
हुसैनीवाला से कभी लाहौर तक जाती थी ट्रेन (Photo: Rajasthan Patrika)
Hussainiwala History : एक तरफ सतलुज की खामोश धारा है, दूसरी तरफ सरहद की तारबंदी। कहीं रेल पुल के टूटे पिलर अतीत की गवाही दे रहे हैं तो कुछ ही दूरी पर तीन शहीदों की समाधियां सिर झुकाने को मजबूर करती हैं। और इन सबके बीच खड़ा है हुसैनीवाला। एक ऐसा नाम, जिसे आजादी, विभाजन और युद्ध ने बार-बार अपनी कहानी में लिखा। यहां कभी ट्रेनें दौड़ती थीं। फिर देश बंटा, पुल टूटा और पटरी इतिहास बन गई। इसी मिट्टी ने भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की आखिरी रात देखी। आज यहां जवान सरहद की रखवाली करते हैं। हुसैनीवाला को इसलिए सिर्फ नक्शे पर एक सीमा चौकी समझना उसके पूरे इतिहास को छोटा कर देना होगा।
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