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भारत की वो 5 महिलाएं जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में गाड़े झंडे, कोई देश की पहली महिला डॉक्टर तो कोई बनीं वैज्ञानिक

International Day of Women and Girls in Science: भारत के निर्माण में महिलाओं का योगदान अभूतपूर्व है। महिलाओं ने हर क्षेत्र में सारी बाधाएं दूर करके अपना परचम लहराया। आनंदीबाई, कमला सोहोनी से लेकर कल्पना चावला तक की बहुत लंबी लिस्ट है। यहां पढ़िए उन महिलाओं की कहानियां जिन्होंने विज्ञान और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों में अपनी लीक खुद तैयार की और अपने योगदान से दुनिया में अपनी पहचान बनाई।

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Feb 11, 2026
भारत की उन महिलाओं की कहानियां जिन्होंने अपने योगदान से इतिहास रचा

International Day of Women and Girls in Science : भारत ने विज्ञान और गणित के क्षेत्र में अपने योगदान से काफी समृद्ध किया है। ‘शून्य’ की संकल्पना और दशमलव पद्धति प्राचीन भारत के प्रतिभाशाली गणितज्ञों की देन मानी जाती है। भारत में विज्ञान के गौरवशाली इतिहास में कई महिला वैज्ञानिक भी शामिल हैं, जिन्होंने विज्ञान की विभिन्न शाखाओं में उल्लेखनीय योगदान दिया। उनका जीवन देश को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में आगे बढ़ाने में खप गया। वे सपना देखने वाली लड़कियों के लिए प्रेरणा बन गईं। आइए, आज विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस (International Day of Women and Girls in Science) पर भारत की कुछ महान महिला वैज्ञानिकों के बारे में जानते हैं।

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आनंदीबाई जोशी: भारत की पहली महिला डॉक्टर

आनंदीबाई गोपालराव जोशी भारत की पहली महिला चिकित्सक के रूप में जानी जाती हैं। उनका जीवन बहुत संघर्षपूर्ण रहा। उनका जन्म 31 मार्च 1865 को महाराष्ट्र के कल्याण में हुआ था। आनंदीबाई की शादी गुड्डे, गुड़िया से खेलने की उम्र 9 वर्ष में ही कर दी गई। उनके पति गोपालराव उनसे 20 वर्ष बड़े थे और उनकी पहली पत्नी की मौत हो चुकी थी।

आनंदीबाई जोशी का संघर्षों से भरा रहा जीवन

पांच साल बाद यानी सिर्फ 14 वर्ष की उम्र में आनंदीबाई और उनके पति गोपालराव जोशी के घर के एक पुत्र पैदा हुआ लेकिन पर्याप्त चिकित्सा की सुविधाओं के अभाव में नवजात की मौत हो गई। आनंदीबाई के जीवन में यहीं से क्रांतिकारी बदलाव आया। उन्होंने यह प्रण कर लिया कि उन्हें डॉक्टर बनना है। उस जमाने में महिलाओं की शिक्षा को लेकर घर, परिवार और समाज उदार नहीं हो पाया था। आनंदीबाई ने सामाजिक की संकीर्णताओं को तोड़ते हुए चिकित्सा की पढ़ाई की और देश की पहली महिला डॉक्टर बनकर इतिहास रच दिया।

पहली भारतीय महिला डॉक्टर बनने की कहानी

पति गोपालराव के सहयोग और प्रोत्साहन से आनंदीबाई अमेरिका गईं और वर्ष 1886 में पेंसिल्वेनिया के वीमेन्स मेडिकल कॉलेज से पश्चिमी चिकित्सा पद्धति में दो वर्षीय डिग्री डिग्री हासिल की। ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय महिला बनीं।

21 की उम्र में टीबी के चलते हुई दर्दनाक मौत

अमेरिका से भारत लौटने पर कोल्हापुर के तत्कालीन शासक ने उन्हें महिला चिकित्सक के रूप में नियुक्त किया। हालांकि भारत आने के बाद वह बीमार पड़ गईं और उनका स्वास्थ्य में लगातार गिरावट आती चली गई। उन्हें टीबी हो गया था। आनंदीबाई का सिर्फ 26 फरवरी 1887 को मात्र 21 वर्ष की उम्र में निधन हो गया।

कमला सोहोनी: विज्ञान में पीएचडी करने वाली भारत की पहली महिला

कमला सोहोनी भारत की पहली महिला थीं जिन्होंने विज्ञान के क्षेत्र में पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उनका जन्म 18 जून 1912 को मध्य प्रदेश के इंदौर में हुआ था। भारत की शिखर पर पहुंची अन्य महिलाओं की तरह उन्हें भी यह उपलब्धि हासिल करने के लिए काफी संघर्षों का सामना करना पड़ा।

महिला होने के कारण IISc ने नहीं दी थी फेलोशिप

कमला सोहोनी ने बॉम्बे विश्वविद्यालय से रसायन विज्ञान में स्नातक की पढ़ाई पूरी की और इसके बाद भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु में शोध फेलोशिप के लिए आवेदन किया। भारतीय विज्ञान संस्थान में शुरुआत में उन्हें केवल महिला होने के कारण प्रवेश से वंचित कर दिया गया। उन्होंने संस्थान के तत्कालीन निदेशक और नोबेल पुरस्कार विजेता प्रोफेसर सी. वी. रमन से सीधे मुलाकात कर अपनी योग्यता साबित की। रमन उस समय संस्थान के निदेशक थे। कमला की योग्यता देखकर प्रोफेसर रमन ने उन्हें विशेष शर्तों पर शोध करने की अनुमति दे दी। वह इस तरह वे IISc में प्रवेश पाने वाली और प्रोफेसर रमन की पहली महिला छात्रा भी बनीं।

प्रोफेसर रमन ने कमला को शोध जारी रखने की दी पूरी छूट

भारतीय विज्ञान संस्थान में उनके उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद प्रो. रमन ने उन्हें आगे शोध जारी रखने की पूरी छूट दी। इसके बाद कमला सोहोनी ने इंग्लैंड जाकर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय से वर्ष 1939 में पीएचडी की डिग्री प्राप्त की। उनका शोध जैव-रसायन (बायोकेमिस्ट्री) के क्षेत्र में था। उन्होंने यह खोज की कि पौधों की प्रत्येक कोशिका में ‘साइटोक्रोम-सी’ नामक एंजाइम होता है, जो सभी पौध कोशिकाओं के ऑक्सीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

जानकी अम्माल: भारत की पहली महिला वनस्पति वैज्ञानिक

जानकी अम्माल भारत की पहली महिला वैज्ञानिकों के बतौर दुनियाभर में जानी जाती हैं। जानकी का जन्म 4 नवंबर 1897 को तत्कालीन मद्रास प्रेसीडेंसी में हुआ था। उन्हें वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में अपना असाधारण योगदान देने के लिए जाना जाता है। जानकी ने उस जमाने में वनस्पति विज्ञान को अपना विषय चुना जब महिलाओं को पढ़ने के लिए मुश्किल से घर, परिवार वाले अनुमति देते थे। उन्होंने वर्ष 1921 में मद्रास के प्रेसिडेंसी कॉलेज से वनस्पति विज्ञान में ऑनर्स की डिग्री प्राप्त की।

मिशिगन यूनिवर्सिटी से की पीएचडी की पढ़ाई

जानकी उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका गईं, जहां उन्होंने मिशिगन विश्वविद्यालय से मास्टर डिग्री और बाद में पीएचडी की पढ़ाई पूरी की। उनके शोध का विषय साइटोजेनेटिक्स (गुणसूत्रों और कोशिका व्यवहार का अध्ययन) और फाइटोजियोग्राफी (पौधों के भौगोलिक वितरण का अध्ययन) पर केंद्रित था। उन्होंने यह समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया कि पौधों की आनुवंशिक संरचना और उनके भौगोलिक वितरण के बीच क्या संबंध है।

गन्ना और बैंगन की उन्नत किस्मों के विकास में जानकी का योगदान

जानकी अम्माल का सबसे प्रसिद्ध वैज्ञानिक कार्य गन्ना और बैंगन की उन्नत किस्मों के विकास से जुड़ा है। उनके शोध ने भारत में कृषि उत्पादन बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई। उन्होंने इंग्लैंड में रॉयल हॉर्टिकल्चरल सोसाइटी के लिए भी कार्य किया और बाद में भारत लौटकर बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया की महानिदेशक के रूप में सेवाएं दीं।

अपने योगदान के लिए पद्मश्री से नवाजी गईं जानकी

वर्ष 1977 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री सम्मान से नवाजा। वह पद्मश्री पाने वाली पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक बनीं। जानकी अम्माल का निधन 7 फरवरी 1984 को हुआ।

राजेश्वरी चटर्जी: कर्नाटक की पहली महिला इंजीनियर

राजेश्वरी चटर्जी का नाम कर्नाटक की पहली महिला इंजीनियर के तौर पर जाना जाता है।राजेश्वरी चटर्जी का जन्म 1922 में कर्नाटक में हुआ था। उन्होंने उस दौर में इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, जब इस क्षेत्र में पुरुषों का पूरी तरह से वर्चस्व था। उन्होंने भारत में माइक्रोवेव इंजीनियरिंग और संचार तकनीक के विकास में भी अहम योगदान दिया।

अमेरिका से पूरी की इंजीनियरिंग में पीएचडी

भारत सरकार ने राजेश्वरी को वर्ष 1946 में छात्रवृत्ति दी। वह इस छात्रवृत्ति की मदद से इंजीनियरिंग के क्षेत्र में उच्च शिक्षा की पढ़ाई जारी रखने के लिए अमेरिका गईं। वहां उन्होंने मिशिगन विश्वविद्यालय से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में मास्टर डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने वहीं से पीएचडी की डिग्री भी हासिल की।

भारत के रक्षा और संचार क्षमताओं को बढ़ाने में दिया योगदान

राजेश्वरी चटर्जी अमेरिका से अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भारत लौटीं और भारतीय विज्ञान संस्थान (IISc), बेंगलुरु के इलेक्ट्रिकल कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग विभाग से जुड़ीं। यहां उन्होंने फैकल्टी मेंबर के तौर पर ज्वाइन किया। उन्होंने यहां अपने पति प्रोफेसर चटर्जी के साथ मिलकर माइक्रोवेव रिसर्च लैबोरेटरी की स्थापना की। इस प्रयोगशाला में उन्होंने माइक्रोवेव इंजीनियरिंग के क्षेत्र में अग्रणी और आधारभूत शोध किया। उनके शोधों ने भारत की रक्षा और संचार क्षमताओं को बढ़ाने में योगदान दिया। उनका योगदान विशेष रूप से रडार, संचार प्रणालियों और माइक्रोवेव तकनीक से जुड़ा था। इंजीनियरिंग के क्षेत्र में पढ़ाने के साथ-साथ उन्होंने कई छात्रों को मार्गदर्शन दिया और भारतीय इंजीनियरिंग शिक्षा को नई दिशा दी। राजेश्वरी चटर्जी का निधन 2010 में हो गया।

असीमा चटर्जी: कैंसर रिसर्च में दिया बहुमूल्य योगदान

असीमा चटर्जी भारत की प्रख्यात रसायन वैज्ञानिक थीं। उनका जन्म 23 सितंबर 1917 को कोलकाता में हुआ था। उन्हें ऑर्गेनिक केमिस्ट्री और फाइटोकेमिस्ट्री (पौधों से प्राप्त रसायनों के अध्ययन) के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण शोध के लिए जाना जाता है। उन्होंने औषधि विज्ञान के क्षेत्र में ऐसे योगदान दिए, जिनसे कैंसर, मलेरिया और मिर्गी जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में नई संभावनाएं खुलीं।

मलेरिया रोधी और मिर्गी रोधी बीमारी के इलाज में भी महत्वपूर्ण योगदान

असीमा चटर्जी ने 1936 में कलकत्ता विश्वविद्यालय के स्कॉटिश चर्च कॉलेज से रसायन विज्ञान में स्नातक की डिग्री प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने इसी विश्वविद्यालय से शोध कार्य करते हुए डॉक्टरेट (पीएचडी) की उपाधि हासिल की। असीमा का सबसे उल्लेखनीय वैज्ञानिक कार्य विंका एल्कलॉइड्स पर शोध से जुड़ा है। ये यौगिक सदाबहार (पेरिविंकल) पौधे से प्राप्त होते हैं और इनमें कैंसर-रोधी गुण पाए जाते हैं। उनके शोध ने ल्यूकेमिया और हॉजकिन रोग (एक प्रकार का रक्त कैंसर) जैसी बीमारियों के उपचार में उपयोगी दवाओं के विकास का मार्ग प्रशस्त किया। इसके अलावा, उन्होंने मलेरिया रोधी और मिर्गी रोधी दवाओं के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

महिलाओं के लिए क्या हैं बाधाएं?

भारत में महिलाएं विज्ञान और गणित के क्षेत्र में और कैसे आगे आ सकती हैं? इस सवाल के जवाब में ब्रह्मांड की संरचना पुस्तक के लेखक और इंजीनियर आशी​ष श्रीवास्तव ने पत्रिका से बताया कि गणित और विज्ञान किसी भी देश की प्रगति की आधारशिला होते हैं। भारत में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, किंतु सामाजिक, शैक्षिक और मानसिक बाधाओं के कारण अनेक महिलाएं इन क्षेत्रों में अपनी पूरी क्षमता का उपयोग नहीं कर पातीं। यदि उचित वातावरण, अवसर और प्रोत्साहन मिले, तो भारतीय महिलाएं गणित और विज्ञान में उल्लेखनीय प्रगति कर सकती हैं।

लड़कियों को आगे बढ़ाने में परिवार की बड़ी भूमिका

उन्होंने कहा कि परिवार और समाज का सहयोग निर्णायक भूमिका निभाता है। सामाजिक अपेक्षाएं और पारंपरिक सोच लड़कियों की शिक्षा और करियर को सीमित कर देती हैं। लड़कियां प्रतिभाशाली होने के बावजूद सामाजिक दबावों के कारण विज्ञान या गणित में करियर नहीं चुन पातीं। यदि परिवार लड़कियों को उच्च शिक्षा, शोध और करियर के लिए प्रोत्साहित करे, तो उनकी राह काफी आसान हो सकती है। आनंदीबाई जोशी, भारत की पहली महिला डॉक्टर, को उनके पति और परिवार का समर्थन मिला, जिसके कारण वे चिकित्सा विज्ञान में आगे बढ़ सकीं।

'आज भी गणित और विज्ञान को कठिन और लड़कों का विषय माना जाता है'

आशीष का मानना है कि शिक्षा तक समान और गुणवत्तापूर्ण पहुंच अत्यंत आवश्यक है। वह कहते हैं कि बचपन से ही लड़कियों को गणित और विज्ञान को कठिन या “लड़कों के विषय” मानने की मानसिकता से मुक्त करना होगा। स्कूल स्तर पर रोचक शिक्षण विधियाँ, प्रयोगशालाएँ, गणित क्लब और विज्ञान मेले लड़कियों की रुचि और आत्मविश्वास को बढ़ा सकते हैं। लड़कियों को प्रारंभिक स्तर से ही गणित और विज्ञान में मजबूत आधार दिया जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) जैसी योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों की लड़कियों को विज्ञान और गणित की शिक्षा उपलब्ध करा रही हैं। जब लड़कियों को प्रयोगशालाओं में कार्य करने और गणितीय समस्याएं हल करने का अवसर मिलता है, तो उनमें आत्मविश्वास विकसित होता है।

वह कहते हैं, 'भारतीय महिलाएं गणित और विज्ञान में आगे तभी आ सकती हैं जब शिक्षा, समाज, सरकार और स्वयं महिलाएं मिलकर प्रयास करें। समान अवसर, सकारात्मक सोच और निरंतर प्रोत्साहन के माध्यम से जब समाज लड़कियों की वैज्ञानिक प्रतिभा को पहचानकर उन्हें आगे बढ़ने का अवसर देगा, तब भारत न केवल वैज्ञानिक रूप से सशक्त होगा, बल्कि एक समान और प्रगतिशील राष्ट्र के रूप में भी उभरेगा।'

उनका मानना है कि आत्मविश्वास और मानसिक सशक्तिकरण सबसे बड़ा आधार है। गणित और विज्ञान में आगे बढ़ने के लिए निरंतर अभ्यास, जिज्ञासा और प्रयोगशीलता आवश्यक है। छात्राओं को असफलता से डरने के बजाय उसे सीखने का अवसर समझना चाहिए। डॉ. सौम्या स्वामीनाथन ने चिकित्सा और जैव-विज्ञान में वर्षों तक शोध कर वैश्विक स्तर पर पहचान बनाई। उनके अनुसार, निरंतर अध्ययन और वैज्ञानिक सोच ही सफलता की कुंजी है।

कौन बनती हैं लड़कियों के लिए प्रेरणा?

इस बारे में उनका कहना है कि जब लड़कियां सफल महिला वैज्ञानिकों और गणितज्ञों के जीवन से परिचित होती हैं, तो उनके भीतर “मैं भी कर सकती हूं” की भावना उत्पन्न होती है। जब छात्राएं शकुंतला देवी, कल्पना चावला, टेसी थॉमस और अन्य सफल वैज्ञानिक महिलाओं के बारे में जानती हैं, तो उन्हें यह विश्वास होता है कि वे भी इन क्षेत्रों में सफल हो सकती हैं।

इस बारे में सरकार क्या कर सकती हैं? इसके जवाब में वह कहते हैं, 'सरकारी नीतियां और संस्थागत समर्थन भी अत्यंत आवश्यक हैं। छात्रवृत्तियां, शोध अनुदान, विशेष कोचिंग कार्यक्रम के साथ विज्ञान, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग और गणित में महिलाओं के लिए आरक्षित योजनाएं उनकी भागीदारी बढ़ा सकती हैं।'

Published on:
11 Feb 2026 06:00 am
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