
Flower Farming in Chhattisgarh: अंबिकापुर जिले में खेतों में लहलहाती फसल के बीच जब रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं तो सिर्फ खेत की खूबसूरती नहीं बढ़ती, बल्कि मेहनत करने वाले परिवार के लिए उम्मीदों के नए रास्ते भी खुलते हैं। छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के डिगमा गांव की रत्ना मजूमदार और उनकी सास शांति मिस्त्री ने खेती को इसी नई सोच के साथ अपनाया। दोनों ने पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर फूलों की खेती को अपनी आय का जरिया बनाया और देखते ही देखते खेत में खिले फूल परिवार की आर्थिक मजबूती की पहचान बन गए।
सास-बहू की यह जोड़ी आज गांव की दूसरी महिलाओं और किसानों के लिए भी प्रेरणा बन रही है। सीमित संसाधनों के साथ शुरू किया गया उनका प्रयास अब एक व्यवस्थित कारोबार का रूप ले चुका है। करीब एक एकड़ क्षेत्र में फूलों की खेती कर रहीं रत्ना ने साबित किया है कि खेती में नई सोच और बाजार की जरूरत को समझकर ग्रामीण महिलाएं भी अपनी अलग पहचान बना सकती हैं।
रत्ना ने बताया कि शादी के बाद जब वह ससुराल आईं तो परिवार में पहले से ही छोटे स्तर पर फूलों की खेती की जाती थी। परिवार के मामा ससुर कोलकाता से अलग-अलग किस्मों के फूलों के पौधे लेकर आते थे। घर और खेत के आसपास फूलों की खेती को देखकर रत्ना की रुचि भी इस ओर बढ़ने लगी। धीरे-धीरे उनके मन में सवाल आया कि अगर थोड़ी मात्रा में फूलों की खेती से अच्छी आमदनी हो सकती है, तो इसे बड़े स्तर पर क्यों न किया जाए। यहीं से फ्लोरीकल्चर यानी फूलों की व्यावसायिक खेती को लेकर उनकी सोच ने आकार लेना शुरू किया।
फूलों की खेती को बड़े स्तर पर शुरू करने के लिए सिर्फ इच्छा ही काफी नहीं थी। इसके लिए संसाधन, जानकारी और बाजार की समझ भी जरूरी थी। रत्ना स्वयं सहायता समूह से जुड़ीं। समूह से जुड़ने के बाद उन्हें खेती को नए तरीके से करने और अपनी आर्थिक गतिविधि को आगे बढ़ाने का हौसला मिला। शुरुआत सीमित संसाधनों से हुई, लेकिन मेहनत और लगातार सीखने की कोशिश ने इस काम को धीरे-धीरे विस्तार दिया। आज रत्ना करीब एक एकड़ में फूलों की खेती कर रही हैं। खेत में फूलों की खेती ने उनके परिवार की आय के साथ उनके आत्मविश्वास को भी बढ़ाया है।
इस पूरी कहानी की सबसे खास बात रत्ना और उनकी सास शांति मिस्त्री की साझेदारी है। खेती जैसे मेहनत वाले काम में दोनों ने एक-दूसरे का साथ दिया। घर की जिम्मेदारियों के साथ खेत की देखभाल और फूलों की खेती को आगे बढ़ाने का काम दोनों ने मिलकर किया। सास-बहू के बीच सहयोग ने इस काम को सिर्फ परिवार की आय का साधन नहीं रहने दिया, बल्कि इसे एक छोटे ग्रामीण उद्यम में बदल दिया। खेत में फूलों के साथ दोनों के सपने भी धीरे-धीरे आकार लेते गए।
ग्रामीण क्षेत्रों में खेती लंबे समय से परिवारों की आजीविका का प्रमुख साधन रही है। ऐसे में पारंपरिक फसलों से हटकर फूलों जैसी व्यावसायिक फसल की ओर बढ़ना अपने आप में एक अलग प्रयोग है। रत्ना का मानना है कि खेती को केवल पारंपरिक तरीके से करने के बजाय बाजार की मांग और उपलब्ध संसाधनों के हिसाब से नई फसलों पर भी काम किया जा सकता है। फूलों की खेती ने उन्हें इसी बदलाव का अनुभव दिया।
रत्ना और शांति की कहानी सिर्फ फूलों की खेती की कहानी नहीं है। यह उस बदलाव की कहानी है, जिसमें ग्रामीण महिलाएं घर और खेती की पारंपरिक भूमिका से आगे बढ़कर आर्थिक निर्णयों और स्वरोजगार में अपनी भागीदारी बढ़ा रही हैं। आज उनके खेत में खिले फूल उनके परिवार की आर्थिक स्थिति में आए बदलाव की तस्वीर पेश करते हैं। उनकी मेहनत देखकर आसपास की अन्य महिलाएं भी खेती और छोटे व्यवसाय को लेकर नए विकल्पों के बारे में सोच रही हैं।
सरगुजा जिला प्रशासन की ओर से भी किसानों को फूलों की खेती के लिए प्रोत्साहित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। इसके तहत किसानों को प्रशिक्षण, तकनीकी जानकारी, गुणवत्तापूर्ण बीज और विभिन्न योजनाओं से जोड़ने पर जोर दिया जा रहा है। फूलों की खेती को बढ़ावा मिलने से किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ आय के नए विकल्प मिल सकते हैं। खासकर ग्रामीण महिलाओं के लिए यह गतिविधि स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता का माध्यम बन सकती है।
डिगमा गांव में रत्ना और शांति के खेत में खिले फूल सिर्फ रंग और खुशबू नहीं बिखेर रहे, बल्कि एक संदेश भी दे रहे हैं—अगर सोच नई हो और मेहनत लगातार जारी रहे तो गांव की मिट्टी से भी आत्मनिर्भरता की मजबूत कहानी लिखी जा सकती है। सास-बहू की यह जोड़ी आज इसी बदलाव की मिसाल है। जहां कभी फूलों की खेती घर के छोटे हिस्से तक सीमित थी, वहीं अब एक एकड़ में इसे कारोबार का रूप दिया जा चुका है। फूलों के साथ आगे बढ़ता यह परिवार आसपास की महिलाओं के लिए भी यह भरोसा पैदा कर रहा है कि आत्मनिर्भर बनने के लिए अवसर कहीं बाहर नहीं, अपने ही खेत और हुनर में भी तलाशे जा सकते हैं।