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Akshaya Tritiya 2026: छत्तीसगढ़ में अक्ती में बिना मुहूर्त देखे गूंजती है शहनाई, पूरा गांव बन जाता है बाराती

Akshaya Tritiya 2026: अक्ती को “अबूझ मुहूर्त” भी माना जाता है, यानी इस दिन बिना किसी ज्योतिषीय गणना के शुभ कार्य किए जा सकते हैं। शादी-विवाह, गृह प्रवेश और नए कार्यों की शुरुआत के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।

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Apr 20, 2026

Akshaya Tritiya 2026: @ ताबीर हुसैन। छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति में ‘अक्ती’ यानी अक्षय तृतीया का विशेष महत्व है। इसे प्रदेश का पहला और सबसे बड़ा तिहार (त्योहार) माना जाता है, जो नई शुरुआत, समृद्धि और शुभता का प्रतीक है। यह पर्व खासतौर पर किसानों के लिए बेहद अहम होता है। अक्ती के दिन किसान खेती-किसानी के कामों की शुरुआत करते हैं। हल (नांगर), बैलों और खेती के औजारों की पूजा की जाती है और अच्छी फसल की कामना की जाती है।

ग्रामीण इलाकों में इस दिन का अलग ही उत्साह देखने को मिलता है—लोग पारंपरिक वेशभूषा में पूजा-अर्चना करते हैं और अपने खेतों में जाकर प्रतीकात्मक रूप से हल चलाते हैं। अक्ती को “अबूझ मुहूर्त” भी माना जाता है, यानी इस दिन बिना किसी ज्योतिषीय गणना के शुभ कार्य किए जा सकते हैं। शादी-विवाह, गृह प्रवेश और नए कार्यों की शुरुआत के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना जाता है।

छत्तीसगढ़ की माटी का सबसे बड़ा और पहला तिहार ’अक्ती’ (अक्षय तृतीया) प्रदेश की लोक-संस्कृति, आस्था और कृषि परंपराओं का जीवंत संगम है। छत्तीसगढ़ी गीतकार विष्णु कोठारी बताते हैं कि इस दिन का महत्व इतना गहरा है कि इसे किसी पंचांग या ज्योतिषी से मुहूर्त पूछने की आवश्यकता नहीं पड़ती। छत्तीसगढ़ी जनजीवन में विश्वास है कि अक्ती का हर क्षण शुभ है, इसीलिए इसे ’अबूझ मुहूर्त’ माना जाता है और बिना किसी संशय के इस दिन विवाह होते हैं।

जब गांव बन जाता है बाराती

यदि किसी वर्ष गांव में किसी युवक या युवती की शादी नहीं होती, तो उस साल को ’खाली’ जाने से बचाने के लिए पूरा गांव एकजुट हो जाता है। मोहल्ले के लोग वर और वधू पक्ष में बंटकर मिट्टी के गुड्डा-गुडिय़ा (पुतरा-पुतरी) का ब्याह रचाते हैं। इसमें तेल-हल्दी की रस्म से लेकर, बारात, नाचना-गाना और
टिकावन तक के तमाम ’नेग-दस्तूर’ वैसे ही निभाए जाते हैं जैसे एक असली शादी में होते हैं।

अमंगलकारी शक्तियों से रक्षा और ’हाथ बंधन’

अक्ती की रात का आध्यात्मिक महत्व बताते हुए कोठारी कहते हैं कि गांव की रक्षा के लिए शीतला मंदिर से बैगा और ग्रामीण सहयोगी निकलते हैं। वे गांव की चारों दिशाओं और प्रत्येक घर जाकर ’हाथ बंधन’ के रूप में कील गाड़ते हैं, ताकि कोई भी अमंगलकारी तत्व गांव की सीमा में प्रवेश न कर सके।
पलाश के पत्तों का उपयोग: छत्तीसगढ़ में अक्ती से ही नया कृषि वर्ष शुरू होता है। शीतला मंदिर में धान की बोआई, कटाई और मिजाई तक का औपचारिक नेग पूरा किया जाता है। खास बात यह है कि इसी दिन से परसा (पलाश) के पत्तों का उपयोग शुरू होता है।

पूर्वजों को याद करने का दिन ’पुरखा मिलाना’

धार्मिक ²ष्टि से यह दिन पूर्वजों को याद करने का भी है। इस दिन उन पुरखों को जो स्वर्ग सिधार चुके हैं, उन्हें कुल देवता में मिलाया जाता है और उनकी विशेष पूजा की जाती है। इसे छत्तीसगढ़ी में ’पानी देना’ या ’पुरखा मिलाना’ कहा जाता है। कुल मिलाकर, अक्ती केवल एक त्योहार नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की माटी, मानुष और परंपराओं को अक्षुण्ण रखने वाला एक महापर्व है।

Updated on:
20 Apr 2026 03:00 pm
Published on:
20 Apr 2026 02:54 pm
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