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छत्तीसगढ़ के किसानों ने बदलवा दिया भारतमाला का ब्लूप्रिंट, थनौद में अब बनेगा नया कॉलम ब्रिज

Bharatmala Project: भारतमाला परियोजना के तहत थनौद में शिवनाथ नदी पर 130 मीटर लंबे कॉलम ब्रिज के निर्माण को मंजूरी मिली। डेढ़ साल के किसान आंदोलन के बाद बदले डिजाइन से 2500 हेक्टेयर कृषि भूमि को राहत मिलने की उम्मीद।

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Jun 20, 2026
Thanod Column Bridge
थनौद में कॉलम ब्रिज (photo source- Patrika)

Thanod Column Bridge: भारतमाला परियोजना के तहत शिवनाथ नदी पर निर्माणाधीन पुल को लेकर पिछले डेढ़ साल से जारी विवाद आखिरकार समाधान की ओर पहुंच गया है। थनौद, अंजोरा, बिरेझर और चंगोरी गांवों के किसानों के लंबे संघर्ष, विरोध प्रदर्शन और प्रशासन के साथ लगातार संवाद के बाद केंद्र सरकार ने सामान्य पुल की जगह 130 मीटर लंबे कॉलम ब्रिज के निर्माण को मंजूरी दे दी है। इसके लिए लगभग 35 करोड़ रुपये की स्वीकृति भी मिल चुकी है। यह फैसला केवल एक पुल के निर्माण का निर्णय नहीं, बल्कि किसानों की चिंताओं, पर्यावरणीय संतुलन और विकास परियोजनाओं में जनभागीदारी की एक महत्वपूर्ण मिसाल बनकर सामने आया है।

कैसे शुरू हुआ विवाद?

भारतमाला परियोजना के अंतर्गत दुर्ग से नया रायपुर तक नई सड़क का निर्माण किया जा रहा है। यह सड़क थनौद, अंजोरा, बिरेझर और चंगोरी सहित कई गांवों से होकर गुजर रही है। परियोजना के तहत शिवनाथ नदी पर पुल और सड़क निर्माण का कार्य शुरू किया गया था। ग्रामीणों और किसानों ने शुरुआत से ही निर्माण कार्य के स्वरूप पर आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि सड़क और पुल को जमीन से काफी ऊंचाई पर मिट्टी-मुरूम भरकर तैयार किया जा रहा है।

इससे नदी के प्राकृतिक बहाव में बाधा उत्पन्न हो सकती है और भविष्य में बाढ़ का खतरा बढ़ सकता है। किसानों का तर्क था कि शिवनाथ नदी का यह क्षेत्र हर वर्ष जलभराव और बाढ़ की स्थिति का सामना करता है। यदि ऊंचे भराव के साथ सड़क और सामान्य पुल का निर्माण किया जाता, तो नदी का पानी आसपास के खेतों में अधिक मात्रा में भर सकता था और जल निकासी बाधित हो सकती थी।

2500 हेक्टेयर खेती पर मंडरा रहा था खतरा

विवाद का सबसे बड़ा कारण खेती-किसानी पर पड़ने वाला संभावित प्रभाव था। चारों गांवों की लगभग 2500 हेक्टेयर कृषि भूमि शिवनाथ नदी के तटवर्ती क्षेत्र में स्थित है। यहां बड़ी संख्या में किसान धान सहित अन्य फसलों की खेती करते हैं। ग्रामीणों का कहना था कि यदि पुराने डिजाइन के अनुसार निर्माण पूरा हो जाता, तो बाढ़ के समय खेतों में लंबे समय तक पानी भरा रहता।

इससे फसलों को नुकसान पहुंचता और हजारों किसानों की आजीविका प्रभावित होती। किसानों ने इसे केवल जमीन या मुआवजे का मुद्दा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों की कृषि सुरक्षा का विषय बताया। यही कारण था कि विरोध लगातार जारी रहा और आंदोलन धीरे-धीरे व्यापक रूप लेता गया।

डेढ़ साल तक चला संघर्ष

स्थानीय किसानों और ग्रामीणों ने विभिन्न स्तरों पर अपनी आपत्तियां दर्ज कराईं। कई बार धरना-प्रदर्शन हुए, ज्ञापन सौंपे गए और प्रशासन से हस्तक्षेप की मांग की गई। किसानों का कहना था कि वे विकास के विरोधी नहीं हैं, लेकिन ऐसा विकास भी स्वीकार नहीं किया जा सकता जो खेती, पर्यावरण और गांवों के भविष्य के लिए खतरा बन जाए।

इस दौरान कई जनप्रतिनिधियों ने भी किसानों की मांगों का समर्थन किया और मामले को शासन स्तर तक पहुंचाने का प्रयास किया। लगातार बढ़ते दबाव और किसानों की एकजुटता ने इस मुद्दे को राज्य और केंद्र स्तर तक चर्चा का विषय बना दिया।

कलेक्टर की पहल बनी समाधान का आधार

मामले को सुलझाने में जिला प्रशासन की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही। किसानों के विरोध प्रदर्शन के बाद कलेक्टर ने स्वयं स्थल निरीक्षण कर स्थिति का जायजा लिया। इसके बाद किसानों और तकनीकी विशेषज्ञों के बीच संवाद स्थापित करने की पहल की गई। कलेक्टर आंदोलनरत किसानों को अपने साथ राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) रायपुर लेकर गए, जहां विशेषज्ञों ने पुल की डिजाइन, सुरक्षा और तकनीकी पहलुओं की विस्तृत जानकारी दी।

चर्चा के दौरान विभिन्न विकल्पों पर विचार किया गया और अंततः कॉलम ब्रिज निर्माण को सबसे उपयुक्त समाधान माना गया। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इससे आंदोलन और प्रशासन के बीच टकराव की स्थिति समाप्त हुई और तकनीकी तथ्यों के आधार पर समाधान का रास्ता निकला।

क्या है कॉलम ब्रिज और क्यों है खास?

कॉलम ब्रिज सामान्य पुलों की तुलना में अधिक खुला ढांचा होता है। इसमें नदी के बहाव क्षेत्र को बाधित किए बिना ऊंचे स्तंभों (कॉलम) पर पुल का निर्माण किया जाता है। इससे पानी का प्राकृतिक प्रवाह बना रहता है और जलभराव की संभावना कम होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि शिवनाथ नदी जैसे क्षेत्र में यह डिजाइन अधिक उपयुक्त है क्योंकि इससे नदी का मार्ग संकरा नहीं होगा और बाढ़ के दौरान पानी को गुजरने के लिए पर्याप्त स्थान मिलेगा। यही कारण है कि किसानों ने भी इस विकल्प को स्वीकार किया और इसे दीर्घकालिक समाधान माना गया।

पुराना निर्माण हटाकर बनेगा नया ढांचा

केंद्र सरकार से मंजूरी मिलने के बाद अब लोक निर्माण विभाग और राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण संयुक्त रूप से नई कार्ययोजना तैयार करेंगे। इसके तहत पहले से किए गए निर्माण कार्य को हटाकर कॉलम ब्रिज के अनुरूप नया ढांचा तैयार किया जाएगा। हालांकि इससे परियोजना की लागत और समय दोनों बढ़ेंगे, लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में होने वाले संभावित नुकसान और विवादों को देखते हुए यह निर्णय अधिक व्यावहारिक और दूरदर्शी साबित होगा।

विकास और जनहित के बीच संतुलन की मिसाल

थनौद पुल विवाद का समाधान केवल एक तकनीकी बदलाव नहीं है। यह मामला बताता है कि यदि स्थानीय समुदायों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए और तकनीकी विशेषज्ञता के साथ उनका समाधान खोजा जाए, तो बड़े से बड़े विवाद भी सुलझाए जा सकते हैं। यह निर्णय उन हजारों किसानों के लिए राहत लेकर आया है जो अपनी खेती और भविष्य को लेकर चिंतित थे। साथ ही यह संदेश भी देता है कि विकास परियोजनाओं में स्थानीय परिस्थितियों, पर्यावरणीय प्रभावों और जनभावनाओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

जमीन और फसलों की होगी सुरक्षा

थनौद में बनने वाला 130 मीटर लंबा कॉलम ब्रिज अब केवल एक पुल नहीं, बल्कि किसानों के संघर्ष, प्रशासनिक पहल और तकनीकी समाधान का प्रतीक बन गया है। डेढ़ साल तक चले आंदोलन के बाद मिला यह फैसला आने वाले समय में उन परियोजनाओं के लिए भी उदाहरण बन सकता है, जहां विकास और जनहित के बीच संतुलन बनाने की चुनौती सामने आती है। किसानों को उम्मीद है कि नया पुल न केवल उनकी जमीन और फसलों की सुरक्षा करेगा, बल्कि क्षेत्र के विकास को भी नई दिशा देगा।

Updated on:
20 Jun 2026 01:05 pm
Published on:
20 Jun 2026 01:01 pm