
Diwali 2026 : छत्तीसगढ़ में दिवाली का त्योहार रोशनी, खुशियों और समृद्धि का प्रतीक है, लेकिन प्रदेश के कुछ गांवों में दीपोत्सव की तारीख सामान्य पंचांग से अलग होती है। कहीं दिवाली पांच दिन बाद मनाई जाती है, तो कहीं सात दिन पहले ही घर-आंगन दीपों से जगमगा उठते हैं।
मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के आदिवासी बहुल गांवों और धमतरी जिले के सेमरा (सी) में पीढ़ियों से चली आ रही परंपराएं आज भी कायम हैं। इन गांवों में त्योहार मनाने का समय केवल कैलेंडर से तय नहीं होता, बल्कि स्थानीय मान्यताओं, ग्राम देवताओं और पूर्वजों से मिली परंपराओं से जुड़ा है। 2026 की दिवाली के मौके पर इन गांवों की अनोखी रीति-रिवाज छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विविधता की एक अलग तस्वीर पेश करते हैं।
मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी जिले के अंबागढ़ चौकी ब्लॉक के चिल्हाटी क्षेत्र के कई गांवों में सामान्य पंचांग की तिथि से पांच दिन बाद दिवाली मनाई जाती है। इनमें झिटिया, सांगरी, केसाल डबरी, हेमलकोड़ो, टाटेकसा, खडखड़़ी, मुंजाल, विचारपुर और ठाकुरबांधा जैसे गांव शामिल हैं। यहां के ग्रामीणों के अनुसार, यह परंपरा लंबे समय से चली आ रही है और आज भी गांव के लोग उसी रीति का पालन करते हैं।
स्थानीय परंपरा के जानकार बताते हैं कि इन क्षेत्रों में तीज-त्योहारों की तिथियों का संबंध देव शास्त्र और गोंडी लिपि में दर्ज मान्यताओं से जोड़ा जाता है। इसी परंपरा के अनुसार, अमावस्या के बजाय पंचमी को लक्ष्मी पूजा की जाती है। पूजा के बाद घरों में मिठाइयां बांटी जाती हैं और आतिशबाजी के साथ उत्सव मनाया जाता है।
ग्रामीणों के लिए यह केवल पूजा की तारीख बदलने का मामला नहीं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक पहचान और पूर्वजों की विरासत को आगे बढ़ाने का अवसर भी है।
इन गांवों में लक्ष्मी पूजा के अगले दिन गोवर्धन पूजा का आयोजन होता है। ग्रामीण गौठान में एकत्र होकर ग्राम देवता की पूजा करते हैं। इसके बाद कुम्हड़े को गायों के पैरों से ढुलाने की परंपरा निभाई जाती है। शाम को इसी कुम्हड़े की खिचड़ी बनाकर प्रसाद के रूप में ग्रामीणों के बीच बांटी जाती है।
पूजा-पाठ के साथ पारंपरिक गीत, नृत्य और सामूहिक भ्रमण भी उत्सव का हिस्सा होते हैं। ग्रामीण नाचते-गाते गांव में घूमते हैं और ठाकुर दैया की पूजा सहित अन्य स्थानीय रीति-रिवाजों का निर्वहन करते हैं। इस तरह त्योहार धार्मिक आस्था के साथ सामुदायिक मेल-मिलाप और लोकसंस्कृति को भी मजबूत करता है।
धमतरी जिले की सीमा से करीब दो किलोमीटर दूर स्थित ग्राम सेमरा (सी) में दिवाली सामान्य तिथि से सात दिन पहले मनाने की परंपरा है। यह रीति केवल दिवाली तक सीमित नहीं है। ग्रामीणों के अनुसार, यहां होली, हरेली और पोला जैसे प्रमुख त्योहार भी पंचांग में निर्धारित तिथि से पहले मनाए जाते हैं। गांव के उत्सव में धमतरी जिले के साथ बालोद जिले की सीमा से लगे गांवों के लोग भी शामिल होते हैं।
ग्रामीण मदनलाल सिन्हा और अन्य लोगों के अनुसार, इस परंपरा का संबंध सिदारदेव से जुड़ी लोकमान्यता से है। बताया जाता है कि कई वर्ष पहले सिदार नाम के बुजुर्ग गांव में रहने आए थे। ग्रामीण उनकी शक्तियों और उनके प्रति आस्था से जुड़ी कहानियां सुनाते हैं। समय के साथ सिदारदेव का मंदिर स्थापित हुआ और त्योहारों को पहले मनाने की परंपरा कायम हो गई।
ग्रामीणों के मुताबिक, एक बार गांव में होली सामान्य पंचांग की तिथि पर मनाने का प्रयास किया गया था। इसी दौरान एक घर में आग लग गई। ग्रामीणों का कहना है कि काफी प्रयास के बाद भी आग नहीं बुझी और सिदारदेव की पूजा के बाद आग शांत हुई। इस घटना को गांव के लोग अपनी आस्था से जोडकऱ देखते हैं। इसके बाद किसी ने परंपरा बदलने की पहल नहीं की।
हालांकि, इस घटना को ग्रामीणों की मान्यता के रूप में ही देखा जाना चाहिए। गांव में त्योहारों की तारीख और पूजा की विधि आज भी सामूहिक परंपरा के आधार पर तय होती है।