gambling addiction india: उत्तरप्रदेश के महोबा में पत्नी और बेटियों-बेटे ने मिलकर एक शख्स को मौत की नींद सुला दिया। वो भी इसलिए क्योंकि वो शराब और जुए की लत का आदी था। यह सिर्फ एक क्राइम या अपराध नहीं है, बल्कि टूटते परिवारों और खतरनाक लत की सच्ची कहानी है, कैसे समाज बर्बादी के दलदल में धंसता जा रहा है। कैसे डोपामिन लूप काम करता है और इंसान को अपने जाल में फंसाता है...
gambling addiction india: उस रात जब एक ही थाली में खाना परोस कर, सभी ने एक साथ बैठकर रोटी खाई, आपस में बातें कीं और शायद हंसी मजाक भी...
लेकिन उसी रात उसी घर की दीवारों के बीच पसरी खामोशी में एक खौफनाक फैसला भी लिया गया था...
हत्या का।
उत्तर प्रदेश के महोबा से आई ये खबर सिर्फ हत्या की साजिश या घटनाक्रम नहीं थी। बल्कि एक ऐसे सच का आईना है, जिसे हम या आप अक्सर नजरअंदाज कर देते हैं। हरनारायण प्रजापति जो शराब और जुए का आदी था। पूरा परिवार उसकी आदतों से परेशान था। अपनी बेटी की शादी के लिए उसने भैंस बेचकर 82,500 रुपए जुटाए थे। लेकिन अब परिवार को डर था कि कहीं वो इस पैसे को बर्बाद न कर दे।
इस डर, और टूटते भरोसे ने परिवार को एक ऐसे रास्ते पर ला खड़ा किया कि जहां पत्नी, बेटियों और बेटे ने एक साथ मिलकर अपने ही घर के मुखिया की हत्या करने को मजबूर कर दिया। साजिश उसी समय रची गई जब सभी एक साथ एक ही थाली में खाना खाने बैठ रहे थे। रात के गहराते अंधेरे में वारदात को अंजाम भी दे दिया गया।
अब सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ एक अपराध है? या फिर उस धीमे जहर का नतीजा, जो जुए, शराब और इस बार जीतूंगा जैसी सोच के जरिए हमारे समाज में फैलता जा रहा है! पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट...
महोबा में रहने वाला हरनारायण प्रजापति लंबे समय से शराब और जुए का आदी था। बेटी की शादी के लिए उसे भैंस बेचकर हजारों रुपए जमा किए। अब परिवार के मन में डर उपजा और इस कहानी ने नया मोड़ ले लिया। उसी रात परिवार ने आपस में मिलकर साजिश रची और मुखिया को दर्दनाक मौत दे दी। इस मुखिया में न पत्नी को पति नजर आया, न बच्चों को एक पिता, वो सिर्फ लती व्यसनी या कहें एक ऐसा ना उम्मीद चेहरा बन गया था जिसने परिवार को निराश, हताश करके छोड़ दिया था।
एक्सपर्ट्स कहते हैं कि, जुआ और शराब की लत एक व्यक्ति पर ही नहीं बल्कि, पूरे परिवार पर असर डालती है। धीरे-धीरे भरोसा खत्म होता है। रिश्ते कमजोर पड़ते हैं। घर-परिवार के बीच तनाव बढ़ता जाता है। कई मामलों में यह मानसिक दबाव इस घटना की तरह ही हिंसक, क्रूर रूप ले लेता है।
जुआ सड़क पर या किसी पब में खेले जाने वाला खतरनाक खेल नहीं है। बल्कि आजकल ये मोबाइल पर भी आसानी से खेला जा सकता है। कई परिवारों ने पिछले कुछ सालों में अपने बच्चों को खोया है, क्योंकि इन मोबाइल गेम्स में उन्होंने पेरेंट्स के पैसे का इस्तेमाल किया और जब हार गए तो मौत को गले लगा लिया। Dream 11 जैसे फैंटेसी प्लेटफॉर्म, ऑनलाइन बेटिंग एप्स, शेयर मार्केट ये भी ऐसे ही प्लेटफॉर्म है, जहां एक साइकोलॉजिकल लूप बन जाता है। हर हार के बाद व्यक्ति को लगता है कि अगली बार जीत जाऊंगा, इस बार तो जीतूंगा ही, तो मुनाफा ही होगा, जो पैसे हारे उससे ज्यादा ही कमाऊंगा।
यही सोच व्यक्ति को इस एडिक्शन के दलदल में धकेलती जाती है। हालांकि कई प्लेटफॉर्म ऐसे होते हैं, जो खुद को स्किल बेस्ड बताते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का कहना है कि इनका इस्तेमाल कई लोगों के लिए जुए जैसा व्यवहार पैदा कर सकता है।
भारत में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर जुआ को लेकर कानून एक जैसा नहीं है, यह केंद्रीय और राज्य कानूनों का मिश्रण है। लेकिन बेसिक कानून public gambling act 1867 के तहत पब्लिक प्लेस पर जुआ खेलना अवैध है। लेकिन यह कानून ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के दौर से बहुत पहले का है। वहीं ऑनलाइन गेम ऑफ स्किल को कई मामलों में कानूनी माना गया है। रम्मी, फेंटेसी स्पोर्ट्स इसके उदाहरण हैं। लेकिन गेम ऑफ चांस यानी लक बेस्ड गेम्बलिंग को गैर कानूनी माना गया है।
भारत में हर राज्य का अपना अलग रुख है। सिक्किम, गोवा में कुछ मामलों में परमिशन दी गई है। वहीं तेलंगाना, आंध्र प्रदेश में सरकार का कड़ा है। इसका सीधा सा अर्थ है कि आपको अपने राज्य के अनुसार ही अपने कानून का पालन करना होगा।
इन मामलों पर हुई एक Medical रिसर्च के मुताबिक जुआ खेलने पर इंसान के दिमाग में डोपामिन रिलीज होता है। यह खुशी का अहसास कराता है। यह वही केमिकल है जो सफलता या किसी को प्यार में डूब जाने पर, अच्छा खाना खाने पर और जीत की खुशी होने पर महसूस होता है। और यह एक ऐसा जाल है जिसमें फंसकर व्यक्ति इसे बार-बार अनुभव करने के लिए दोहराना चाहता है।
भोपाल के मनोचिकित्सक डॉ .सत्यकांत त्रिवेदी कहते हैं लत सिर्फ एक आदत नहीं बल्कि एक मानसिक बीमारी है। ये ब्रेन के डोपामिन ड्रेवेन साइकल को कंट्रोल करने लगती है। आम तौर पर किसी भी इंसान को खाना खाने से, जीतने पर जो खुशी मिलती है, नशे और जुए के एडिक्शन इन्हीं ट्रेक्ट को खुद से मैनुपुलेट करने लगते हैं। इनका पीक ऐसा होता है कि वे आम जिंदगी से बोर होने लगते हैं। और धीरे-धीरे इन्हीं पर निर्भर हो जाते हैं।
डॉ. सत्यकांत बताते हैं कि 'इसके बाद ऐसे लोगों में 'मैं ही जीतूंगा' जैसी गलत सोच डेवलप हो जाती है। साइकोलॉजी की भाषा में इसे कम्यूनिटी एरर कहा जाता है। इसके चलते व्यक्ति और ज्यादा जोखिम लेने लगता है। पिछले 10 सालों में मध्यप्रदेश में ऐसे केसेस तेजी से बढ़े हैं। खास तौर पर जब क्रिकेट मैच होते हैं, उन दिनों में ये केस ज्यादा सामने आते हैं।
फिर चाहे जीत हो या हार, दोनों ही समय यह डोपामिन लूप काम करता रहता है। समय के साथ व्यक्ति सामान्य जीवन से बोर होने लगता है। क्योंकि उसे फास्ट डोपामिन जुआ खेलने पर ही मिलने लगता है। यही कारण है कि व्यक्ति एडिक्ट हो जाता है और यह लत उसे दलदल में धकेलती रहती है।
ऐसे मामलों में एडिक्ट व्यक्ति खुद ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार मुश्किल दौर से गुजरता है। एक मानसिक तनाव उन पर हावी हो जाता है। बच्चों में डर, पत्नी में असुरक्षा और बुजुर्ग अगर हैं, तो उनकी चिंता लगातार बढ़ती जाती है। आर्थिक स्थिति खराब हो जाती है और सामाजिक दबाव भी सहना पड़ता है। कई बार चारों तरफ से आने वाले यही परिणाम ऐसे खौफनाक फैसलों का रूप ले लेते हैं, जैसा कि हरनारायण के परिवार ने किया।
ऑनलाइन बेटिंग के ही नहीं बल्कि कई गेम्स ऐसे हैं, जो जुआ जैसा ही फील कराते हैं। कई ऑनलाइन एप्स ऐसे हैं जो कहीं न कहीं बेटिंग को जनरलाइज्ड बना रहे हैं। गेमिंग के नाम पर लोगों को और एडिक्ट बनाया जा रहा है। ऐसे मामलों में एक बड़ी संख्या युवाओं की है। ज्यादातर युवा इस जाल में फंसते जा रहे हैं।
-अपनी महत्वाकांक्षाओं को कंट्रोल रखें
-कम समय में पैसा कमाने के लालच से दूर रहें।
-जो भी व्यक्ति इस समस्या से जूझ रहा है, उसे मनोचिकित्सक को जरूर दिखाएं
-दवाओं और काउंसलिंग के जरिए इसका समाधान आसानी से किया जा सकता है।
रौंगटे खड़े करने वाली ये सच्ची कहानी किसी एक परिवार की नहीं है, बल्कि ऐसे सौकड़ों भारतीय परिवार हैं। लेकिन अब भविष्य में ऐसी बर्बादी न आए, उसके लिए जरूरी है आप जागें, अवेयर रहें और जरूरत पड़े तो मनोचिकित्सक की सलाह जरूर लें। patrika.com की ये खबर आपको कैसी लगी हमें कमेंट बॉक्स में जरूर बताएं।