
World Coconut Day: नारियल अब सिर्फ पूजा की थाली का हिस्सा नहीं रहा। दुर्ग-भिलाई में इसकी बढ़ती खपत ने इसे एक बड़े कारोबार और रोजगार का आधार बना दिया है। छत्तीसगढ़ में नारियल का उत्पादन नहीं होने के बावजूद दुर्ग-भिलाई में हर महीने करीब 80 से 90 लाख नारियल बिक रहे हैं। इनमें सामान्य नारियल के साथ नारियल पानी के लिए डाप नारियल की मांग भी लगातार बढ़ी है।
गंजपारा, दुर्ग के थोक व्यापारी आसिफ इकबाल (कोहिनूर इंटरप्राइजेस) के अनुसार यहां नारियल आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु से आता है। थोक में एक नारियल करीब 22 रुपए का पड़ता है, जबकि खुदरा बाजार में इसकी कीमत 30 से 35 रुपए तक है। इस तरह अकेले सामान्य नारियल का ही कारोबार हर महीने करोड़ों रुपए तक पहुंचता है।
व्यापारियों के अनुसार नारियल के कारोबार और इससे जुड़े कामों से क्षेत्र में तीन हजार से अधिक लोगों को रोजगार मिल रहा है। कई परिवार इससे हर महीने 18 से 20 हजार रुपए तक कमा रहे हैं। नारियल पानी में पोटैशियम और इलेक्ट्रोलाइट की मात्रा होने के कारण स्वास्थ्य के प्रति जागरूक लोगों के बीच भी इसकी मांग बढ़ी है।
कोरोना के बाद नारियल पानी की मांग में तेजी आई है। दुर्ग-भिलाई में रोज करीब एक ट्रक डाप नारियल खप रहा है। एक ट्रक में लगभग 15 हजार नग आते हैं। यह पानी से भरपूर और वजनदार नारियल कर्नाटक से पहुंचता है। व्यापारियों के मुताबिक पहले पितृ पक्ष में नारियल की बिक्री लगभग थम जाती थी, लेकिन अब सालभर मांग बनी रहती है। घरों में साउथ इंडियन व्यंजन बनने से भी इसकी खपत बढ़ी है। मंदिरों में रोज नारियल की बिक्री होती है, लेकिन मंगलवार और शनिवार को मांग अधिक रहती है। नवरात्र में देवी मंदिरों में इसकी खपत और बढ़ जाती है।
नारियल का कोई हिस्सा बेकार नहीं जाता। इसके कवच से बटन, पत्तों से झाड़ू और छिलके से रस्सी बनाई जाती है। दुर्ग-भिलाई में ही 25 से अधिक इकाइयां नारियल से तेल, बर्फी और लड्डू जैसे उत्पाद तैयार कर रही हैं।
बढ़ती खपत के साथ नारियल का कचरा भी बड़ी चुनौती बन गया है। दुर्ग-भिलाई में रोज करीब 8 से 10 टन नारियल कचरा निकल रहा है। नगर निगम स्तर पर कोकोपीट बनाने की योजना नहीं होने से फिलहाल इसका निपटारा सामान्य कचरे के साथ ही किया जा रहा है।
नारियल की बढ़ती खपत के पीछे बदलती खान-पान की आदतें भी बड़ी वजह हैं। घरों और रेस्टोरेंट में दक्षिण भारतीय व्यंजनों की लोकप्रियता बढ़ने के साथ नारियल का इस्तेमाल भी बढ़ा है। चटनी से लेकर करी और कई पारंपरिक व्यंजनों में नारियल का इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा नारियल से बनी मिठाइयों और अन्य खाद्य उत्पादों की भी बाजार में मांग है। इससे नारियल अब सिर्फ धार्मिक उपयोग की वस्तु नहीं रहा, बल्कि रोजमर्रा के भोजन का भी हिस्सा बनता जा रहा है।