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महंगाई ने बदली रसोई की तस्वीर! गैस छोड़ लकड़ी की ओर लौटे लोग, बढ़ी कटाई और दामों में उछाल

Firewood Demand Increase: कवर्धा में गैस सिलेंडर की बढ़ती कीमतों और कमी के चलते लोग फिर से लकड़ी पर निर्भर हो रहे हैं। इससे लकड़ी की कीमतों में उछाल और जंगलों पर दबाव बढ़ने लगा हैंं।

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Mar 18, 2026
महंगाई ने बदली रसोई की तस्वीर (photo source- Patrika)

छत्तीसगढ़ के कवर्धा जिले में महंगाई का असर अब दोहरी मार के रूप में सामने आ रहा है। एक ओर उज्ज्वला योजना के तहत मिलने वाला गैस सिलेंडर गरीबों की पहुंच से बाहर होता जा रहा है, तो दूसरी ओर पारंपरिक ईंधन के रूप में इस्तेमाल होने वाली लकड़ी भी अब सस्ती नहीं रही। ऐसे में ग्रामीण परिवारों की रसोई फिर से संकट में घिरती नजर आ रही है।

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गैस महंगी, लकड़ी भी नहीं सस्ती

उज्ज्वला योजना के तहत मिले गैस कनेक्शन होने के बावजूद बढ़ती कीमतों ने लोगों को गैस का उपयोग कम करने पर मजबूर कर दिया है। करीब 992 रुपए तक पहुंच चुकी सिलेंडर की कीमत और बेहद कम सब्सिडी के कारण गरीब परिवार नियमित रूप से रिफिल नहीं करवा पा रहे। ऐसे में वे दोबारा लकड़ी, कंडा और मिट्टी के चूल्हों पर लौट रहे हैं। लेकिन अब स्थिति यह है कि जंगलों से मिलने वाली लकड़ी भी आसानी से उपलब्ध नहीं है। लगातार कटाई और बढ़ती मांग के चलते लकड़ी की कीमतों में भी इजाफा हुआ है। कई जगहों पर लकड़ी खरीदकर लानी पड़ रही है, जिससे खर्च और बढ़ गया है।

लकड़ी की कीमतों में उछाल

मांग बढ़ने के साथ ही लकड़ी के दाम भी तेजी से बढ़े हैं। पहले जो लकड़ी आसानी से जंगलों या आसपास के इलाकों में मिल जाती थी, अब वह या तो कम हो गई है या खरीदनी पड़ रही है। कई जगहों पर लकड़ी के गट्ठर के दाम पहले से दोगुने तक हो गए हैं, जिससे गरीब परिवारों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ रहा है।

जंगलों पर बढ़ता दबाव

ग्रामीण इलाकों में बड़ी संख्या में लोग अब फिर से लकड़ी पर निर्भर हो रहे हैं। पंडरिया, बोड़ला, रेंगाखार और लोहारा क्षेत्रों में जंगलों से लकड़ी लाने का चलन तेजी से बढ़ा है। इससे वन संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है और अवैध कटाई की आशंका भी बढ़ने लगी है। पहले जहां उज्ज्वला योजना ने लकड़ी पर निर्भरता कम की थी, अब वही लोग दोबारा जंगलों की ओर रुख कर रहे हैं।

महिलाओं पर बढ़ा बोझ और खतरा

लकड़ी इकट्ठा करने की जिम्मेदारी ज्यादातर महिलाओं पर होती है। उन्हें जंगलों में जाकर लकड़ी लानी पड़ रही है, जिससे समय और मेहनत दोनों बढ़ रहे हैं। साथ ही, धुएं से भरे चूल्हों पर खाना बनाने के कारण स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ रहा है। पहले गैस से खाना बनाने में जो सुविधा और राहत मिली थी, वह अब खत्म होती नजर आ रही है।

मांग ज्यादा, संसाधन कम

जिले में करीब सवा दो लाख से अधिक गैस उपभोक्ता हैं, लेकिन गैस सिलेंडर की उपलब्धता सीमित है। 11 एजेंसियों के पास कुल मिलाकर करीब 2550 सिलेंडर का ही स्टॉक है, जबकि हर महीने हजारों सिलेंडरों की जरूरत होती है। इस कमी और महंगाई के चलते करीब 30-40 प्रतिशत उज्ज्वला उपभोक्ताओं ने गैस का उपयोग लगभग बंद कर दिया है या सिर्फ खास मौकों पर ही इस्तेमाल कर रहे हैं।

क्यों बढ़ती है लकड़ी पर निर्भरता?

जब रसोई गैस महंगी हो जाती है या समय पर उपलब्ध नहीं होती, तो कम आय वाले परिवार तुरंत सस्ते और उपलब्ध विकल्पों की ओर जाते हैं—जैसे लकड़ी, गोबर के कंडे और पारंपरिक चूल्हे। छत्तीसगढ़ के कवर्धा जैसे जिलों में यह ट्रेंड पहले से दिखने लगा है।

लकड़ी की कटाई क्यों बढ़ेगी

  • मांग में अचानक वृद्धि: ज्यादा लोग लकड़ी का उपयोग करेंगे तो मांग बढ़ेगी।
  • आपूर्ति सीमित: जंगलों से मिलने वाली लकड़ी सीमित होती है।
  • स्थानीय बिक्री: कई लोग लकड़ी बेचकर कमाई भी करते हैं, जिससे कटाई और बढ़ सकती है।

इसके असर

  • वनों पर दबाव: ज्यादा कटाई से जंगल कमजोर होंगे।
  • पर्यावरण नुकसान: मिट्टी कटाव, जलवायु प्रभाव और जैव विविधता पर असर।
  • महिलाओं पर बोझ: लकड़ी लाने का काम बढ़ेगा।
  • स्वास्थ्य खतरा: धुएं से सांस और आंखों की बीमारियां बढ़ सकती हैं।

फिर सवालों में योजना की उपयोगिता

स्थिति अब यह सवाल खड़ा कर रही है कि क्या सिर्फ गैस कनेक्शन देना ही काफी है, जब उसे भरवाना ही गरीबों के लिए मुश्किल हो जाए। एक तरफ गैस महंगी है, तो दूसरी तरफ लकड़ी भी महंगी और सीमित होती जा रही है। ऐसे में गरीब परिवारों के सामने खाना बनाने का संकट गहराता जा रहा है, और उज्ज्वला योजना का मूल उद्देश्य—स्वच्छ और सुरक्षित रसोई—धीरे-धीरे कमजोर पड़ता दिख रहा है।

Published on:
18 Mar 2026 01:40 pm
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