CG News: छत्तीसगढ़ के नवागढ़ में पानी परिस्थितियों प्रोत्साहन और सरकारी परख के अभाव में पुरखों की अमूल्य निशानी धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। बेमेतरा जिले की नवागढ़ विधानसभा अंतर्गत हांफ नदी के तट पर बस्छ ग्राम करमन केवल एक गांव नहीं, बल्कि अमरूद का एक पहचाना हुआ ब्रांड रहा है। बाजार में करमन की […]
CG News: छत्तीसगढ़ के नवागढ़ में पानी परिस्थितियों प्रोत्साहन और सरकारी परख के अभाव में पुरखों की अमूल्य निशानी धीरे-धीरे दम तोड़ रही है। बेमेतरा जिले की नवागढ़ विधानसभा अंतर्गत हांफ नदी के तट पर बस्छ ग्राम करमन केवल एक गांव नहीं, बल्कि अमरूद का एक पहचाना हुआ ब्रांड रहा है। बाजार में करमन की बिही (अमरूद) का नाम सुनते ही ग्राहक उसे हाथों-हाथ खरीद लेते थे, लेकिन आज वहीं पहचान मिटने की कगार पर है।
कभी गांव में लगभग सौ एकड़ श्ररफल में अमरूद की खेती होती थी। सुबह की शुरुआत हाफ नदी की कलकल ध्वनि, कोयल की कुक और तोतों की मधुर बोली से होती थी। आज वही दृश्य कटते पेड़ और टूटती डालिया बया कर रही है की करमन की यह विरासत अंतिम सांसे गिन रही है।
धान के लालच में उजड़ते बगीचे
ग्रामीणों के अनुसार अमरूद की खेती से नई पीढ़ी का मोहभंग, धान की खेती से त्वरित लाभ की चाह, अमरुद उत्पादक किसानों को न तो कोई प्रोत्साहन मिला और न ही फसल बीमा जैसी सुविधाएं, इन्हीं कारणों से किसान बिही बगीचे उजाड़ने को मजबूर हुए। अब उन्हीं जमीनों पर अरहर, गेहूं और चना बोया जा रहा है, ताकि साल में दो फसल लेकर निश्चित आमदनी हो सके।
मेरा गांव बदल रहा है
गजराज, जो हाल के में काबीजाकर की खेती कर रहे हैं, बताते हैं कि अबयत लगभग दस पकड़ में ही अपस्त रह मम है। वे कहते हैं, वाभीहर परियार के पास अनरूद का बीया था. आज उसका नामोनिशान नहीं राजेश रिव्कुमार, वनताय, नोहित
असऔरत जैसे कभी अमस्थ बेकर घर चहाते में खुद खाने के बार खरीदते हैं। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते पानी बाद और पोल्सन की समुचित व्यवस्था दिलीपजबकि गुलजार होता।
बाजार से भी गायब हुई 'करमन की बिही
नवागढ़ बाजार के जानकार व्यापारी छन्नू मोनी बताते हैं सोनी बताते हैं कि उन्होंने पिछले साठ वर्षों से बाजार में करमन की बिही बिकते देखी ह। पूरे क्षेत्र में इसी गांव से अमरुद की आपूर्ति होती थी,लेकिन इस वर्ष बाजार में यह लगभग नदारद है। उनका कहना है कि धान की खेती में अधिक लाभ के चलते आसपास के गावों में भी छोटे-बड़े बगीचे उजाड़ दिए गए। गमलों में की जा रही प्रतीकात्मक खेती से बड़े पैमाने पर उत्पादन की उम्मीद अब बेमानी है।
कुछ पौधों का संघर्ष अब भी जारी
गांव के एक बगीचे में अब भी कुछ अमरुद के पेड़ फलों से लदे है। वहीं युवा किसान महेंद्र भार्गव अमरुद के साथ टमाटर, करेला, धनिया और सेमी की मिश्रित खेती कर रहे है। महेंद्र बताते है कि लगातार जल संकट बगीचे में स्थायी निवास की कठिनाई और घटते उत्पादन के कारण किसान पौधे छोड़कर चले गए। गांव में आम के पेड़ भी पर्याप्त है, लेकिन किसान अब उनकी ओर देखने को तैयार नहीं। सबसे चिंताजनक बात यह है कि आज तक अमरुद उत्पादक किसानों से मिलने कोई भी सरकारी अधिकारी गांव नहीं पंहुचा।
अमरूद की विरासत से बेखबर तंत्र
राज्य सरकार के पास फ़िलहाल ऐसी कोई विशेष योजना नहीं है, जिससे किसानों को सीधा सहयोग दिया जा सके। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि यह भी विषय नेशनल हॉटीकल्चर मिशन से जुड़ा है। हालांकि उन्होंने फील्ड स्टाफ भेजकर जानकारी लेने की बात कही। चौकाने वाली बात यह रही कि विभाग को करमन गांव की इस ऐतिहासिक उपलब्धि की स्पष्ट जानकारी ही नहीं थी।
हितेंद्र मिश्रा
उप संचालक उद्यानिकी