
Dr. Karan Singh : डॉ. कर्ण सिंह देश के जानेमाने राजनेता हैं। वह जम्मू कश्मीर रियासत के शासक रहे। उन्हें 18 साल की उम्र में जम्मू कश्मीर का सदर रियासत बनाया गया। इसके बावजूद वे खुद को महाराजा कर्ण सिंह की बजाय डॉ. कर्ण सिंह कहलाना पसंद करते हैं। उनकी ख्याति दार्शनिक और लेखक के तौर पर है। वह अबतक दर्शन, आध्यात्म आदि विषयों पर 20 से ज्यादा पुस्तकें लिख चुके हैं। वे चार बार लोकसभा सांसद और चार बार राज्यसभा सांसद बने। वे भारत के सबसे कम उम्र के कैबिनेट मंत्री बने।
Dr. Karan Singh Biography Launch in Jaipur : वे इंदिरा गांधी की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे। उन्होंने पर्यटन, नागरिक उड्डयन, स्वास्थ्य और परिवार नियोजन, और शिक्षा व संस्कृति जैसे मंत्रालयों में कार्य किया। उन्होंने राष्ट्रीय जनसंख्या नीति की घोषणा की। कर्ण सिंह ने देश में टाइगर प्रोजेक्ट (Tiger Project) का नेतृत्व किया। वे संयुक्त राज्य अमेरिका में भारत के राजदूत रहे। वे बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) के कुलाधिपति (Chancellor, JNU) भी रहे। उन्हें 2005 में पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया। वह कई बार मंत्री रहे लेकिन उन्होंने मंत्री पद या सरकारी आवास का लाभ नहीं लिया। यहां पढ़िए डॉ. कर्ण सिंह से पूरी बातचीत
मैं महाराजा खानदान में पैदा हुआ। इसमें मेरा कोई योगदान नहीं है। मैंने बी.ए. और एम.ए. करने के लिए बहुत मेहनत की। बहुत मेहनत से पीएचडी की। यही वजह है कि मैं खुद को महाराजा कर्ण सिंह की बजाय डॉ. कर्ण सिंह कहलाना पसंद करता हूं।
हां जी। मुझपर मां की कृपा है। मैं शिवजी का भक्त हूं। मुझपर ईश्वर की कृपा है। उनकी जब तक कृपा है, मैं चलता रहूंगा और जिस दिन कृपा कम होगी और चले जाने का आदेश होगा, (मुस्कुरा कर) चला जाऊंगा।
16 वर्ष की उम्र में मैं 18 महीने तक बिल्कुल हिलडुल नहीं सकता था। मैं व्हीलचेयर पर बैठा रहता था। मैं बहुत उदास रहता था। दिनभर सोचता रहता था कि अब कभी भी ठीक नहीं हो सकूंगा। एक दिन मेरे घर पर सरदार बल्लभभाई पटेल आए। उन्होंने मेरे बारे में पूछा कि ये कौन है? जानकारी लेने के बाद उन्होंने कहा कि इसे इलाज के लिए अमेरिका भेजिए। मैं 11 महीने तक अमेरिका में एक हॉस्पिटल में रहा। ईश्वर की कृपा रही कि वहां इलाज के बाद मैं पूरी तरह ठीक हो गया।
मैं क्या ही बताऊं? मेरी दिनचर्या बहुत ही बोरिंग है। मैं रोज सुबह 5 बजे उठता हूं और ध्यान योग, भक्ति योग और कर्म योग में अपना पूरा दिन बिताता हूं। मैं हर रोज दो घंटे पूजा करता हूं। डोगरी के भजन गाता हूं। मैं किसी अन्य के लिखे हुए भजन या आरती नहीं गाता हूं। मैंने खुद डोगरी और संस्कृत में भजन कंपोज किए हुए हैं, उनको ही गाता हूं।
नित्य दिन योग का अभ्यास करता हूं। हल्का-फुल्का वजन उठाने वाली एक्सरसाइज भी करता हूं। 9 बजे सुबह नाश्ता करता हूं। फिर कुछ घंटे तक पढ़ना-लिखना। दोपहर में ठीक 1:30 बजे भोजन कर लेता हूं। दोपहर में खाने के बाद सोना बहुत लाभदायक होता है। मैं हर रोज दोपहर में एक घंटे सोता हूं। शाम को फिर से पढ़ाई और लिखाई। मैं शाम में भी आधा घंटा पूजा करता हूं। रात को 9 बजे डिनर कर लेता हूं। यह मेरा रोज का बोरिंग सा रूटीन है। हां, मैं सप्ताह में अपने गुरु के साथ एक बार म्यूजिक का भी रियाज करता हूं।
ध्यान योग का कनेक्शन सीधे मस्तिष्क से होता है। यह मन को एकाग्र करने, तनाव कम करने और आंतरिक शांति पाने का एक अभ्यास है। गहरी सांस, मंत्र का जाप करके किसी एक बिंदु पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। यह योग का अभिन्न अंग है जो एकाग्रता के लिए किया जाता है। यह समाधि की ओर ले जाता है। इससे मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य में सुधार होता है।
भक्ति योग का संबंध हृदय से है। यह प्रेम, समर्पण और भक्ति के माध्यम से ईश्वर या परम सत्ता से जुड़ने का मार्ग है। इसे 'प्रेम का योग' भी कहते हैं। इसे ईश्वर से जुड़ने का यानी भक्ति का मार्ग' भी कहते हैं। इसके लिए भजन, कीर्तन, जप और सेवा जैसे अभ्यास किए जाते हैं। यह आत्म साक्षात्कार और मोक्ष प्राप्ति का एक सरल और प्रभावी तरीका है। आप इस योग के जरिये खुद के मन के अंदर झांकते हैं और यह बहुत महत्वपूर्ण है।
कर्म योग यानी अपने लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मेहनत करना। यह एक आध्यात्मिक मार्ग है जिसमें व्यक्ति बिना फल की इच्छा किए, पूरी निष्ठा और समर्पण के साथ अपने कर्तव्यों (कर्मों) का पालन करता है। यह मन को शुद्ध करता है और मोक्ष (आध्यात्मिक मुक्ति) की ओर ले जाता है, जहां कार्य ईश्वर के प्रति सेवा के रूप में किए जाते हैं, जिससे व्यक्ति कर्म के बंधनों से मुक्त होकर समभाव (सुख-दुख में समान रहना) प्राप्त करता है।
जी हां। मैं फिल्में देखता हूं। मैं फिल्में देखने के लिए थिएटर में भी जाता हूं। संगीत और नृत्य में तो किसकी दिलचस्पी नहीं होगी? संगीत और नृत्य में सभी की दिलचस्पी होती है। ईश्वर की भक्ति करने वालों की तो संगीत में दिलचस्पी होगी ही। शिव भी नृत्य करते हैं। कृष्ण भी नृत्य करते हैं। शिव तांडव करते हैं। कृष्ण सॉफ्ट तरीके से नृत्य करते हैं।
मुझे भरतनाट्यम बहुत पसंद है। मुझे भरतनाट्यम नृत्य के शो के बारे में पता चलता है तो मैं देखने जाता हूं। मैं 1955 में पहली बार मद्रास गया। वहां बैजयंती माला का नृत्य देखा। मुझे उनका नृत्य बहुत पसंद आया।
मुझे नौजवानी में एल्विस प्रेस्ली बहुत पसंद थे। उन दिनों हिप, हॉप और रॉक म्यूजिक भी पसंद आता था। अब तो आरती और भजन सुनना पसंद करता हूं।