रायपुर। युवाओं को अपनी ही भाषा में नौकरी और अवसर मिलेंगे, तभी वे गर्व से छत्तीसगढ़ी को अपनाएंगे। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और आत्मसम्मान की पहचान है।
रायपुर @ ताबीर हुसैन। छत्तीसगढ़ की माटी से जुड़ी छत्तीसगढ़ी भाषा आज पहचान और सम्मान की लड़ाई लड़ रही है। घर-आंगन और लोकगीतों तक सीमित यह बोली तभी सशक्त जनभाषा बन पाएगी, जब इसे रोजगार, शिक्षा और प्रशासन से जोड़ा जाएगा। जब युवाओं को अपनी ही भाषा में नौकरी और अवसर मिलेंगे, तभी वे गर्व से छत्तीसगढ़ी को अपनाएंगे। भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और आत्मसम्मान की पहचान है। छत्तीसगढ़ी को रोजगार से जोड़ने से न सिर्फ यह मजबूत होगी, बल्कि प्रदेश की अन्य बोलियों और लोकभाषाओं को भी नई ऊर्जा और संरक्षण मिलेगा।
छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग के नवनियुक्त अध्यक्ष प्रभात मिश्र 'पत्रिका' कार्यालय पहुंचे। यहां आत्मीय जोहार के साथ शुरू हुई चर्चा में उन्होंने आयोग के उद्देश्य, आठवी अनुसूची, शिक्षा में मातृभाषा, आदिम बोलियों के संरक्षण डिजिटल विस्तार और सबसे महत्वपूर्ण रोजगार की संभावनाओं पर विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि भाषा तभी मजबूत होगी जब उससे अवसर और आजीविका जुड़े। संरक्षण, समावेश और रोजगार इन्हीं आधारों पर बोलियों को आगे बढ़ाया छत्तीसगडी तथा राज्य की सभी जाएगा। पेश है मिश्र में बातचीत के संपादित अंश।
विश्वविद्यालयों में छत्तीसगढ़ी के कोर्स हैं, पर रोजगार सीमित विवखता है। इस पर क्या करेंगे?
जब तक भाषा से रोजगार नहीं तब तक विश्वास पूर्ण रूप से स्थापित नहीं होगा। छत्तीसगढ़ी रोजगार से जुड़ेगी तभी जनभाषा बनेगी आयोग काकरण निर्माण करेगा ताकि छत्तीसगढ़ी पड़े हुए विद्यार्थियों को शिक्षण, अनुवाद, मीडिया सास्कृतिक साँध, निजिटल कंटेंट निर्माण और प्रशासनिक क्षेत्रों में अवसर मिले। यदि हम भाषा को तीति, तकनीक और बजार से जोड़ेंगे तो रोजगार को सभावनाएं स्वतः बढ़ेगी।
आठवीं अनुसूची को लेकर क्या स्थिति है?
विधानसभा में सकल्प पारित कर केंद्र की भेजा गया था। जनप्रतिनिधियों के माध्यम से प्रयास जारी हैं। हमारा लक्ष्य है. किं छत्तीसगढ़ी को संवैधानिक मान्यता मिले।
शिक्षा में मातृभाषा के समावेश पर आपका दृष्टिकोण ?
नई शिक्षा नीति 2020-26 में मातृभाषा को प्राथमिकता दी गई है। आयोग प्रयास करेगा कि प्राथमिक स्तर पर छत्तीसगढ़ी, हल्बी या अन्य स्थानीय बोलियों को मातृभाषा माध्यम या सह-साथन के रूप में शामिल किया जाए। इससे बच्चों की समझ और आत्मविश्वास दोनों बढ़ेंगे।
आदिम बोलियों के संरक्षण लिए क्या योजना है?
हल्दी, गोडी जैसी जनजातीय बोलियों के रामृद्ध इतिहास के संरक्षण संपोषण को बल दिया जाएगा। वैज्ञानिक तरीकों से लिपियों, पांडुलिपियों और रचनाओं का व्यवस्थित संकालन होगा, जिससे शोध को नई दिशा मिलेगी।
डिजिटल युग में छत्तीसगढ़ी को कैसे बढ़ाया जाएगा?
हम ऑडियो-पॉडकास्ट, यूट्यूब शॉट्स एनिमेशन और लघु स्थानीय बोलियों में बनवाने का प्रयास करेंगे। डिजिटल उपस्थिति से युवा पीढ़ी जुड़ाव महसूस करेगी।
आकाशवाणी और दूरदर्शन में छत्तीसगढ़ी फिल्मी क्यों क्यों नहीं बजाए जाते?
प्रसारण संस्थानों की अपनी नीतियां होती हैं। फिर भी हमारा प्रयास रहेगा कि छत्तीसगढ़ी फिएम और संगीत तद्योग को मजबूत किया जाए, ताकि गुणवतापूर्ण सामग्री अधिक मंच प्राप्त करें।
जब छत्तीसगढ़ी भाषा रोजगार, शिक्षा और प्रशासन से जुड़ेगी, तभी वह वास्तविक अर्थों में जनभाषा बनेगी। इससे न केवल युवाओं का भविष्य सशक्त होगा, बल्कि प्रदेश की अन्य बोलियों को भी संरक्षण और पहचान मिलेगी।