
Human Wildlife Conflict: मध्य प्रदेश के जंगलों में रहने वाले खूंखार वन्यजीवों के गांवों में घुसकर पालतू पशुओं पर हमले हों या फिर शहरों की सड़कों तक पहुंचकर इलाकों में दहशत की खबरें, चीतों के शिकार बदलने की कहानी कि वे जंगली जानवरों से ज्यादा पालतू पशुओं का शिकार कर रहे हैं। हाथियों के झुंड कभी खेतों तो कभी ग्रामीणों को रौंद रहे हैं…बाघों के आदमखोर बनने की खबरें हों… हर तरफ से यही शोर सुनाई देता है, 'जंगली जानवर आबादी में घुस आया है।' लेकिन क्या हकीकत में कहानी बस यही है? इस सवाल का जवाब है 'नहीं।' देश के प्रमुख वन्यजीव वैज्ञानिक कहते हैं यदि आप वन्यजीवों की इन खबरों को पढ़कर-सुनकर यह मानते हैं कि 'जानवर जंगल से बाहर आ गया है' तो यह एक भूल या किसी भ्रम से कम नहीं है। क्योंकि हकीकत में सवाल यह नहीं कि वन्यजीव जंगल से आबादी में क्यों आ रहे हैं? बड़ा सवाल यह है कि क्या इंसानों और वन्यजीवों के बीच बनी एक प्राकृतिक दूरी खत्म हो रही है? वन्यजीव संरक्षण में सफलता के साथ आगे बढ़ता भारत दुनिया भर के लिए मिसाल बन रहा है। लेकिन अब देश उस दौर में पहुंच रहा है, जहां वन्यजीवों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि इंसानों और वन्यजीवों का सुरक्षित सह अस्तित्व बड़ी चुनौती बनकर खड़ा है। patrika.com पर 'टूटती सरहद' में संजना कुमार के साथ पढ़ें इंसानों और वन्यजीवों के बीच बढ़ते संघर्ष का पूरा विज्ञान…
मध्यप्रदेश इसका ताजा उदाहरण बनकर उभरा है। कुनो नेशनल पार्क से कभी कोई चीता खेतों में पहुंच जाता है, कभी लोग दहशत में आते हैं, तो कभी उसे लाठी-डंडों का डर दिखाकर भगाते हैं। कभी बाघ, कभी तेंदुए इंसानी बस्तियों पर हमला करते हैं। कभी किसी इंसान का शिकार करते हैं और आदमखोर कहलाने लगते हैं। ऐसे कई वीडियो और खबरें अखबारों के साथ ही न्यूज पोर्टल की रोचक खबरों में सुर्खियां बटोरती हैं। रिएक्शन आते हैं.. बाघ/चीता/तेंदुआ जंगल से निकल बस्ती में घुस गया।' देश का टाइगर स्टेट, जो सबसे ज्यादा बाघों का घर है। चीता पुनर्स्थापना प्रोजेक्ट का केंद्र भी यही है, जो सफलता की सीढ़ी चढ़ना शुरू कर चुका है। देशभर में सबसे ज्यादा टाइगर रिजर्व कुनो, पन्ना, कान्हा, बांधवगढ, पेंच, सतपुड़ा, रातापानी, संजय डूंगरी, नौरादेही जैसे अभ्यारण्य भी यहीं हैं। गिद्धों का पसंदीदा ठिकाना, भेड़ियों और तेंदुओं का सबसे सुरक्षित स्थान भी यही है। यहां तक कि हाथियों को भी अब छत्तीसगढ़ से ज्यादा मध्यप्रदेश के ठिकाने बेतहर लग रहे हैं। यही कारण है कि मध्य प्रदेश में देशभर के सबसे संवेदनशील वाइल्डलाइफ जोन में गिना जाने लगा है।
लेकिन यकीन मानिए ऐसा नहीं है कि ये घटनाएं अकेले मध्य प्रदेश की हैं, राजस्थान के जयपुर के झालाना और अरावली क्षेत्र में भी तेंदुए इंसानी बस्तियों के बेहद करीब हैं। यहां भी पालतू पशुओं के शिकार और इंसानों पर हमले की घटनाएं कभी-कभार सामने आती हैं। यहां तक कि राजस्थान सरकार के Long Term Action Plan में Human Tiger Interface and Management पर अलग अध्याय है। इसमें स्पष्ट रूप से माना गया है कि बाघों का फैलाव और मानव क्षेत्रों से बढ़ता संपर्क भविष्य की बड़ी चुनौती है। मध्य प्रदेश के कई बाघ और चीते नेचुरल कॉरिडोर के माध्यम से राजस्थान तक पहुंचे हैं। इसके अलावा झालाना और जवाई जैसे क्षेत्रों में सहअस्तित्व का मॉडल विकसित किया जा रहा है। यानी चुनौती किसी एक राज्य की नहीं बल्कि उन सभी लैंडस्कैप्स की है, जहां संरक्षण सफलता मिली है और वन्यजीव अपने पारंपरिक रास्तों में आगे बढ़ रहे हैं।
वन्यजीव संस्थान (Wildlife Institute of India- WII) की वैज्ञानिक रिपोर्ट Population Management of Species Involved in Human Wildlife Conflict 2023 के मुताबिक भारत में मानव-वन्यजीवों के बीच संघर्ष को केवल एक घटना के रूप में नहीं देखा जा सकता। बल्कि इस संघर्ष में आवास विखंडन, बढ़ता मानवीय दबाव, बदलता भू उपयोग और वन्यजीवों की बढ़ती आवाजाही एक साथ काम करती है। यानी यह रिपोर्ट तैयार करने वाले वैज्ञानिक डॉ. कमर कुरैशी और उनके सहयोगियों का सवाल भी यही है कि बाघ, चीता या तेंदुए के जंगल से बाहर आने की नौबत आई ही क्यों?
कुनो के लिए तैयार चीता पुनर्स्थापना प्रोजेक्ट (Action Plan for Introduction of Cheetah in India) में भी वैज्ञानिक पहले ही सतर्क कर चुके थे कि जैसे-जैसे चीतों की संख्या बढ़ेगी, वे नए क्षेत्रों में फैलेंगे। इसलिए मानव बस्तियों से लगते इलाकों में निगरानी की आवश्यकता पड़ेगी। सुरक्षा उपाय और स्थानीय समुदायों की भागीदारी जरूरी होगी, ताकि चीतों और इंसानी आबादी के बीच संघर्ष को रोका जा सके।
यह चेतावनी केवल मध्य प्रदेश तक, पूरे भारत के उस हर राज्य की है, जहां वन्यजीव संरक्षण सफल हुआ है। गुजरात में एशियाई शेर भी इसका उदाहरण हैं। ये शेर अब गिर के संरक्षित जंगल तक सीमित नहीं हैं। उनकी आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्रों और राजस्व भूमि को भी अपना घर बना चुका है। मध्य भारत में बाघ संरक्षित क्षेत्रों से निकलकर कॉरिडोर के रास्ते दूसरे जंगलों और दूसरे राज्यों के जंगलों तक जाते हैं। वहीं तेंदुए अब गांवों और शहरों के किनारों के साथ रहना सीख चुके हैं। ऐसे ही उदाहरण हैं कर्नाटक और केरल के हाथी, महाराष्ट्र और उत्तराखंड में बाघ और तेंदुए, वहीं असम में हाथियों और गैंडों से जुड़े संघर्ष भी बताते हैं कि भारत में सबसे बड़ी चुनौती Human Wildlife Coexistence सुनिश्चित करने की है। हालांकि वन्यजीव एक्सपर्ट्स इसे संरक्षण की सफलता का परिणाम भी मानते हैं। उनका कहना है कि जब किसी वन्यजीव प्रजाति की संख्या बढ़ती है, तो युवा नर और मादा नए क्षेत्र खोजने निकल पड़ते हैं। इस स्थिति में समस्या तब होती है, जब उनके रास्ते में जंगल नहीं, बल्कि सड़कें, रेल लाइनें, खेत, खदानें और बस्तियां आ जाती हैं।
इसीलिए अब दुनिया भर में 'Human Wildlife Conflict' की जगह 'Human Wildlife Coexistence' शब्द पर ज्यादा फोकस किया जा रहा है। दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय प्रकृति एवं वन्यजीव संरक्षण संगठनों में से एक वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर (WWF) की Conflict to Coexistence की रूपरेखा बताती है कि लक्ष्य केवल सह अस्तित्व के संघर्ष कम करना भर नहीं, बल्कि ऐसा परिदृश्य स्थापित करना है, जहां लोग और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।
WII के मुताबिक मध्य प्रदेश इंसानी बस्तियों और वन्यजीव के सुरक्षित सहअस्तित्व की सबसे महत्वपूर्ण प्रोयगशाला बन सकता है। यहां बाघ हैं, तेंदुए हैं, भालू हैं और अब चीते भी। ऐसे में यहां सह अस्तित्व के मॉडल विकसित करने की संभावना सबसे ज्यादा है।
यानी असल में चुनौती जंगलों के अंदर नहीं बाहर से शुरू होती है। और ध्यान देना होगा कि हमारा सवाल भी यही है कि, क्या भारत के जंगल छोटे पड़ गए हैं? या फिर हमने जंगलों के बीच ऐसी दीवारें खड़ी कर दी हैं, जिनके कारण वन्यजीव इंसानी बस्तियों की ओर बढ़ते नजर आ रहे हैं।
अगले पार्ट में हम मध्यप्रदेश के जंगलों, बाघों, चीतों और टूटते वन्यजीव कॉरिडोर की वैज्ञानिक पड़ताल करेंगे और जानेंगे कि क्यों वाइल्डलाइफ विशेषज्ञ इस राज्य को भारत का सबसे महत्वपूर्ण 'Human-Wildlife Coexistence Landscape' की प्रयोगशाला मान रहे हैं?