Arjun Singh revealed the secret Untold Story: राजनीति के राज हमेशा दिल में छिपाए रखने वाले अर्जुन का एक ऐसा किस्सा भी है जिसे कम ही लोग जानते हैं। 3 दिसंबर भोपाल गैस त्रासदी से जुड़ा राज जिस पर 20 साल तक वो चुप रहे… फिर तोड़ी चुप्पी… patrika.com पर पढ़ें… 'उस रात का राज'...
Arjun Singh revealed the secret Untold Story: भारतीय राजनीति में रणनीति और मौन की बात होती है, तो एक नाम अनायास ही याद आता है अर्जुन सिंह… वो नेता जिन्हें राजनीति का चाणक्य कहा गया…वो अकेली ऐसी शख्सियत थे जिन्हें राजनीति के सबसे गहरे रहस्यों का रखवाला भी कहा जाता था। सुना ये भी है कि हमेशा मौन साधने वाला ये राजनेता जब सार्वजनिक रूप से बोलता था, तो कोई न कोई बखेड़ा जरूर खड़ा जाता था। राजनीति के राज हमेशा दिल में छिपाए रखने वाले अर्जुन का एक ऐसा किस्सा भी है जिसे कम ही लोग जानते हैं। 3 दिसंबर भोपाल गैस त्रासदी से जुड़ा राज जिस पर 20 साल तक वो चुप रहे… फिर तोड़ी चुप्पी… patrika.com पर पढ़ें… 'उस रात का राज'
मौन से बनी पहचान लोगों ने कहा ब्लैक बुक ऑफ कांग्रेस
अर्जुन सिंह को जानने वाले हेमंत शर्मा बताते हैं कि वे किसी मुलाकात में कभी अनावश्यक शब्द नहीं बोलते थे। लेकिन जब कभी वे बोले, तो या तो किसी का राजनीतिक करियर बन गया या फिर धराशायी हो जाता। यही कारण था कि उनके समर्थक उन्हें 'ब्लैक बुक ऑफ कांग्रेस' कहकर भी पुकारते थे।
दिसंबर 1984 की रात जब भोपाल गैस त्रासदी ने भारत और दुनिया को हिलाकर रख दिया। तब एमपी के मुख्यमंत्री थे अर्जुन सिंह। गैस त्रासदी के कार्बाइ़ कंपनी के वॉरेन एंडरसन की गिरफ्तारी का आदेश भी अर्जुन सिंह से ही जुड़ा था। सैकड़ों मौतों का जिम्मेदार सुरक्षित तरीके से भारत से निकल गया, इसका किस्सा भी अर्जुन सिंह के सिर आया। लेकिन उन्होंने दो दशक तक इस मुद्दे पर कुछ नहीं कहा… ऐसी चुप्पी साधी की उनका मौन फिर से चर्चा में रहा।
2010 में राज्यसभा में दिए अपने बयान और आत्मकथा में पहली बार उन्होंने सिर्फ इतना कहा 'निर्णय मेरा नहीं था, गृहमंत्री (पी.वी. नरसिम्हा राव) का था।' बस इतना कहकर वे फिर मौन हो गए। यहीं से खुलता एक 'राजनीतिक रहस्य' जो वो अपने साथ ले गए।
मध्यप्रदेश की सियासत में एक ऐसा राजनेता हुआ जो किसी परिचय का मोहताज नहीं है। ये वही नेता है जिसे राजनीति का चाणक्य कहा जाता है। नाम है अर्जुन सिंह उर्फ दाऊ साहब। यूं ही कोई अर्जुन सिंह नहीं हो जाता, क्योंकि उसके लिए सहनी पड़ता है। जी हां, हम एक दिलचस्प किस्सा बताने जा रहे हैं। किस्सा ऐसा कि सात साल का लड़का गांधी जी से मिलने के बाद टाई लगाना छोड़ देता है। जिस उम्मीदवार के लिए नेहरू वोट मांगने पहुंचते हैं। उसके पिता के खिलाफ भाषण दे देते हैं। और पिता की वो बेइज्जती उसे भीतर तक तोड़ देती है। जरूर पढ़ें ये मशहूर किस्सा...
साल था 1952 का तत्कालीन विंध्य प्रदेश की चुरहट विधानसभा में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू चुनाव प्रचार के लिए पहुंचे। उस दौरान कांग्रेस ने अर्जुन सिंह के पिता शिवबहादुर सिंह को उम्मीदवार बनाया था। नेहरू रीवा से चुरहट पहुंचते हैं। नेहरू ने मंच से घोषणा कर दी कि चुरहट का प्रत्याशी कांग्रेस का नहीं होगा। वजह बताई कि करप्शन का मुकदमा चलने वाले को टिकट नहीं देनी चाहिए थी। उसी मंच के नीचे प्रत्याशी का बेटा खड़ा था। जो महज 22 साल का था। दरबार यूनियन कॉलेज के प्रेसिडेंट अर्जुन सिंह का सिर शर्म से झुक गया। करप्शन के जो आरोप शिवबहादुर सिंह पर लगे थे। उसके पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है।
रीवा के महाराजा गुलाब सिंह इलाके दारों की जमीन हड़पना चाहते थे। जिसका विरोध शिवबहादुर सिंह ने किया और इलाकेदारों का एक संगठन खड़ा कर दिया। बाद में सत्ता की बारी आई महाराज मार्तंड सिंह की। वह विंध्य प्रदेश के राजप्रमुख बने। शिवबहादुर सिंह मंत्री बनते हैं। अब बीहर-बिछिया के पानी की तासीर में ही दुश्मनी है। भुलाने वाले भुला नहीं पाते हैं। ऐसा ही कुछ हुआ शिवबहादुर सिंह के साथ। पन्ना में हीरा खदाने हैं। उनकी लीज का नवीनीकरण होना था। उसमें आरोप लगे कि शिवबहादुर सिंह ने भ्रष्टाचार किया है और 25 हजार की रिश्वल ली है। उसके बाद शिवबहादुर निर्दलीय चुनाव लड़े। उन्हें हार मिली और फिर 1954 में मुकदमा भी हार गए। जिसमें उन्हें तीन साल की जेल हुई। तब अर्जुन सिंह ने कसम खाई कि वह परिवार से कलंक को मिटाकर रहेंगे।
1957 में कांग्रेस नेताओं की सिफारिश पर अर्जुन सिंह को भोपाल तलब किया जाता है कि में चुनाव लड़ लें। अर्जुन सिंह मना कर देते हैं और 1952 की याद दिलाते हैं और कहते हैं कि चुनाव जीतकर पार्टी में आ जाएंगे। वह मझौली से चुनाव लड़ते हैं और यहां से कांग्रेस प्रत्याशी की जमानत जब्त हो जाती है। जिस अर्जुन सिंह के पिता को नेहरू ने बेइज्जत किया था। वहीं अर्जुन तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू से मिलने के लिए आनंद भवन पहुंचते हैं। 1960 में कांग्रेस विधायक दल में शामिल हो जाते हैं। साल 1962 में कांग्रेस से चुनाव जीतकर विधायक बनते हैं और फिर 1963 में राज्यमंत्री का पद मिलता है।
जब चौथी विधानसभा के लिए 1967 में चुनाव आए अर्जुन सिंह के सामने बड़ी चुनौती बनकर आए डीपी मिश्र यानी द्वारका प्रसाद मिश्र। डीपी को लगता था कि प्रदेश में दो बड़ी सामंती ताकतें राजमाता सिंधिया और रीवा के मार्तंड सिंह उनका तख्ता पलट करने में लगे हुए हैं। मुख्यमंत्री डीपी मिश्र को बताया गया कि यदि अर्जुन सिंह दोबारा चुरहट से चुनाव जीत जाएंगे तो विरोध खेमे को दो बड़ी ताकतें मिल जाएंगी। इसलिए डीपी ने सख्ती दिखाते हुए अपना कलेक्टर भेजकर अर्जुन सिंह को हरवा दिया।
मध्यप्रदेश की दो बड़ी सामंती ताकतें राजमाता सिंधिया और रीवा के मार्तण्ड सिंह उनका तख्ता पलट करना चाहते है। उनका शक तब बढ़ गया, जब राजा मार्तण्ड सिंह ने विन्ध्यप्रदेश की 23 विधानसभा टिकिट अपनी पसंद से तय करवाई और इसी तरह राजमाता ने मध्यभारत की टिकिट अपने हिसाब से माँगी। मुख्यमंत्री मिश्र को तब बताया गया कि अर्जुन सिंह यदि विन्ध्य से दुबारा जीत जाएँगे, तो विरोधी खेमे को बड़ी ताकत मिल जाएगी। ऐसा कहते है कि इसलिए सीधी में अपना कलेक्टर भेज कर मिश्र ने खुद ही अर्जुन सिंह को हरवा दिया।
जब चुनाव में हार मिली तो अर्जुन सिंह हाथ पर हाथ रखकर नहीं बैठे। उन्होंने भूतपूर्व रीवा नरेश मार्तंड सिंह के साथ मिलकर उमरिया से कांग्रेस के विधायक रणविजय प्रताप सिंह से इस्तीफा दिलवा दिया। और तो और इस्तीफे को मंजूर भी करा लिया गया। चुनाव आयोग से मई के महीने में ही चुनाव की डेट फिक्स कराई। और फिर उपचुनाव जीतकर विधानसभा पहुंच जाते हैं। 1972 में फिर विधायकी का चुनाव जीत जाते हैं और फिर पीसी सेठी की सरकार में शिक्षा मंत्री बनते हैं।
साल 1980 में अर्जुन सिंह के खिलाफ कई विरोधी अटकलें चली। जिसके बाद अर्जुन सिंह को कांग्रेस आलाकमान ने मुख्यमंत्री बनाया। वह पहली साल 1980 में मुख्यमंत्री बने। इसके बाद उन्होंने दूसरी बार एक साल और तीसरी बार भी एक साल के लिए सीएम की कुर्सी संभाली। इसके बाद वह केंद्र की राजनीति में एक्टिव हो गए। बाद में वह केंद्रीय संचार मंत्री का पद संभाला। फिर राव सरकार में मानव संसाधन मंत्री बने।