
Save Aravali Hills : एक तरफ करीब 700 किलोमीटर लंबी अरावली की पहाड़ियां हैं, जिन पर राजस्थान के पानी, जंगल और जैव विविधता का बड़ा सवाल टिका है। दूसरी तरफ इन्हीं पहाड़ियों के नीचे सोना, चांदी, तांबा, सीसा, जस्ता, यूरेनियम, टंगस्टन और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिजों के भंडार है। ऊपर पर्यावरण है और नीचे ऐसा खजाना, जिसकी जरूरत उद्योग से लेकर देश की रणनीतिक जरूरतों तक जुड़ी है। बीच में राजस्थान है, और इसी वजह से अरावली का मौजूदा विवाद सिर्फ पहाड़ और खनन का विवाद नहीं रह गया है।
चार राज्यों राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और गुजरात में फैली अरावली का सबसे बड़ा हिस्सा राजस्थान में है। प्रदेश में इसका हिस्सा करीब 80 फीसदी है। राजस्थान के 41 में से 20 जिले अरावली से जुड़े हैं। यानी अरावली को बचाने की सबसे बड़ी जिम्मेदारी भी राजस्थान की है और इसके नीचे मौजूद खनिज संपदा का सबसे बड़ा हिस्सा भी इसी राज्य के पास है।
अब सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया, अरावली की परिभाषा, खनन पर रोक और संरक्षण को लेकर बहस फिर तेज है। हाईपावर कमेटी के निरीक्षण और रिपोर्ट पर नजरें हैं। सवाल यह है कि आने वाले समय में अरावली का नक्शा कैसा होगा, क्या पूरी पर्वतमाला को संरक्षण क्षेत्र माना जाएगा, क्या कुछ हिस्सों में नियंत्रित खनन की गुंजाइश रहेगी या फिर नई परिभाषा खनन और पर्यावरण के बीच कोई तीसरा रास्ता निकालेगी?
अरावली को सिर्फ पहाड़ियों की एक श्रृंखला समझना भूल होगी। यह राजस्थान के पर्यावरणीय संतुलन की प्राकृतिक सुरक्षा दीवार है। थार के फैलाव को रोकने, भूजल रिचार्ज, जलग्रहण क्षेत्रों, जैव विविधता और स्थानीय जलवायु पर इसका असर है। इसका पर्यावरणीय प्रभाव राजस्थान से बाहर दिल्ली-एनसीआर, हरियाणा और गुजरात तक जाता है।
इसलिए एक पहाड़ी काटे जाने का असर केवल उसी जगह तक सीमित नहीं माना जा सकता। पहाड़ों से जुड़े जलग्रहण क्षेत्र, प्राकृतिक जल प्रवाह, वनस्पति और वन्यजीव आवास भी प्रभावित होते हैं। यही कारण है कि अरावली संरक्षण की बहस में केवल यह देखना पर्याप्त नहीं होगा कि कोई खान किसी पहाड़ी पर है या उसके आसपास। यहीं से असली सवाल पैदा होता है, क्या अरावली को केवल ऊंचाई से पहचाना जाए या उसके पूरे पर्यावरणीय तंत्र को संरक्षण का आधार बनाया जाए?
अरावली संरक्षण की तस्वीर का दूसरा हिस्सा उतना ही महत्वपूर्ण है। राजस्थान की बड़ी खनिज संपदा इसी क्षेत्र में है। सोना, चांदी, तांबा, सीसा, जस्ता, मैगनीज, यूरेनियम, टंगस्टन, रेयर अर्थ एलिमेंट्स, पीजीआई और लौह अयस्क जैसे खनिज यहां मौजूद हैं। इनके अलावा रॉक फॉस्फेट, सिलिका, चूना पत्थर और संगमरमर जैसे खनिज भी अरावली क्षेत्र की अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं। यानी अरावली में हर जगह खनन एक जैसा नहीं है। कहीं सामान्य निर्माण सामग्री है तो कहीं ऐसे खनिज हैं, जिन्हें देश की औद्योगिक और रणनीतिक जरूरतों से जोड़कर देखा जाता है। यही कारण है कि अरावली की भविष्य की नीति केवल ‘खनन बंद या चालू’ के दो विकल्पों में नहीं बन सकती। बड़ा सवाल यह है कि किस खनिज का दोहन कहां और कितनी सीमा तक किया जा सकता है और कौन से क्षेत्र पूरी तरह सुरक्षित रखे जाएं।
भीलवाड़ा, राजसमंद, उदयपुर, पाली, नागौर, अजमेर, झुंझुनूं, सिरोही, सीकर, टोंक, जयपुर, कोटपूतली-बहरोड़, अलवर, बांसवाड़ा, डीडवाना-कुचामन सिटी, ब्यावर, प्रतापगढ़, दौसा, डूंगरपुर और सलूंबर।
अरावली को लेकर सरकार और खनन उद्योग की चिंता का अंदाजा राजस्व के आंकड़ों से लगाया जा सकता है। वर्ष 2024-25 में अरावली से जुड़े 20 जिलों से करीब 6,830 करोड़ रुपए का खनन राजस्व मिला। राज्य के कुल खनन राजस्व में अरावली क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़कर करीब 74 फीसदी हो गई।
अरावली क्षेत्र में हर साल करीब 200 मिलियन टन खनिज का दोहन हो रहा है। यहां 1,277 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में माइनिंग लीज हैं और राज्य के कुल खनिज उत्पादन में अरावली क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी है। प्रदेश के कुल भौगोलिक क्षेत्र में इसका हिस्सा 36.45 फीसदी बताया गया है। इसलिए अरावली में खनन पर किसी बड़े फैसले का असर केवल खानों पर नहीं पड़ेगा। इसका असर सरकारी राजस्व, खनन उद्योग, परिवहन और स्थानीय अर्थव्यवस्था तक जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट की प्रक्रिया का सीधा असर नई खानों पर पड़ा है। मेजर और माइनर मिनरल की 1,175 से अधिक नीलाम खानें अभी शुरू नहीं हो सकी हैं। इनमें 120 मेजर और 1,055 माइनर मिनरल की खानें शामिल हैं। विभागीय अधिकारियों का अनुमान है कि यदि स्थिति लंबे समय तक बनी रही तो आने वाले वर्षों में 75 हजार करोड़ रुपए से अधिक का संभावित राजस्व प्रभावित हो सकता है। खनन राजस्व में हर साल 15 फीसदी से अधिक की वृद्धि की उम्मीद रहती है, ऐसे में रोक का असर भविष्य के राजस्व पर भी पड़ने की आशंका है।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी है। नई खानों पर रोक को अरावली के संरक्षण के लिए जरूरी कदम माना जा रहा है। पिछले दो दशकों से नई खानों के आवंटन पर रोक नहीं होती तो अरावली का कितना हिस्सा और प्रभावित होता, इसका आकलन भी बहस का हिस्सा है। इसलिए अदालत की रोक ने खनन उद्योग को भले धीमा किया हो, लेकिन इसने सरकार और विशेषज्ञों को यह तय करने का समय भी दिया है कि आगे अरावली में खनन की सीमा क्या होनी चाहिए।
नई खानों से बड़ा सवाल उन खानों का है जो पहले से चल रही हैं। 20 अरावली जिलों में 11,780 खानें और क्वारी लाइसेंस बताए गए हैं, जिनमें करीब 9,244 संचालित हैं। यदि हाईपावर कमेटी संरक्षण के लिहाज से इन खानों पर भी रोक की सिफारिश करती है तो इसका असर प्रदेश के खनन उद्योग पर बहुत व्यापक होगा।
यहीं संरक्षण और आजीविका का सवाल सामने आता है। दशकों से संचालित किसी खान को बंद करने का असर सिर्फ उसके मालिक या सरकार के राजस्व पर नहीं पड़ेगा। स्थानीय श्रमिक, परिवहन, कारोबार और उससे जुड़े दूसरे रोजगार भी प्रभावित होंगे।
इसलिए भविष्य की नीति में केवल यह सवाल नहीं होना चाहिए कि खान बंद हो या नहीं। यह भी तय करना होगा कि किस खान का पर्यावरणीय नुकसान कितना है, क्या उसका संचालन वैज्ञानिक शर्तों के साथ संभव है और बंद करने की स्थिति में स्थानीय अर्थव्यवस्था के लिए विकल्प क्या होंगे।
अरावली विवाद की सबसे अहम कड़ियों में से एक इसकी परिभाषा है। करीब तीन दशक से अदालत में चल रहे मामले में यह सवाल बार-बार आया कि आखिर अरावली हिल्स की सीमा तय कैसे हो।
राजस्थान सरकार ने करीब डेढ़ दशक पहले सुप्रीम कोर्ट में ऐसे दस्तावेज पेश किए थे, जिनमें 100 मीटर या उससे अधिक ऊंचाई वाली पहाड़ियों को अरावली हिल्स माना गया। फरवरी 2010 में राज्य सरकार ने अरावली पहाड़ियों की पहचान और अवैध खनन रोकने को लेकर शपथ पत्र भी दाखिल किया था। उस समय 100 मीटर से अधिक ऊंचाई वाली अरावली पहाड़ियों में 1,008 खनन पट्टे बताए गए थे।
राज्य सरकार ने अरावली की पहचान और सीमांकन के लिए सर्वे ऑफ इंडिया से नक्शे भी मांगे थे। सर्वे ऑफ इंडिया ने 30 दिसंबर 2002 के पत्र में बताया था कि अरावली रेंज संबंधित टोपोग्राफिकल मैप से ली गई है और इसमें कंटूर लाइनों का उपयोग किया गया है। विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि 100 मीटर से कम ऊंचाई वाले क्षेत्र में खानों की संख्या बहुत ज्यादा है।
अरावली का भविष्य केवल मौजूदा खानों से तय नहीं होगा। पिछले कुछ वर्षों में क्षेत्र में 3 हजार से अधिक नई खानें आवंटित की गई हैं। न्यायालय की रोक के कारण इनका संचालन नहीं हो सका। अब इनका भविष्य भी केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की ओर से तैयार होने वाले 'मैनेजमेंट प्लान फॉर सस्टेनेबल माइनिंग' (एमपीएसएम) के बाद तय होगा। यानी आने वाला समय अरावली के लिए निर्णायक हो सकता है। नई खानों का नक्शा यह तय करेगा कि संरक्षण की सीमा कितनी है और खनन की गुंजाइश कहां तक है।
शायद सबसे बड़ा सवाल यही है। अरावली के सामने विकल्प सिर्फ दो नहीं हैं, या तो हर खान बंद कर दी जाए या हर जगह खनन चलता रहे। विशेषज्ञों के अनुसार एक बेहतर रास्ता यह हो सकता है कि अरावली को वैज्ञानिक आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाए। ऐसे क्षेत्र जहां जल, जंगल, वन्यजीव और जैव विविधता का महत्व सबसे अधिक है, उन्हें पूरी तरह संरक्षण क्षेत्र बनाया जाए। जहां पर्यावरणीय प्रभाव नियंत्रित किया जा सकता है, वहां कड़े नियमों के साथ सीमित खनन की गुंजाइश तय की जाए। वहीं सामान्य और संवेदनशील क्षेत्रों की अलग-अलग पहचान की जाए।
इस पूरी प्रक्रिया में सिर्फ पहाड़ी की ऊंचाई नहीं, बल्कि उसके आसपास का पूरा पर्यावरणीय तंत्र देखा जाना जरूरी है।
सामरिक महत्व के खनिजों के लिए भी अलग वैज्ञानिक प्रोटोकॉल बनाया जा सकता है। यूरेनियम, टंगस्टन और रेयर अर्थ एलिमेंट्स जैसे खनिजों की राष्ट्रीय जरूरत को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, लेकिन इनका दोहन पर्यावरणीय सुरक्षा की शर्तों से बाहर भी नहीं होना चाहिए।
जहां खनन की अनुमति मिले, वहां खनन समाप्त होने के बाद भूमि के पुनर्स्थापन की जिम्मेदारी भी स्पष्ट हो। अवैध खनन रोकने के लिए जियो-मैपिंग और तकनीकी निगरानी बढ़ाई जाए। और जहां खनन बंद किया जाए, वहां स्थानीय लोगों के रोजगार के विकल्प तैयार किए जाएं।