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यूरोपियन रेस्टोरेंट्स में वेजिटेरियन फूड की डिमांड, जानें भारत में आजकल क्या है चलन

Meat Consumption Trends: भारत में मांसाहार का रुझान तेजी से बढ़ रहा है और 77% पुरुष अब नॉन-वेज के शौकीन हैं, जबकि इसके विपरीत यूरोप में लोग मांस छोड़कर पारंपरिक शाकाहारी और 'प्लांट-बेस्ड' डाइट को अपना रहे हैं। यह वैश्विक बदलाव स्वास्थ्य, पर्यावरण और सांस्कृतिक पहचान के बीच बदलते तालमेल को दर्शाता है।

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Jan 31, 2026
हंगेरियन मशरूम पैप्रिकाश स्टू। (फोटो: द वाशिंगटन पोस्ट, डिजाइन: पत्रिका)

Dietary Shift: खान-पान की वैश्विक दुनिया में इन दिनों एक अजीबोगरीब बदलाव देखने को मिल रहा है। एक तरफ जहां भारत जैसे पारंपरिक शाकाहारी प्रधान देश में नॉन-वेज (Non-Veg) का तेजी से क्रेज बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर मांस-आधारित आहार के लिए मशहूर पूर्वी यूरोप के देशों में अब सब्जियों को 'मेन कोर्स' के तौर पर अपनाया जा रहा है। जानकारी के अनुसार पूर्वी यूरोप (रूस, पोलैंड व यूक्रेन) के खाने को लेकर अक्सर यह धारणा रही है कि वहां मांस (India Meat Consumption) और आलू के बिना थाली अधूरी है, लेकिन लेखिका एलिसिया टिमोशकिना ने अपनी नई किताब 'कापुस्ता' (पत्तागोभी) के जरिये इस मिथक को तोड़ दिया है। वे बताती हैं कि इन देशों की मिट्टी सब्जियों के लिए बहुत उपजाऊ है। अब वहां के लोग अपनी जड़ों की ओर लौट रहे हैं। वहां 'मशरूम पाप्रिकाश' जैसी डिशेज में अब चिकन की जगह मशरूम ले रहे हैं, और 'चेबुरेकी' (पारंपरिक पाई) में मांस की जगह गाजर और दालें भरी जा रही हैं।

क्रेमिनी और सफेद बटन मशरूम। (फोटो: द वाशिंगटन पोस्ट, डिजाइन: पत्रिका)

भारत का हाल: थाली में बढ़ता मांस का हिस्सा (NFHS-5 Food Data)

यूरोप के इस बदलाव के उलट, भारत में मांस खाने वालों की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी देखी गई है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (NFHS-5) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 15 से 49 वर्ष की आयु के लगभग 77% पुरुष और 71% महिलाएं अब किसी न किसी रूप में मांसाहार का सेवन करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि शहरीकरण और बदलती जीवनशैली के कारण प्रोटीन के स्रोत के रूप में चिकन और अंडे की मांग बढ़ी है। जहां पूर्वी यूरोप में 'सब्जी-केंद्रित' (Vegetable-forward) कुकिंग एक नया फैशन बन रही है (Eastern European Cuisine), वहीं भारत में नॉन-वेज खाना अब 'स्टेटस सिंबल' और 'सुविधा' से जुड़ गया है।

स्वाद का नया ग्लोबल एक्सचेंज (Vegetable Forward Recipes)

आज के डिजिटल दौर में स्वाद का भी आदान-प्रदान हो रहा है। लंदन में बैठी शेफ टिमोशकिना बताती हैं कि वे अपनी यादों और आधुनिक 'वीगन' (Vegan) ट्रेंड के बीच तालमेल बैठा रही हैं। दूसरी ओर, भारतीय महानगरों में 'कबाब और टिक्का' की डिमांड साल दर साल 10 से 15 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है। यह विरोधाभास दर्शाता है कि दुनिया अब एक ऐसे बिंदु पर है, जहां हर कोई दूसरे की संस्कृति का स्वाद चखना चाहता है।

क्या यह सेहत का मामला है?

खाद्य विशेषज्ञों का मानना है कि पूर्वी यूरोप में सब्जियों की ओर वापसी 'क्लाइमेट चेंज' और 'हेल्थ कॉन्शियस' होने का परिणाम है। फर्मेंटेड फूड (जैसे सॉरक्रौट) और ताजा जड़ी-बूटियां वहां के लोगों के लिए इम्यून सिस्टम मजबूत करने का जरिया बन रही हैं। इसके विपरीत, भारत में मांस का बढ़ता चलन 'वेस्टर्नाइजेशन' का असर है, जहां फास्ट फूड के रूप में नॉन-वेज ज्यादा आसानी से उपलब्ध है।

अब भविष्य की थाली कैसी होगी ?

आने वाले 5 बरसों में 'प्लांट-बेस्ड मीट' (सब्जियों से बने नॉन वेज) का बाजार भारत में भी पैर पसार सकता है। जिस तरह यूरोप में मशरूम ने चिकन की जगह ली है, संभव है कि भारत में भी स्वास्थ्य के प्रति जागरूक युवा फिर से 'देसी सब्जियों' की ओर रुख करें, लेकिन फिलहाल रुझान नॉन-वेज की तरफ ही है।

युद्ध और खान-पान की पहचान

रूस और यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष ने भी खाने के प्रति नजरिया बदला है। टिमोशकिना के अनुसार, युद्ध के समय में लोग अपनी सांस्कृतिक पहचान बचाने के लिए पारंपरिक शाकाहारी व्यंजनों (जैसे आलू भरी चपटी रोटी 'किस्तिबी') को ज्यादा महत्व दे रहे हैं। भोजन अब केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि अपनी विरासत को सहेजने का हथियार बन गया है।

(द वॉशिंगटन पोस्ट का यह आलेख patrika.com पर दोनों समूहों के बीच विशेष अनुबंध के तहत पोस्ट किया गया है।)

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