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बेटियों के जन्म पर क्यों नहीं गूंजे उनके अपने सोहर गीत, एमपी की अनोखी पहल ने बदली रिवायत

Girl child Birth celebration: मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से शुरू हुआ नया बदलाव, जेंडर इक्वलिटी पर काम करने वाली कुमुद सिंह ने रचा इतिहास, 12 भाषाओं में 2200 से ज्यादा बेटी जन्मोत्सव के बधाई गीतों का कलेक्शन तैयार, प्रयासों की नींव से बदल रहीं दिखावे की परम्पराएं

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Apr 24, 2026
MP News Daughters birth wishes songs(photo:AI)

Girl child Birth celebration: भारतीय संस्कृति में बेटियों की बिदाई के सैकड़ों ऐसे गीत मिल जाएंगे, इन गीतों के बोल घर-परिवार के साथ ही हर मेहमान की आंखें ऐसे भिगोते हैं कि जैसे उनकी अपनी ही बेटी बिदा हो रही है। लेकिन जब वही बेटी दुनिया में आती है, तो उसकी खुशी के गीत कहां सुनाई देते हैं…? सच यही है कि आज भी ज्यादातर घरों में बेटियों के जन्म पर बेटों के लिए गाए जाने वाले गीतों को ही बदलकर गा दिया जाता है।

यानी बेटी के अस्तित्व के लिए अलग से शब्द गढ़े ही नहीं गए। अफसोस कि विविधता के रंग में रंगी किसी भी भारतीय संस्कृति और परम्परा में बेटियों के जन्म का जश्न (Girl child Birth celebration)मनाने वाले गीत ढूंढना किसी के लिए मुश्किल भरा रहा। लेकिन अब मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से शुरू हुई एक पहल इस मुश्किल को आसान कर गई, जहां बेटियों के लिए उनके अपने मौलिक गीत न केवल लिखे, बल्कि गाए भी जा रहे हैं। आखिर किसने रखी पितृसत्तात्मक समाज में बेटियों की बराबरी की एक नई नींव…

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शहर की कुमुद सिंह ने तोड़ी पुरानी परम्परा

भारतीय समाज में सदियों से सोहर और बधाई गीत बेटों के जन्म का पर्याय रहे हैं। लेकिन शहर की कुमुद सिंह ने इस पुरानी परम्परा की धारा को मोड़ दिया। सरोकार संस्था के माध्यम से कुमुद ने एक ऐसी सांस्कृतिक क्रांति की नींव रखी है, जहां बेटियों का आगमन अब उधार के गीतों (बेटों के गीतों में बदलाव करके बेटियों के लिए गाना) से नहीं, बल्कि उनके अपने अस्तित्व को बयां करने वाले मौलिक बधाई गीतों से हो रहा है। 2018 से शुरू हुआ यह सिलसिला आज 12 से ज्यादा बोलियों और 2200 से ज्यादा गीतों के विशाल संग्रह में तब्दील हो चुका है।

घर आई बेटी, तो सभी ने गाए बेटों के बधाई गीत, तब उठी टीस

इस अभियान की शुरुआत करने के लिए कुमुद को खुद से ही प्रेरणा मिली। वो भी अपने एक व्यक्तिगत अनुभव से। कुमुद कहती हैं 1998 में जब उनको बेटी हुई, तब घर की महिलाओं ने वही बधाई गीत गाए, जो बेटों के लिए गाए जाते हैं। तब उन्हें अहसास हुआ कि हमारी लोक संस्कृति में बेटी की खुशी व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र गीत (Girl child Birth celebration) ही नहीं हैं। इसी टीस ने उन्हें ऐसे गीतों को खोजने लिए प्रेरित किया। जब वर्षों की तलाश के बाद भी बेटियों के मौलिक बधाई गीत नहीं मिले, तो उन्होंने ऑनलाइन प्रतियोगिताओं के जरिए देशभर के रचानाकारों को जोड़ा और एक नया इतिहास रच दिया।

भाषाओं की सरहद लांघती बेटियों की खुशबू

कुमुद के पास हिंदी, बंगाली, मराठी, तेलुगु, तमिल और गुजराती जैसी भाषाओं के साथ बुंदेली, बघेली, मालवी, निमाड़ी, भोली और गोंडी जैसी लोक बोलियों का खजाना है। इन गीतों में केवल खुशी नहीं, बल्कि बेटियों की अस्मिता, उनके अधिकारों की गूंज (Girl child Birth celebration) है। जूरी के माध्यम से चयनित गीतों के लेखकों को हर साल पुरस्कृत भी किया जाता है।

MP news daughters birth wishes song: कुमुद सिंह, संस्था से जुड़ीं बेटियों के साथ(photo:patrika)

परिवर्तन का डिजिटल मंच

कुमुद बताती हैं कि कोरोना काल से पहले ही डिजिटल शक्ति को पहचाना। ऑनलाइन प्रतियोगिता शुरू की, जिसमें हर तरह के लेखकों से बेटियों के जन्म पर गाने के लिए मौलिक गीत (Girl child Birth celebration) मांगे गए। इन गीतों को साहित्य, सामाजिक प्रभाव और नवाचार की कसौटी पर कसकर पुरस्कृत किया जाता है। यह पहल अब एक आंदोलन बन चुकी है। इससे नई सांस्कृतिक परम्परा को बढ़ावा मिल रहा है।

सांस्कृतिक बदलाव के बड़े आंकड़े

  • 20 साल का संघर्ष: भोपाल को केंद्र बनाकर देशभर में जेंडर इक्विटी पर सक्रिय
  • 2200 से अधिक गीतों का संकलन: देशभर से करीब 20 बोली-भाषाओं में प्राप्त प्रविष्टियां। इसके माध्यम से गीतों का चयन करने में आसानी हुई।
  • 250 खास रचनाएं: 12 बोलियों में ऐसी मौलिक रचनाएं(बधाई गीत) हैंस, जो मूलत: बेटियों को समर्पित हैं। ये गीत बराबरी, हक और सम्मन के साथ साहित्यिक कसौटी को पूरा करते हैं।
MP News Kumud singh (photo:patrika)

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Updated on:
24 Apr 2026 05:15 pm
Published on:
24 Apr 2026 05:06 pm
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