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स्वतंत्रता दिवस पर 21 तोपों की सलामी में गूंजी जबलपुर में बनी 105 एमएम लाइट फील्ड गन, 1984 से हो रहा उत्पादन

Jabalpur 105mm Light Field Gun : स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से 21 तोपों की सलामी में जबलपुर की गन कैरिज फैक्ट्री (GCF) निर्मित 105 एमएम लाइट फील्ड गन गूंजी। शुभम सिंह की विशेष रिपोर्ट में जानिए स्वदेशी तोप की मारक क्षमता और इसकी विशेषताएं।
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Aug 15, 2026
105mm Light Field Gun
105mm Light Field Gun : लाल किले से गूंजी जबलपुर की स्वदेशी एलएफजी की गर्जना, PC- Rajasthan Patrika

15 अगस्त को दिल्ली के लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराए जाने के साथ ही देश की आजादी का जश्न पारंपरिक 21 तोपों की सलामी हुई। इस सलामी में जबलपुर की गन कैरिज फैक्ट्री (जीसीएफ) में निर्मित स्वदेशी 105 एमएम लाइट फील्ड गन (एलएफजी) भी गूंजी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ध्वजारोहण के साथ ही निर्धारित क्रम में एलएफजी से फायरिंग कर राष्ट्रीय ध्वज को सम्मान दिया गया। 2026 के स्वतंत्रता दिवस समारोह में भी 105 एमएम स्वदेशी लाइट फील्ड गन से 21 तोपों की सलामी की पुष्टि की गई है।

यह जबलपुर के लिए इसलिए भी खास है, क्योंकि लाल किले पर जिस स्वदेशी तोप से सलामी दी जाती है, उसका निर्माण शहर की जीसीएफ में होता है। ब्रिटिशकालीन 25 पाउंडर तोप से चली आ रही सलामी की परंपरा में स्वदेशी हथियार को शामिल करने की शुरुआत वर्ष 2023 में गणतंत्र दिवस समारोह से हुई थी। इसके बाद स्वतंत्रता दिवस पर भी एलएफजी से 21 तोपों की सलामी दी जाने लगी।

सात एलएफजी से 21 तोपों की सलामी

21 तोपों की सलामी के लिए सात एलएफजी का इस्तेमाल निर्धारित क्रम में किया जाता है। इनसे लगातार फायरिंग कर 21 राउंड पूरे किए जाते हैं। पूरी फायरिंग करीब 52 सेकंड में पूरी होती है। इस सलामी की खास बात यह भी है कि इसमें इस्तेमाल होने वाला विशेष ब्लैंक कार्ट्रिज भी स्वदेशी है। इसका उत्पादन म्यूनिशंस इंडिया लिमिटेड की आयुध निर्माणी चांदा में किया जाता है। यानी लाल किले पर होने वाली सलामी में इस्तेमाल होने वाली तोप और उसके लिए तैयार किया जाने वाला विशेष कार्ट्रिज, दोनों देश में ही निर्मित होते हैं।

42 साल से जीसीएफ में बन रही एलएफजी

105 एमएम एलएफजी जीसीएफ के सबसे पुराने उत्पादों में शामिल है। इसका उत्पादन वर्ष 1984 में शुरू हुआ था। यानी जबलपुर की इस रक्षा उत्पादन इकाई में इस तोप का निर्माण चार दशक से अधिक समय से हो रहा है। सेना से ऑर्डर नहीं मिलने के कारण बीच के कुछ वर्षों में इसका उत्पादन प्रभावित रहा। इसके बाद सेना की जरूरत और मिले ऑर्डर के अनुसार फैक्ट्री ने दोबारा उत्पादन लाइन तैयार की। पिछले वित्तीय वर्ष में एलएफजी का उत्पादन फिर शुरू किया गया। इस वर्ष भी डेढ़ दर्जन से अधिक एलएफजी तैयार करने का लक्ष्य रखा गया है। इनमें बड़ी संख्या में तोपों का निर्माण पूरा हो चुका है।

निर्माण से फायरिंग टेस्ट तक जबलपुर में

एलएफजी का निर्माण ही नहीं, उसकी फायरिंग और परीक्षण भी जबलपुर में होता है। जीसीएफ में तैयार तोप की फायरिंग खमरिया स्थित लॉन्ग प्रूफ रेंज में की जाती है। परीक्षण के बाद इसे सेंट्रल ऑर्डनेंस डिपो के माध्यम से सेना को सौंपा जाता है।
इस तरह एलएफजी के निर्माण से लेकर उसकी क्षमता की जांच तक जबलपुर की रक्षा उत्पादन व्यवस्था की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।

17 किलोमीटर तक मारक क्षमता

105 एमएम एलएफजी की मारक क्षमता करीब 17 किलोमीटर तक है। हल्की और कॉम्पैक्ट होने के कारण इसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाना अपेक्षाकृत आसान है। एयरलिफ्ट के जरिए इसे दुर्गम क्षेत्रों तक भी पहुंचाया जा सकता है।
तेज और सटीक संचालन इसकी प्रमुख खूबियों में शामिल है। यह एक मिनट में करीब चार राउंड फायर करने में सक्षम है। इसकी यही विशेषताएं इसे सेना के लिए उपयोगी फील्ड गन बनाती हैं।

ऑपरेशन सिंदूर में भी इस्तेमाल की जानकारी

जबलपुर में निर्मित एलएफजी का इस्तेमाल सैन्य अभियानों में भी होता रहा है। ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भी इस तोप के इस्तेमाल की जानकारी सामने आई थी। यानी जिस तोप की गर्जना स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से देश के सामने सुनाई देती है, उसका इस्तेमाल सेना की वास्तविक जरूरतों में भी किया जाता है।

धनुष तोप भी बढ़ा चुकी है जबलपुर का गौरव

जबलपुर की जीसीएफ में निर्मित 155 एमएम 45 कैलिबर धनुष तोप भी देश की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन कर चुकी है। यह करीब 38 किलोमीटर तक गोला दागने में सक्षम है। गणतंत्र दिवस की परेड में भी धनुष तोप का प्रदर्शन हो चुका है।
एलएफजी और धनुष जैसी स्वदेशी तोपों के निर्माण से जबलपुर देश के रक्षा उत्पादन मानचित्र पर महत्वपूर्ण स्थान रखता है। शहर की जीसीएफ लंबे समय से सेना के लिए तोपों और अन्य रक्षा उपकरणों के निर्माण में योगदान दे रही है।

लाल किले की सलामी में जबलपुर की पहचान

15 अगस्त को जब लाल किले से 21 तोपों की सलामी गूंजी, उसमें जबलपुर की जीसीएफ में बनी एलएफजी की आवाज भी शामिल रही। चार दशक से अधिक समय से इस तोप का निर्माण कर रही फैक्ट्री के लिए यह राष्ट्रीय समारोह में शहर की रक्षा उत्पादन क्षमता और स्वदेशी तकनीक की मौजूदगी का प्रतीक भी है।

ब्रिटिशकालीन 25 पाउंडर की जगह स्वदेशी एलएफजी का इस्तेमाल देश की रक्षा उत्पादन यात्रा में आए बदलाव को भी दर्शाता है। लाल किले से होने वाली 21 तोपों की सलामी में जबलपुर की इस स्वदेशी तोप की मौजूदगी शहर के लिए गौरव का विषय है।

तथ्यजानकारी
📅 1984जीसीएफ में 105 एमएम एलएफजी का उत्पादन शुरू
🇮🇳 2023पहली बार गणतंत्र दिवस पर स्वदेशी एलएफजी से सलामी
🎖️ 21 तोपों की सलामीसात एलएफजी से निर्धारित क्रम में फायरिंग
⏱️ 52 सेकंड21 राउंड की सलामी पूरी होने का समय
🎯 17 किमीएलएफजी की अधिकतम मारक क्षमता
🔥 4 राउंड/मिनटफायरिंग क्षमता
📍 खमरियालॉन्ग प्रूफ रेंज में एलएफजी की फायरिंग व परीक्षण
🏭 इस वर्ष का लक्ष्यडेढ़ दर्जन से अधिक एलएफजी का उत्पादन

जीसीएफ के महाप्रबंधक एवं जनसंपर्क अधिकारी राहुल चौधरी ने बताया, '105 एमएम एलएफजी जीसीएफ के सबसे पुराने उत्पादों में एक है। इसका उत्पादन बीते चार दशकों से किया जा रहा है। गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस समारोहों में 21 तोपों की सलामी देने के लिए इसका इस्तेमाल किया जाता है।'

Updated on:
15 Aug 2026 09:32 am
Published on:
15 Aug 2026 09:32 am