CG News: हिड़मा का घर पूछने पर स्थानीय महिलाएं भाषा की बाधा के कारण मौन रहीं, लेकिन आंध्र प्रदेश से लौटे एक हिंदी भाषी युवक ने हमारी मदद की। हैरत की बात यह है कि इस परिवार ने आज तक कभी वोट नहीं डाला।
CG News: @ देवेंद्र गोस्वामी। प्रदेश में नक्सलवाद के खात्मे की समय-सीमा समाप्त होने से के बाद 'पत्रिका' की टीम उस गांव में पहुंची जिसे दुनिया का सबसे खतरनाक इलाका और दुर्दांत नक्सली हिड़मा व देवा का सुरक्षित गढ़ माना जाता है। सुकमा जिले का पूवर्ती गांव, जो कभी खौफ का पर्याय था, आज अपनी खामोशी को तोड़कर विकास की राह देख रहा है। राजधानी रायपुर से 500 किमी दूर इस सफर में झीरम घाटी, ताड़मेटला और चिंतागुफा जैसे हिंसा के निशान कदम-कदम पर मिलते हैं। जगरगुंडा के बाद जब हम पथरीले रास्तों पर बढ़े, तो शाम ढल रही थी। गांव पहुंचते ही एक अजीब सा सन्नाटा पसरा था।
हिड़मा का घर पूछने पर स्थानीय महिलाएं भाषा की बाधा के कारण मौन रहीं, लेकिन आंध्र प्रदेश से लौटे एक हिंदी भाषी युवक ने हमारी मदद की। हैरत की बात यह है कि इस परिवार ने आज तक कभी वोट नहीं डाला। वोटर लिस्ट में इनका नाम तक नहीं है। हिड़मा के भाई ने बताया कि हिड़मा बहुत पहले घर छोड़कर चला गया था। हमारा संगठन से कोई लेना-देना नहीं है। अब जाकर कैंप में हमारे आधार कार्ड बने हैं और राशन कार्ड की प्रक्रिया चल रही है।
सोलर लाइट की धुंधली रोशनी में इमली के पेड़ के नीचे हिड़मा का कच्चा मकान खड़ा था। घर में बिजली का कनेक्शन नहीं है। यहां हिड़मा का भाई माड़वी मोया और भतीजा माड़वी अड़मा (15 वर्ष) मिले। 15 साल के अड़मा की शादी हो चुकी है, लेकिन उसने कभी स्कूल का चेहरा नहीं देखा। संवाद में शब्दों से ज्यादा खामोशी थी।
पूवर्ती में भले ही मूलभूत सुविधाओं का अभाव हो, लेकिन तकनीक पहुंच चुकी है। हिड़मा के परिजनों के पास स्मार्ट फोन है, जिस पर वे गोंडी गाने और क्रिकेट वीडियो देखते हैं। हालांकि, आय का साधन आज भी केवल खेती और महुआ संग्रहण ही है। रात के सन्नाटे में जब मोबाइल की घंटी बजती है, तो वह बदलते बस्तर की आहट जैसी लगती है।
पूवर्ती आठ पारों में बंटा है। ओई पारा में दुर्दांत नक्सली बरसे देवा का घर है। रात के अंधेरे और सुरक्षा कारणों से वहां जाना मुमकिन नहीं था। पूरी रात हमने हिड़मा के घर के सामने गाड़ी में बिताई। जिस इलाके में कभी परिंदा भी पर नहीं मार सकता था, वहां अब रात के अंधेरे में सड़क निर्माण की मशीनों की आवाज सुनाई देती है।
सुबह 4 बजे गांव में हलचल शुरू हो गई। लोग महुआ बीनने जंगलों की ओर निकल पड़े और कुछ बच्चे सीआरपीएफ कैंप द्वारा संचालित स्कूल जाने की तैयारी करने लगे। गुरुवार को अब गांव में बाजार सजने लगा है और बस सेवा भी शुरू हो गई है। पूवर्ती, जो कभी नक्सलवाद का 'पावर सेंटर' था, अब अपनी पहचान आतंक के गढ़ से बदलकर एक सामान्य विकसित गांव के रूप में बनाने की जद्दोजहद कर रहा है।