ही मंदिर के पुजारी पहली आरती करते हैं, जिसके बाद ही श्रद्धालु दीप जला सकते हैं।
देवी शीतला की विशेष रूप से चेचक और त्वचा संबंधी रोगों से जुड़ी देवी के रूप में पूजा की जाती है। भक्तों का दृढ़ विश्वास है कि इस मंदिर में उपलब्ध पवित्र भस्म (भभूत) और पवित्र जल विभिन्न रोगों से मुक्ति दिलाते हैं। यही कारण है कि हर मंगलवार और विशेष त्योहारों के अवसर पर भक्तों की भारी भीड़ मंदिर में उमड़ पड़ती है।