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Holi 2026: छत्तीसगढ़ में परंपराओं की डोर से बंधी होली, बांस की पिचकारी और सामूहिक नृत्य से जीवंत होती सदियों पुरानी परंपरा

Holi 2026: जहां शहरों में होली का रंग एक-दो दिन में सिमट जाता है, वहीं कबीरधाम जिला के पंडरिया ब्लॉक के वनांचल में बसने वाला बैगा जनजाति समाज तेरह दिनों तक इस पर्व को परंपरा और उल्लास के साथ मनाता है

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Mar 03, 2026

Holi 2026: @यशवंत झारिया। छत्तीसगढ़ में होली सिर्फ रंग-गुलाल लगाकर उत्साह मनाने का त्योहार नहीं है, बल्कि परंपराओं के माध्यम से फागुन के निखरने का त्योहार है। यहां नई-पुरानी पीढिय़ां आधुनिकता के साथ ही पुरानी मान्यताओं की जड़ों की तरह फैली अनेक रीतियों की गवाह हैं। इस आदिवासी राज्य में एक-दो नहीं वरन कई पीढिय़ों से चले आ रहे अनुशासन के भी दर्शन होते हैं। रायपुर, दुर्ग, बिलासपुर, सरगुजा, बस्तर अपने आप में ही एक इतिहास लिए हुए क्षेत्र हैं। भले ही पहले संभवत: यहां एकरूपता नहीं दिखी हो, लेकिन आज छत्तीसगढ़ न सिर्फ एक राज्य के तौर पर अपनी परंपराओं को सहेजकर आगे बढ़ रहा हो, बल्कि आपसी आदान-प्रदान और एकता के सूत्र ने राज्य के सभी कोनों को जोड़ दिया है।

हमारे राज्य को विविध संस्कृतियों का त्रिवेणी संगम कहा जाता है, इसके दर्शन अनेक तीज-त्योहारों में दिखता है। ऐसा ही संगम होली पर भी नजर आता है। शहरों से अलग ग्रामीण क्षेत्रों में कुछ पुरानी किवदंतियां भी होली पर नजर आती हैं। हमारी परंपराएं इसलिए भी सबसे पुरानी हैं क्योंकि यह प्रकृति के साथ जुड़ी हुई हैं। हमारे त्योहारों में प्रकृति से लेने का नहीं, वरन देने का ‘रिवाज’ है। होली पर भी यह बखूबी देखने को मिलता है। कहीं एक-दो सप्ताह पहले बिना होलिका दहन के रंग-गुलाल लगाया जाता है तो कहीं पर होली इसलिए भी नहीं जलाई जाती है कि इससे पेड़-पौधों का नाश होगा और पर्यावरण का संतुलन बिगड़ेगा। यह अनुशासन ही रंगों के त्योहार को खास बनाता है।

जहां शहरों में होली का रंग एक-दो दिन में सिमट जाता है, वहीं कबीरधाम जिला के पंडरिया ब्लॉक के वनांचल में बसने वाला बैगा जनजाति समाज तेरह दिनों तक इस पर्व को परंपरा और उल्लास के साथ मनाता है। यहां होली केवल रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति, सामूहिकता और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उत्सव है, जिसे स्थानीय भाषा में ‘तेरस’ कहा जाता है।

पंडरिया विकासखंड के सुदूर गांवों में फाल्गुन पूर्णिमा की सुबह ‘सेमर डंडा’ गाडक़र उत्सव का शुभारंभ किया जाता है। गड्ढे में पहले अंडा रखा जाता है, उसके चारों ओर लकडिय़ां सजाई जाती हैं। गांव का मुकद्दम (मुखिया) रात्रि के चौथे पहर होली का दीप प्रज्वलित कर विधि-विधान से पूजा करता है। इसी के साथ तेरह दिवसीय पर्व आरंभ हो जाता है।

राख-मिट्टी से खेली जाती है होली

होलिका दहन के अगले दिन ग्रामीण एक-दूसरे को राख और मिट्टी लगाकर होली खेलते हैं। युवक-युवतियां, महिला-पुरुष टोली बनाकर फाग गीत गाते हुए नृत्य करते हैं। बांस से बने ‘कुदवा’ के साथ घर-घर जाकर गीत गाए जाते हैं और गृहस्वामी को तिलक लगाया जाता है। बदले में अनाज या नेग दिया जाता है। एकत्रित अनाज से पूरे गांव में सामूहिक भोज होता है।

प्रकृति से बनती है पिचकारी और पोशाक

बैगा समाज में पिचकारी भी प्रकृति से तैयार की जाती है। बांस की लगभग दो फीट लंबी पिचकारी बनाई जाती है। युवतियों के लिए सेमर की लकड़ी से हल्की विशेष पोशाक ‘खेकड़ा-खेकड़ी’ तैयार की जाती है, जो इस उत्सव की पहचान है।

महीनेभर पहले शुरू होती है तैयारी

ग्राम नेऊर के महादेव सोनी बताते हैं कि होली की तैयारी एक माह पहले से शुरू हो जाती है। टेसू (पलाश) के फूलों को सुखाकर गुलाल तैयार किया जाता है। भदोर बेला, जिसे स्थानीय लोग ‘केशव फूल’ कहते हैं, उसके रस से गाढ़ा पीला रंग बनाया जाता है। टेसू से केसरिया आभा वाला रंग तैयार होता है। पूरी प्रक्रिया प्राकृतिक और पारंपरिक है, जिससे त्वचा को कोई नुकसान नहीं होता।

तेरहवें दिन भव्य समापन

तेरह दिनों तक चलने वाले इस पर्व का समापन ‘तेरस’ के बड़े आयोजन से होता है। इस दिन विशेष सामूहिक नृत्य, गायन और भोज का आयोजन होता है। बुजुर्गों से लेकर बच्चे तक उत्सव में शामिल होते हैं। महुआ का भी विशेष महत्व है, जिसके बिना पर्व अधूरा माना जाता है।

परंपरा और प्रकृति का संगम

वनांचल की यह होली केवल रंगों का उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति आस्था, सामूहिकता और सांस्कृतिक अनुशासन का प्रतीक है। आधुनिकता के प्रभाव के बावजूद बैगा समाज अपनी जड़ों से जुडक़र इस परंपरा को आज भी उसी आत्मीयता और गरिमा के साथ जीवित रखे हुए है।

शृंगार और फागुन नृत्य की अनूठी छटा

फागुन नृत्य बिना शृंगार के अधूरा माना जाता है। पुरुष घेरदार घाघरा, कमीज, काली जैकेट, सिर पर पगड़ी और मोरपंख की कलगी धारण करते हैं। गले में रंग-बिरंगी मालाएं और हाथ में पारंपरिक वाद्य ‘ठिसकी’ रहती है। महिलाएं मुंगी धोती पहनकर, जुड़े में मोरपंख सजाकर नृत्य करती हैं। ढोलक, मांदर और नगाड़ों की थाप पर पूरा गांव झूम उठता है।

लकड़ी का मुखौटा बनता है आकर्षण

उत्सव की खास पहचान पुरुष दल के प्रमुख द्वारा पहना जाने वाला लकड़ी का मुखौटा है। सेमर की लकड़ी को तराशकर तैयार इस मुखौटे को पहनकर मुखिया नृत्य की अगुवाई करता है। टोली के सदस्य मांदर, ढोलक और अन्य पारंपरिक वाद्यों की गूंज के साथ गांव-गांव घूमते हैं।

Published on:
03 Mar 2026 11:48 am
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