Bihar's Ban on Open Meat Sale: बिहार सरकार ने पिछले दिनों खुले में मांस और बगैर लाइसेंस के मांस की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह प्रतिबंध राज्य के शहरी क्षेत्रों में लागू होगा। रमजान से पहले आए फैसले को लेकर नीतीश सरकार की लोग काफी आलोचना कर रहे हैं। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
Ban on open meat sale in Bihar: बिहार सरकार ने हाल ही में शहरी क्षेत्रों में खुले में और बिना लाइसेंस के मांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की है। यह निर्णय राज्य के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा द्वारा विधान परिषद में घोषित किया गया। सरकार ने इसे शहरों को स्वच्छ बनाने की दिशा में कदम बताया है।
हालांकि, इस फैसले से आजीविका, समुदायों और इसके प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर कई सवाल भी उठ रहे हैं। आइए समझते हैं कि यह प्रतिबंध क्या है और इसके संभावित प्रभाव क्या हो सकते हैं।
राज्य में मांस या मछली के उपभोग पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं लगाया गया है। प्रदेश की सरकार ने यह निर्णय लिया है कि सिर्फ शहरी क्षेत्रों में खुले में और बिना लाइसेंस के चल रहे मांस व मछली विक्रय पर लागू होगा। विशेष रूप से सड़कों, साप्ताहिक हाटों या सार्वजनिक स्थानों पर खुले में मांस और मछली की बिक्री पर रोक लगाई गई है। अब मांस और मछली बिक्री सिर्फ उन्हीं लाइसेंस प्राप्त दुकानों में ही की जा सकेगी, जो स्वच्छता मानकों का पालन करेंगी। इसके साथ ही दुकानों में पर्दे या टिंटेड कांच का उपयोग अनिवार्य होगा ताकि मांस बाहर से दिखाई न दे।
बिहार में बड़ी संख्या में लोग मांसाहारी भोजन करते हैं। राज्य में हर साल लगभग 4,20,000 टन मांस और 9,59,000 टन से अधिक मछली का उत्पादन होता है। बिहार देश का चौथा सबसे बड़ा मछली उत्पादक और दसवां सबसे बड़ा मांस उत्पादक राज्य है। पशुपालन क्षेत्र कृषि जीडीपी का 28% और राज्य की कुल जीडीपी का लगभग 20% योगदान देता है।
यह प्रतिबंध खासतौर पर मांस और मछली के छोटे विक्रेताओं को खासतौर पर सड़क किनारे टोकरी में मांस या मछली की बिक्री करते हैं, उन्हें प्रभावित कर सकता है। लाइसेंस, किराया, कांच की व्यवस्था और अन्य मानकों के लिए पूंजी निवेश की आवश्यकता होगी, जिससे छोटे व्यापारियों पर दबाव बढ़ सकता है। बिहार सरकार ने यह फैसला रमजान का महीना शुरू होने से ठीक पहले सुनाया है। जाहिर है कि इससे मुस्लिम मांस व्यापारियों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि क्योंकि यह समय उनके लिए कमाई का महत्वपूर्ण समय होता है।
हालांकि, औपचारिक व्यापार से सप्लाई चेन बेहतर हो सकती है और उत्पाद अधिक सुरक्षित हो सकते हैं। लेकिन यदि सरकार प्रशिक्षण या सब्सिडी जैसी सहायता नहीं देती, तो शहरों में खुले में मांस या मछली बेचने वाले चोरी-छुपे बिक्री में जुट जाएंगे या ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानांतरण की आशंका बनी रहेगी।
बिना लाइसेंस वाले विक्रेताओं को नगर निकायों से अनुमति लेनी होगी। पहले से लाइसेंस प्राप्त दुकानों को निर्धारित क्षेत्रों जैसे बूचड़खानों या अधिसूचित बाजारों में स्थानांतरित किया जा सकता है। उल्लंघन करने पर बिहार नगरपालिका अधिनियम, 2007 (Bihar Municipal Act, 2007) के तहत जुर्माना, सामान जब्त करना या दुकान बंद करना जैसी कार्रवाई की जा सकती है। अधिकारियों को सभी दुकानों की जांच और लाइसेंस सत्यापन का निर्देश दिया गया है।
उपमुख्यमंत्री विजय कुमार सिन्हा ने कहा कि दरभंगा दौरे के दौरान लोगों ने सड़क किनारे मांस बिक्री से गंदगी, दुर्गंध और जाम की शिकायत की थी। फिलहाल, दरभंगा को पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चुना गया, जहां जिला प्रशासन ने अवैध खुले विक्रय पर रोक लगाई। इसके बाद इस मॉडल को पूरे बिहार के शहरी निकायों में लागू किया गया। बिहार की लगभग 11% आबादी शहरी क्षेत्रों में रहती है। सरकार का कहना है कि यह निर्णय किसी विशेष समुदाय या खान-पान की आदत को निशाना बनाकर नहीं लिया गया है।
इस प्रतिबंध के समर्थकों का कहना है कि खुले में खासकर बिहार की आर्द्र जलवायु में मांस बिक्री से स्वास्थ्य जोखिम बढ़ता है। बिना रेफ्रिजरेशन के मांस पर मक्खियां और धूल जमती है, जिससे साल्मोनेला, ई. कोलाई और लिस्टेरिया जैसे बैक्टीरिया का खतरा बढ़ता है। वहीं खुले बाजारों में लिए गए नमूनों में उच्च स्तर के जीवाणु पाए गए हैं। विनियमित दुकानों में बेहतर स्वच्छता सुनिश्चित की जा सकती है।
पॉपुलर ओटीटी सीरीज महारानी के लेखक उमाशंकर सिंह ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि बिहार में खुले में मांस-मछली की खुली बिक्री पर प्रतिबंध का फैसला बिहारी खुलेपन, बिहारी सहजता और इससे भी ज्यादा बिहारीपन पर हमला है। बिहार में पूर्ण शाकाहारी लोगों की तादाद बेहद कम है। ज्यदातार लोग मांसाहारी हैं। मछली प्रेमी हैं। लगभग 99.99 फीसदी विवाह भोज बिना मांसाहार और मछली के नहीं होते। दुर्गा, काली, मां ज्वालामुखी देवी सहित कई देवी देवताओं के मंदिर में पूजा में बलि दी जाता है और उसका सेवन प्रसाद की तरह किया जाता है।
सहरसा में पैदा हुए उमा अपने बचपन के दिनों की याद करते हुए कहते हैं कि हमारे घर में जिस दिन मांस और मछली घर में पकता था, वह दिन खास होता था। घर में सेलीब्रेशन और खुशी वाली फीलिंग आती थी। यह फैसला जिन लोगों ने लिया है, वे बिहार में पैदा जरूर हुए हैं। जनप्रतिनिधि भी बने हैं पर वे बिहार को समझते नहीं हैं। बाहरी वैष्णव संस्कृति की उग्र और असहिष्णु समझदारी से बिहार को चलाया नहीं जा सकता। ये मांस-मछली के फुटकर कारोबार से जुड़े पिछड़ी और गरीब जातियों और समुदायों के व्यवसाय पर भी चोट है और कुपोषण के शिकार और प्रोटीन की कमी से जूझे रहे बिहारियों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी।
मिथिला से ताल्लुक रखने वाले और दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेज एआरएसडी कॉलेज में हिंदी पढ़ानेवाले और कहानीकार श्रीधरम बिहार में मांस और मछली की भोजन-संस्कृति का हवाला देते हुए कहते हैं कि यहां मांस और मछली शादी से लेकर श्राद्ध तक में एक बड़े वर्ग की जीवन पद्धति से जुड़ा हुआ है। ऐसे में इस प्रकार के निर्णय को रमजान से ठीक पहले ऐसा फैसला लिया जाना सिर्फ राजनीति नहीं बल्कि एक वर्ग को परेशान करने के साथ पूरे सामाजिक ताने बाने को प्रभावित करने का इरादा प्रतीत होता है। फैसला लेने वाले लोगों को यह याद रखना चाहिए कि मछली-मांस के उत्पादक और उपभोक्ता हिन्दू और मुस्लिम दोनों हैं। अगर स्वच्छता और स्वास्थ्य के मामले में सरकार सचमुच गंभीर है तो पहले उसे हर मुहल्ले और गांव में इसका विक्रय केंद्र स्थापित करना चाहिए था। अन्यथा, सरकार का निर्णय का परिणाम भी शराबबंदी जैसा ना हो जाए।'
वहीं जब आरा की अनारकली फिल्म के निर्देशक और लेखक अविनाश दास से यह पूछा गया कि आप बिहार में मांस और मछली की खुले में ब्रिकी पर प्रतिबंध को कैसे देखते हैं? इस सवाल के जवाब में उन्होंने पत्रिका से बातचीत में कहा, 'किसी भी सरकार का असली चेहरा उसके बड़े-बड़े भाषणों से नहीं, उसके छोटे-छोटे आदेशों से समझ में आता है। खुले में मांस और मछली की बिक्री पर रोक का यह आदेश सिर्फ़ एक प्रशासनिक फैसला नहीं है; यह सत्ता द्वारा रोज़मर्रा की ज़िंदगी में दख़ल का एक प्रतीक है।' अविनाश दास बिहार के मिथिला क्षेत्र से आते हैं।
उन्होंने कहा, 'बिहार की गलियों में सदियों से मछली और मांस की खुली दुकानों ने सिर्फ़ व्यापार नहीं किया है, उन्होंने एक सामाजिक ताना-बाना रचा है। ये दुकानें उन समुदायों की जीविका हैं जिनकी आवाज़ सत्ता के गलियारों तक शायद ही पहुंचती है। जब आप अचानक “स्वच्छता” या “क़ानून व्यवस्था” के नाम पर उन्हें हटा देते हैं, तो असल सवाल यह नहीं होता कि दुकान ढकी है या खुली। असल सवाल यह होता है कि किसके जीवन पर नियंत्रण स्थापित किया जा रहा है, और किसके जीवन को नैतिक कसौटी पर कसा जा रहा है।'
उन्होंने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा, 'रमज़ान से ठीक पहले लिया गया यह निर्णय संयोग है या संकेत? सत्ता अक्सर अपने फैसलों को तकनीकी भाषा में पेश करती है, ताकि उनके राजनीतिक अर्थ पर चर्चा ही न हो। लेकिन समय का चुनाव ही संदेश देता है। जब कोई आदेश ऐसे दौर में आता है, तो वह सिर्फ़ बाजार को नहीं, सामाजिक विश्वास को भी प्रभावित करता है।'
अविनाश कहते हैं, 'अगर सचमुच उद्देश्य स्वच्छता है, तो फिर सवाल उठेगा। क्या राज्य ने उन विक्रेताओं को बेहतर ढांचे, लाइसेंसिंग की सरल प्रक्रिया, या आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध कराई है? या फिर सबसे आसान रास्ता चुना गया है- प्रतिबंध? प्रतिबंध हमेशा सबसे कमज़ोर पर लागू होता है, क्योंकि वही प्रतिरोध नहीं कर पाता।'
वह बिहार सरकार से सवाल पूछते हुए कहते हैं, 'क्या हम खान-पान को नैतिकता का पैमाना बनाकर समाज को विभाजित करना चाहते हैं? लोकतंत्र का अर्थ यह नहीं कि बहुसंख्यक की पसंद अल्पसंख्यक की थाली तय करे। जब राज्य भोजन की संस्कृति में हस्तक्षेप करता है, तो वह सिर्फ़ बाजार नहीं, नागरिक की स्वायत्तता को भी नियंत्रित करता है। सरकारें अक्सर यह मान लेती हैं कि जनता भूल जाती है। लेकिन जनता अपने जीवन के छोटे-छोटे अपमानों को याद रखती है। यदि यह फैसला वास्तव में जनहित में है, तो उसे पारदर्शिता, संवाद और विकल्पों के साथ आना चाहिए था- न कि अचानक आदेश की तरह। एक लोकतांत्रिक सरकार की मज़बूती इस बात में नहीं कि वह क्या बंद करा सकती है, बल्कि इस बात में है कि वह विविधताओं को कैसे साथ लेकर चलती है। अगर कोई निर्णय समाज में अविश्वास, भय और विभाजन को जन्म देता है, तो उसे पुनर्विचार की आवश्यकता है- क्योंकि शासन का उद्देश्य नागरिकों को अनुशासित करना नहीं, उन्हें सम्मान देना है।
यह प्रतिबंध किसी नए कानून के तहत नहीं लगाया गया है, बल्कि राज्य में पहले से ही इसके लिए कानून बना हुआ जिसे अब संभवतया सख्ती से अनुपालन किया जाएगा। बिहार नगरपालिका एक्ट 2007 (Bihar Municipal Act, 2007) की धारा 345 के अनुसार, बिना लाइसेंस कोई भी व्यक्ति मछली या पोल्ट्री का व्यवसाय नहीं कर सकता। इस बारे में नगर निकाय स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और स्थान संबंधी शर्तें तय कर सकते हैं। इसके अलावा बिहार में (Bihar Preservation and Improvement of Animals Act, 1955) के तहत गायों के वध पर रोक है, जबकि 15 वर्ष से अधिक आयु के या बीमार बैलों के वध की अनुमति है।
-बिहार नगरपालिका अधिनियम 2007 के तहत बगैर लाइसेंस के कोई भी व्यक्ति मछली, मुर्गी का व्यवसाय नहीं कर सकता
- बिहार पशु संरक्षण एवं सुधार अधिनियम 1955 के तहत गायों और 15 वर्ष से कम आयु क बैलों का वध नहीं किया जा सकता
- इसके अलावा छठ पूजा और सावन जैसे त्योहारों के दौरान मंदिरों के पास मांस बिक्री पर रोक लगाई जाती रही है।
नगर निकायों पर निरीक्षण और लाइसेंसिंग की जिम्मेदारी होगी। लेकिन कई शहरों में आधुनिक बूचड़खानों या निर्धारित बाजारों की कमी है। पूर्व में ऐसे अभियान भ्रष्टाचार और निगरानी की कमी के कारण असफल रहे हैं। कर्मचारियों की कमी और संकरी गलियों में हजारों विक्रेताओं की मौजूदगी भी चुनौती होगी। इस कदम की सफलता बुनियादी ढांचे के निर्माण और विक्रेताओं को समर्थन देने पर निर्भर करेगी, लेकिन फिलहाल ऐसी कोई ठोस योजना घोषित नहीं की गई है।