रायपुर।गेमिंग और मनोरंजन के नाम पर मोबाइल का बढ़ता इस्तेमाल अब लत का रूप ले चुका है। यह लत बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है।
रायपुर। आज के डिजिटल युग में मोबाइल फोन बच्चों की ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गया है। पढ़ाई, गेमिंग और मनोरंजन के नाम पर मोबाइल का बढ़ता इस्तेमाल अब लत का रूप ले चुका है। यह लत बच्चों के शारीरिक, मानसिक और सामाजिक विकास को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है।
इन दिनों बच्चों में गेमिंग एडिक्शन तेजी से बढ़ रहा है और हाल ही में गाजियाबाद में तीन बहनों की खुदकुशी ने इसे गंभीर सामाजिक बहस के केंद्र में ला दिया है। इसी संदर्भ में पत्रिका ऑफिस में पैरेंट्स के लिए एक टॉक शो आयोजित किया गया जिसका विषय था गेमिंग की गिरफ्त में बचपन जिम्मेदारी किसकी?
बड़ो को खुद उदहारण बनना होगा
फिल्म वितरक ललित सिन्हा ने कहा कि पेरेंट्स को चाहिए कि वे बच्चों के सामने खुद मोबाइल में व्यस्त न रहें। बच्चों को खेलकूद और अन्य गतिविधियों में शामिल करें। अगर बड़े खुद सुधार लाएं,तो बच्चों को सुधारने की जरुरत काफी हद तक कम हो जाती है।
रात 9 बजे के बाद मोबाइल लॉकडाउन हो
होम्योपैथी स्पेशलिस्ट नीता शर्मा ने कहा कि गेमिंग की लत के कारण बच्चे देर रात तक जग रहे हैं, जिससे कई बीमारियां हो रही है। उन्होंने रात 9 बजे के बाद मोबाइल लॉकडाउन की जरूरत बताई और स्कूलों में न्यूज पेपर पढ़ने की आदत डालने पर जोर दिया।
मोबाइल व्रत की जरूरत
भारतीय स्त्री शक्ति की प्रांच सचिव भारवि वैष्णव ने कहा कि जैसे सेहत और धर्म के लिए व्रत रखते है,वैसे ही मोबाइल व्रत भी जरुरी है। इसकी शुरुवात अगर बड़े करेंगे तो बच्चे भी उसका अनुसरण करेंगे। बच्चों की काउंसिलिंग और संस्कार जरूरी हैं। स्कूल में एंट्री से पहले मोबाइल जमा कराना चाहिए।
ओवर पैरेटिंग भी जिम्मेदार
स्पेशल चाइल्ड काउंसलर पद्मा शर्मा ने कहा कि मोबाइल की लत के लिए ओवर पेरेंटिंग भी जिम्मेदार है। बच्चों को चुप कराने के लिए मोबाइल देना आगे चलकर आदत बन जाता है।
मोबाइल छीनना नहीं, बाउंड्री तय करें
स्टार्टअप फाउंडर कनिका सिंह चोपड़ा ने कहा कि बच्चों से मोबाइल छीनने के बजाय उन्हें सीमाएं समझानी चाहिए। घर के कामों में बच्चों को शामिल कर उन्हें व्यस्त राधा जा सकता है।
प्रकृति से जोड़ना होगा
पर्यावरणविद मोहन वर्ल्यानी ने कहा कि बच्चों को मोबाइल से दूर सखने के लिए आउटडोर एक्टिविटीज और प्रकृति से जोड़ना जरूरी है। आज स्तिथि यह है कि बच्चे आम के पेड़ तक नहीं पहचान पा रहे है।
घर में मोबाइल फ्री जोन बनाएं
महाराष्ट्र मंडल के ऑब्ज़र्वर रविंद्र ठेगडी ने कहा कि बच्चो को मोबाइल से दूर रखने लिए बड़ो को पहल करनी होगी। घर में मोबाइल फ्री जोन बनाना और अनुसाशन जरुरी है।
बच्चों को इमोशनली स्ट्रॉन्ग बनाएं
आईआईटी पासआउट और स्टार्टअप चला रहे ललित चोपड़ा ने कहा कि बच्चों को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाना जरुरी है। मोबाइल देना हो तो उसके लिए लिए स्पष्ट समय सीमा तय होना चाहिए।