
River Fish and Microplastic: दुनिया में भारत समेत कई देशों में नदियों को पूजने की संस्कृति रही है। जिन देशों में नदियों के किनारे पूजा और संस्कार नहीं भी किए जाते हैं, वहां भी लोग इसे प्रकति की नेमत तो मानते ही हैं, लेकिन साथ ही साथ में यह भी विडंबना रही है कि इसे हम बचाने में सक्षम नहीं हो पा रहे हैं। नदियां जो दुनिया में इंसानी सभ्यता की जीवनरेखा है, उनमें भारी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण पाया जा रहा है। यही वजह है कि हम अपनी नदियों के प्रदूषण को लेकर चौंकते नहीं हैं। उदास नहीं होते। किसी किस्म की घबराहट में नहीं आते।
अभी बांग्लादेश की एक आदरणीय नदी हलदा की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक पाई गई है। वहां ऐसी चेतावनी कोई पहली बार नहीं है। ना ही दुनिया में मछली या समुद्री जीवों में माइक्रोप्लास्टिक पाने की पहली खबर है। दुनिया के अलग-अलग मुल्कों में वैज्ञानिकों ने नदियों और समुद्रीय जल-जंतुओं में प्लास्टिक प्रदूषण को लेकर दर्जनों बार शोध पत्र जारी किए हैं। इसके बावजूद जलीय तंत्र में माइक्रोप्लास्टिक के फैलाव को रोकने या नदियों को बेरहमी से हो रहे अतिक्रमण से बचाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए हैं।
ढाका विश्वविद्यालय और चटगांव विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किए गए एक संयुक्त अध्ययन में हलदा नदी की मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण की जांच की गई। अध्ययन में पाया गया कि जांची गई सभी मछलियों के शरीर में माइक्रोप्लास्टिक मौजूद थे। शोधकर्ताओं ने आठ प्रजातियों की लगभग 48 मछलियों के नमूनों की जांच की। हर मछली के पाचन तंत्र में औसतन 6.5 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए, जबकि मांसपेशियों के ऊतकों में कम से कम छह माइक्रोप्लास्टिक कण मौजूद थे। यह स्थिति विशेष रूप से चिंताजनक है क्योंकि प्लास्टिक के सूक्ष्म कण अब केवल मछलियों के पाचन तंत्र तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उन हिस्सों तक भी पहुंच चुके हैं जिन्हें मनुष्य भोजन के रूप में खाता है। इससे संभावित रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य पर गंभीर खतरे पैदा हो सकते हैं।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि रेशेदार (फाइबर) माइक्रोप्लास्टिक कणों की मात्रा अधिक थी। माना जाता है कि ये कण सिंथेटिक कपड़ों और औद्योगिक अपशिष्टों से जुड़े होते हैं। ऐसे कण पर्यावरण में मौजूद जहरीले रसायनों को अपने अंदर जमा कर सकते हैं और अपने आकार के कारण कोशिकाओं के अंदर तक अधिक गहराई से प्रवेश कर सकते हैं, जिससे आंतों और फेफड़ों को गंभीर नुकसान पहुंचने की संभावना होती है।
इस प्रदूषण का मुख्य कारण हलदा नदी से जुड़े कई नाले हैं, जो घरों और उद्योगों से निकलने वाले कचरे को नदी में पहुंचाते हैं। समय के साथ यही प्लास्टिक छोटे-छोटे कणों में टूटकर खाद्य श्रृंखला में प्रवेश कर जाता है। इससे कई सवाल उठते हैं कि आखिर बिना उपचार किए गए अपशिष्ट को अब भी नदियों में जाने की अनुमति क्यों दी जा रही है और नए औद्योगिक प्रतिष्ठानों को आसपास के जल स्रोतों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त नियमों के बिना मंजूरी कैसे मिल रही है।
हलदा नदी (Halda River) देश में प्रमुख कार्प (मछली) प्रजातियों के प्रजनन का एकमात्र प्राकृतिक केंद्र है और यह एक महत्वपूर्ण पारिस्थितिक संसाधन है। इस नदी को देश का पहला “फिश हेरिटेज साइट” (मछली का पहला विरासत स्थल) भी घोषित किया गया है और यहां मछली पकड़ने तथा अन्य हानिकारक गतिविधियों पर प्रतिबंध भी लगाए गए हैं। ऐसे में यह बेहद विडंबना है कि इस नदी को वर्षों से अनियंत्रित प्रदूषण और अतिक्रमण की समस्या से जूझने के लिए छोड़ दिया गया है।
मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण कोई नई समस्या नहीं है। इससे पहले भी सुंदरबन क्षेत्र की हिल्सा या इलिश मछली और कई अन्य मछलियों व समुद्री जीवों में माइक्रोप्लास्टिक पाए जाने की जानकारी सामने आ चुकी है। यह नया अध्ययन इस बढ़ते प्रमाण को और मजबूत करता है कि हमारी नदियां प्लास्टिक कचरे के भंडार में बदलती जा रही हैं। साथ ही यह लगातार कमजोर होते नियामक तंत्र और निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठाता है।
बांग्लादेश ही नहीं, बल्कि दुनिया की कई बड़ी नदियां जो उस देश की जीवनरेखा हैं, उनमें पाई जाने वाली मछलियों में भी माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण कहीं भारी मात्रा में तो कहीं ठीक-ठाक मात्रा में पाया जा चुका है। इससे सिर्फ मछलियों को ही नहीं बल्कि अन्य जलीय जीवों में भी माइक्रोप्लास्टिक का पाया जाना इंसानी सभ्यता के लिए खतरा पैदा कर रहा है। आइए जानते हैं कि दुनिया की किन विशाल नदियों के जलीय जीवों में माइक्रोप्लास्टिक पाया जा चुका है।
गंगा भारत की सबसे बड़ी नदी है। यह उत्तराखंड में गोमुख से निकलकर (Ganga River) बांग्लादेश तक जाती है। इसकी कुल लंबाई 2,525 किलोमीटर है। बांग्लादेश में गंगा जिसका नाम बदलकर पद्मा (Padma River) हो जाता है, की लंबाई 356 किलोमीटर के करीब है। इसके किनारे दुनिया की सबसे अधिक आबादी बसर करती है। यह लंबे समय से प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या से जूझ रही है। इसमें पाई जाने वाली मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि गंगा की प्रदूषण की वजहों में नदी में घरेलू कचरा, उद्योगों का कचरा, कपड़ों से निकलने वाले सिंथेटिक फाइबर और प्लास्टिक पैकेजिंग हैं। गंगा और उसकी सहायक नदी ब्रह्मपुत्र और पद्मा में 140 मीठे और समुद्र से आने वाली किस्म की मछलियों की प्रजातियां पाई जाती हैं। यह भी सच है कि इस नदी के किनारे रहने वाली बड़ी आबादी मछली खूब चाव से खाते हैं।
गंगा की मछलियों जैसे रोहू, वॉलागो अट्टू आदि में औसतन लगभग 1.6 से लेकर 2.5 प्लास्टिक कण प्रति मछली में पाए गए। लाल फिन वाले महाशीर में लगभग 53.13 कण/मछली मिल चुका है। 'हिम ट्राउट' जिसे उत्तराखंड और हिमाचल के लोग 'असाला' या 'असेला' के नाम से जानते हैं, उसमें प्रति मछली माइक्रोप्लास्टिक 36.33 कण पाए गए हैं। कार्प ग्रुप की कालाबांस जिसे पूर्वोत्तर में खबक या नगटों कहा जाता है। इसमें माइक्रोप्लास्टिक प्रति मछली लगभग 15.42 कण पाए गए हैं।
भारत की यमुना नदी का बड़ा हिस्सा कई दशकों से पूरी तरह से प्रदूषित हो चुकी है। दिल्ली में यमुना कई दशकों से नाला बन चुकी है। यह दिल्ली के 22 किलोमीटर के हिस्से में बहती है। देखा जाए तो यह नदी की कुल लंबाई का बहुत ही छोटा हिस्सा है लेकिन दिल्ली इसे अकेले लगभग 70% तक प्रदूषित करती है। यमुना भी गंगा की तरह हिमालय से निकलेवाली नदी है। यह उत्तराखंड के गढ़वाल में बंदरपूछ चोटियों के पास स्थि यमुनोत्री ग्लेशियर निकलती है और लगभग 1,376 किलोमीटर की यात्रा करके प्रयागराज में गंगा में विलीन हो जाती है। यमुना नदी में रोहू, कतला और कॉमन कार्प, सुनहरी महसिर आदि मछलियां पाई जाती हैं। यमुना नदी के पानी में माइक्रोप्लास्टिक की औसत मात्रा लगभग 14,717 ± 4,444 कण प्रति लीटर तक दर्ज की गई है। यमुना में दिल्ली, मथुरा, आगरा और कानपुर में प्रदूषण भारी मात्रा में है।
दुनिया की सबसे विशाल नदियों में एक अमेजन नदी (Amazon River) को जैव विविधातों के लिए जाना जाता है। दक्षिण अमेरिका की इस नदी में दूर-दराज के क्षेत्रों तक भी प्लास्टिक प्रदूषण पहुंच चुका है। इसके बेसिन में कुछ मछली प्रजातियों में माइक्रोप्लास्टिक मिलने के प्रमाण मिले हैं। अमेजन के नदी तटीय क्षेत्र के अध्ययन में विभिन्न मछलियों में लगभग 2.8–3.3 कण प्रति मछली माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए।
वहीं अमेजन नदी मुहाना की 14 प्रजातियों की 26 संक्रमित मछलियों से कुल 228 माइक्रोप्लास्टिक कण मिले। वहीं सबसे लंबी नदियों में से एक यांग्त्जी नदी (6,300 किमी.) के मुहाने की छोटी मछलियों के अध्ययन में लगभग 99% नमूनों में माइक्रोप्लास्टिक मिला और औसत मात्रा 10.13 कण प्रति मछली दर्ज की गई, जबकि कैटफिश समूह की मछलियों के पाचन तंत्र में यह लगभग 606.67 कण/ग्राम पाई गई। यूरोप की डेन्यूब नदी में लगभग 37.6% मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले। सबसे ज्यादा लगभग 22.7% राउंड गोबी मछलियों में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले।
पर्यावरण के जानकार सोपान जोशी ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि हम नदियों से हैं, नदियां हमसे नहीं हैं। नदियों की उम्र लाखों-करोड़ों साल में है, जबकि इन्सान का पुराने से पुराना गाँव भी दस हजार साल पहले का ही है। मनुष्य के खत्म हो जाने के बाद भी यह नदियां बनी रहेंगी, इसमें किंचित भी संदेह नहीं है।
उन्होंने कहा कि हम नदियों का संरक्षण नहीं कर सकते। अपने आप को नदियों का संरक्षक मानना हमारा घमंड और हमारी आत्मलीनता दिखलाता हैं। औद्योगिक युग के पहले नदियों को देवी-देवताओं की जगह दी जाती थी क्योंकि लोगों में उनके प्रति कृतज्ञता थी।
औद्योगिक युग ने मनुष्य की आत्मलीनता का चौतरफा विकास किया है। प्रकृति को प्राकृतिक संसाधनों में बदला है, उसे प्रदूषित किया है, फिर अपने आप को उसका संरक्षक बताया है। विकास के इस आत्मकपट के पीछे प्रचंड अंधविश्वास है। विकास के अंधों को संरक्षण ही संरक्षण दिखता है।
माइक्रोप्लास्टिक के कण केवल नदियों के पानी को ही नहीं दूषित कर रहे हैं। माइक्रोप्लास्टिक के कण समुद्र, मिट्टी और खाद्य श्रृंखला तक फैल चुके हैं। मछलियां इन्हें भोजन समझकर निगल लेती हैं और फिर यही कण इंसानों तक पहुंच सकते हैं। हमारी नदियों और उनके पारिस्थितिक तंत्र को होने वाला नुकसान किसी ऐसे स्तर तक न पहुंचे जहां से वापसी संभव न हो और यह स्थिति भविष्य में एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप न ले ले।