
Rare Earth : भारत में अगली बड़ी खोज किसी नए शहर या नई फैक्ट्री की नहीं, बल्कि जमीन के नीचे छिपे खनिजों की हो सकती है। लिथियम, रेयर अर्थ और दूसरे महत्वपूर्ण खनिज आज बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहन, इलेक्ट्रॉनिक्स, सौर ऊर्जा और आधुनिक तकनीक के लिए बेहद जरूरी हो गए हैं। लेकिन चुनौती यह है कि जमीन के नीचे खनिज है तो कहां है? कितनी मात्रा में है? और वहां खुदाई करना कितना उपयोगी होगा?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशने की दिशा में आईआईटी भिलाई स्मार्ट माइनिंग तकनीक पर काम कर रहा है। संस्थान की रिसर्च में सेंसर और तकनीकी आंकड़ों के जरिए जमीन के भीतर छिपे खनिजों की पहचान और उनके आकलन की संभावनाएं तलाशने पर जोर है।
अभी किसी संभावित खनन क्षेत्र की पहचान के लिए सर्वे, नमूने और ड्रिलिंग जैसे तरीकों का इस्तेमाल होता है। इसमें समय, पैसा और संसाधन लगते हैं। स्मार्ट माइनिंग का विचार इससे एक कदम आगे है। सेंसर जमीन से संकेत जुटाएंगे ? आंकड़ों का विश्लेषण होगा ? संभावित खनिज क्षेत्र की पहचान होगी ? फिर जरूरत वाले हिस्से में ड्रिलिंग की जाएगी। यानी भविष्य की खदान में पहले मशीन जमीन को ‘पढ़ने’ की कोशिश करेगी और उसके बाद खुदाई का फैसला होगा। लक्ष्य सिर्फ खनिज ढूंढना नहीं, बल्कि कम समय और कम संसाधनों में ज्यादा सटीक खोज करना है।
कभी खनिजों की चर्चा मुख्य रूप से खनन और उद्योग तक सीमित रहती थी। अब इनका सीधा संबंध ऊर्जा और तकनीकी आत्मनिर्भरता से जुड़ गया है। लिथियम बैटरी के लिए महत्वपूर्ण है। रेयर अर्थ तत्व इलेक्ट्रॉनिक्स और कई उन्नत तकनीकी अनुप्रयोगों में काम आते हैं। ग्रेफाइट, निकेल और कोबाल्ट जैसे खनिज भी आधुनिक ऊर्जा और विनिर्माण क्षेत्र की जरूरतों से जुड़े हैं। यही वजह है कि दुनिया के कई देश इन खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहे हैं।
महत्वपूर्ण खनिजों की जरूरत को देखते हुए केंद्र सरकार ने नेशनल क्रिटिकल मिनरल मिशन शुरू किया है। इसका उद्देश्य केवल खनिजों की खोज करना नहीं है। खोज से लेकर खनन, प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण तक पूरी मूल्य शृंखला को मजबूत करना मिशन का हिस्सा है। यहीं से आईआईटी भिलाई की स्मार्ट माइनिंग रिसर्च का राष्ट्रीय कनेक्शन बनता है। क्योंकि भारत के सामने पहला सवाल यही है, खनिज चाहिए, लेकिन पहले यह पता तो चले कि जमीन के नीचे है कहां?
स्मार्ट माइनिंग का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर व्यावहारिक रूप लेता है तो खनन क्षेत्र में कई बदलाव संभव हैं। खनिज खोजने में लगने वाला समय कम हो सकता है। अनावश्यक ड्रिलिंग और खुदाई घट सकती है। खनिज भंडार का बेहतर आकलन किया जा सकता है। उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर खनन की योजना ज्यादा सटीक बनाई जा सकती है। तकनीक के इस्तेमाल से खनन की दक्षता बढ़ाई जा सकती है। हालांकि किसी शोध तकनीक की वास्तविक उपयोगिता उसके प्रयोगशाला स्तर से आगे मैदानी परीक्षण और बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के बाद ही तय होती है।
भिलाई की पहचान देश के बड़े इस्पात केंद्र के रूप में बनी है। लेकिन आईआईटी भिलाई जैसी संस्थाएं शहर की तकनीकी पहचान को एक नया विस्तार दे रही हैं। एक तरफ स्मार्ट माइनिंग, दूसरी तरफ ग्रीन हाइड्रोजन और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में शोध- ये संकेत देते हैं कि भिलाई का तकनीकी भविष्य सिर्फ इस्पात उत्पादन तक सीमित नहीं रहने वाला।
भिलाई की कहानी कभी इस्पात से शुरू हुई थी। अब तकनीक उस कहानी में एक नया अध्याय जोड़ रही है। शायद आने वाले समय की सबसे महत्वपूर्ण खदान वह नहीं होगी, जहां सबसे ज्यादा खुदाई हो; बल्कि वह होगी, जहां तकनीक पहले ही बता दे कि खुदाई करनी कहां है।