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तांगे की टक-टक से ई-लाइब्रेरी तक: बीकानेर में 25 साल से गलियों तक किताबें पहुंचा रहा अनूठा चल-पुस्तकालय

Tanga Library: मोबाइल से पहले मनोरंजन का यह अंदाज खास था। दोपहर में तांगा रुकता और मोहल्ले में गूंजती थी एक आवाज, ‘तांगा पुस्तकालय आ गया’। यह अनूठा प्रयोग तकरीबन 13 साल चला। साल 2010 में बंद हुआ, तो 2022 में ई-वाहन के साथ फिर लौटा। इस खास पुस्तकालय के बारे में ​बृजेश सिंह बता रहे हैं।
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Aug 14, 2026
Tanga Library Bikaner Bikaner Mobile Library
बीकानेर का चल पुस्तकालय (Photo: Rajasthan Patrika)

Tanga Library Bikaner: आज जब किताब तक पहुंचने के लिए मोबाइल की स्क्रीन पर कुछ शब्द टाइप करना काफी है, तब बीकानेर की गलियों में किताबें खुद लोगों तक पहुंचती थीं। दोपहर का वक्त होता। तांगे पर किताबें, पत्रिकाएं, खिलौने और दरी सजती और उसकी ‘टक-टक… टक-टक…’ की आवाज सुनते ही मोहल्ले के लोग घरों से बाहर निकलने लगते। बच्चों से लेकर बड़े तक जानते थे…‘तांगा पुस्तकालय आ गया।’

यह कोई कहानी, फिल्म या बीते जमाने का दृश्य नहीं, बल्कि बीकानेर में करीब 25 वर्ष पहले शुरू हुआ एक ऐसा प्रयोग था, जिसने पुस्तकालय को चारदीवारी से निकालकर सीधे गली-मोहल्लों तक पहुंचा दिया। अजित फाउंडेशन की ओर से शुरू किए गए इस चल-पुस्तकालय का मकसद केवल किताबें बांटना नहीं था, बल्कि पढ़ने की आदत को लोगों के बीच ले जाना था। खास बात यह रही कि जिस दौर में पुस्तकालय तक पहुंचने के लिए पाठक को जाना पड़ता था, उस समय इस पुस्तकालय ने उलटा रास्ता चुना। पुस्तकालय ही पाठक के पास पहुंचने लगा।

दोपहर एक बजे निकलता था ‘किताबों का तांगा’

संस्था से जुड़े भवानीशंकर बताते हैं कि शुरुआत में तांगे को ही चलती-फिरती लाइब्रेरी का रूप दिया गया था। रोजाना दोपहर करीब एक बजे तांगे को पुस्तकों और मैग्जीन से सजाया जाता। उसके साथ दरी, खिलौने, रजिस्टर और दूसरी जरूरी सामग्री रखी जाती। तांगे की आवाज ही उसकी पहचान बन गई थी। जैसे ही किसी मोहल्ले में टक-टक की आवाज सुनाई देती, लोगों को पता चल जाता कि पुस्तकालय उनके पास पहुंच गया है। धीरे-धीरे लोग घरों से निकलकर तांगे के आसपास जुटने लगते। किसी के लिए वहां कहानी की किताब आकर्षण होती, तो किसी के लिए पत्रिका। बच्चों के लिए किताबों के साथ खिलौने भी खींच लाते थे। इस तरह पुस्तकालय केवल किताबों का ठिकाना नहीं रहा, बल्कि मोहल्ले में मिलने-जुलने और पढ़ने का एक छोटा-सा केंद्र बन गया।

हर दिन अलग मोहल्ला, तय था समय

चल-पुस्तकालय को लेकर बाकायदा समय-सारिणी बनाई गई थी। तांगा रोजाना अलग-अलग स्थानों पर पहुंचता था। शीतला गेट, तेलीवाड़ा, मोहता चौक, बारह गुवाड़, व्यासों का चौक, गोश्वामी चौक, भाटों का बास, नत्थूसर गेट और बीके स्कूल के पास सहित कई स्थान इसके पड़ाव रहे। यानी पुस्तकालय की सदस्यता लेने या किताब पढ़ने के लिए लोगों को किसी बड़े भवन तक जाने की जरूरत नहीं थी। जिस मोहल्ले में पुस्तकालय का दिन होता, उसी मोहल्ले में किताबों का ठिकाना बन जाता। यह प्रयोग करीब 13 साल तक लगातार चलता रहा।

2010 में थमा सफर, 12 साल बाद फिर शुरू

करीब 13 वर्षों तक संचालन के बाद किसी कारणवश यह चल-पुस्तकालय वर्ष 2010 में बंद हो गया। इसके साथ ही तांगे की वह टक-टक भी बीकानेर की गलियों से गायब हो गई। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। 8 अप्रेल 2022 को चल-पुस्तकालय को फिर शुरू किया गया। इस बार समय बदल चुका था, इसलिए साधन भी बदल गया। तांगे की जगह ई-वाहन ने ले ली। अब यह वाहन भी सामान्य वाहन नहीं है। इसे इस तरह डिजाइन किया गया है कि बाहर से ही छोटी लाइब्रेरी जैसा एहसास हो। इसमें कांच की अलमारियां बनाई गई हैं, जिनमें रखी किताबों को आसानी से देखा जा सकता है। तांगे से ई-वाहन तक का यह बदलाव केवल समय के साथ तकनीक बदलने की कहानी नहीं है। संस्था के अनुसार, ई-वाहन चुनने के पीछे प्रदूषण से बचाव का उद्देश्य भी है।

अब तांगे की जगह ई-वाहन, लेकिन मकसद वही

फाउंडेशन से जुड़े संजय श्रीमाली बताते हैं कि लंबे अंतराल के बाद जब चल-पुस्तकालय दोबारा शुरू किया गया, तो इसका उद्देश्य नई पीढ़ी को पढ़ने-पढ़ाने से जोड़ना रहा। पहले चल-पुस्तकालय पूरे अंदरूनी शहर में अलग-अलग मोहल्लों तक पहुंचता था। फिलहाल इसका संचालन कुछ गली-मोहल्लों तक सीमित है। संस्था से जुड़े लोगों के अनुसार आने वाले समय में इसे फिर पूरे शहर में संचालित करने की योजना है।

  • आज भी प्रत्येक मोहल्ले में 50 से अधिक लोग इस चल-पुस्तकालय से जुड़े हुए हैं।
  • एक बार में करीब 200 किताबें लेकर निकलता है ई-वाहन
  • आज के चल-पुस्तकालय में एक बार में करीब 200 पुस्तकें ले जाई जाती हैं। इनमें कहानियां, कविताएं और -बच्चों के लिए चित्रों के साथ प्रकाशित कविताओं और कहानियों की किताबें शामिल हैं। यानी डिजिटल दौर में भी यहां चयन का केंद्र बच्चों और पाठकों की रुचि वाली मुद्रित किताबें ही हैं।

सबसे दिलचस्प बात: पुस्तकालय की दिशा उलट दी

इस पूरे प्रयोग की सबसे खास बात शायद यही है कि इसने पुस्तकालय की पारंपरिक परिभाषा को ही उलट दिया। आमतौर पर पुस्तकालय में किताबें एक जगह रहती हैं और पाठक वहां पहुंचता है।

बीकानेर के इस प्रयोग में किताबें चल पड़ीं और पाठक अपनी जगह पर ही रहकर उनसे जुड़ने लगा। करीब 25 साल के इस सफर में माध्यम बदल गया। पहले तांगा था, अब ई-वाहन है। पहले तांगे की टक-टक मोहल्ले को खबर देती थी, आज डिजाइन किया हुआ ई-वाहन किताबों की पहचान बन गया है। लेकिन मूल विचार आज भी वही है। किताब उस व्यक्ति तक पहुंचे, जो शायद खुद पुस्तकालय तक न पहुंच पाए। और शायद यही वजह है कि मोबाइल और डिजिटल मनोरंजन के दौर में भी बीकानेर की गलियों में चलने वाली यह छोटी-सी लाइब्रेरी आज भी अपने होने का अर्थ बचाए हुए है।

Updated on:
14 Aug 2026 02:44 pm
Published on:
14 Aug 2026 02:44 pm