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Remote Control Economy : बेंगलुरु-गुरुग्राम से संचालन, छत्तीसगढ़ में न दफ्तर, न अफसर; विवाद या ठगी पर नहीं मिलता जिम्मेदार

Remote Control Economy : आपको कहीं जाना हो तो आप मोबाइल पर कुछ क्लिक करते हैं, कुछ ही मिनट में कैब आपके ठिकाने पर पहुंच जाता है। ऐसा ही आपके खाने, पहनने से लेकर बहुत सारे मामलों में आपको कुछ क्लिक पर सेवाएं मिल जाती हैं। इस नई डेवलेप हो चुकी व्यवस्था में छत्तीसगढ़ में भी 50 हजार कामगार और लाखों उपभोक्ता ऑटोमेटेड बॉट्स के हवाले हैं, लेकिन किसी तरह का विवाद खड़ा हो जाए तो उसके निपटाने के लिए लोकल स्तर पर कोई व्यवस्था नहीं है। इस बारे में गोविंद ठाकरे की इन्वेस्टिगेटिव स्टोरी पढ़िए।
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Updated: 27 Oct 2026, 1:48 PM IST
GIG Workers
50 हजार कामगार और लाखों उपभोक्ता ऑटोमेटेड बॉट्स के हवाले (Photo: ChatGpt)

Remote Control Economy : मोबाइल फोन पर एक क्लिक, 10 मिनट में घर के दरवाजे पर राशन, 20 मिनट में खाना और 5 मिनट में कैब हाजिर। त्योहारी सीजन में शहरी जीवनशैली का यह बदला हुआ चेहरा भले ही विकास और सहूलियत का अहसास कराता हो, लेकिन इस आभासी चमक के पीछे छत्तीसगढ़ में एक विशाल ‘रिमोट कंट्रोल इकोनॉमी’ खड़ी हो चुकी है।

नीति आयोग की रिपोर्ट और ई-श्रम पोर्टल के डेटाबेस के अनुसार, छत्तीसगढ़ के प्रमुख शहरों रायपुर, दुर्ग-भिलाई, बिलासपुर, कोरबा और रायगढ़ में फूड डिलीवरी, कैब-ऑटो एग्रीगेटर, क्विक-कॉमर्स और लॉजिस्टिक्स का कुल वार्षिक सकल कारोबार (जीएमवी) लगभग 1,500 करोड़ रुपए के स्तर पर पहुंच रहा है। अकेले संगठित ऑनलाइन फूड डिलीवरी का कारोबार 500 से 580 करोड़ रुपए तक पहुंच चुका है।

चौंकाने वाला पहलू यह है कि सैकड़ों करोड़ रुपए का कारोबार चलाने वाली कंपनियों का छत्तीसगढ़ में न तो पूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण वाला कार्यालय है और न ही उपभोक्ताओं व कर्मचारियों के लिए कोई अधिकृत जनसुनवाई केंद्र। पूरा सिस्टम बेंगलुरु, गुरुग्राम और मुंबई के केंद्रीकृत सर्वर तथा ‘ऑटोमेटेड चैटबॉट्स’ के रिमोट कंट्रोल से संचालित हो रहा है।

सत्यापन के नाम पर डिजिटल खानापूर्ति, ‘आईडी रेंटिंग’ का खतरा

प्रदेश के शहरों में 48,000 से 55,000 युवा डिलीवरी राइडर और कैब चालक के रूप में पंजीकृत हैं। त्योहारों में जब लोग अपने घरों के दरवाजे अनजान डिलीवरी कर्मियों के लिए खोल रहे हैं, तब सुरक्षा और जवाबदेही का सवाल अहम हो जाता है।

सत्यापन की व्यवस्था पर सवाल: कंपनियां ऑन-बोर्डिंग के समय पहचान पत्र और ड्राइविंग लाइसेंस की डिजिटल कॉपी अपलोड कराती हैं। किसी भी राइडर या ड्राइवर का स्थानीय थाने से भौतिक पुलिस चरित्र सत्यापन अनिवार्य नहीं किया जा रहा।

स्क्रीन पर कोई और, दरवाजे पर कोई और: जमीनी पड़ताल में सामने आया है कि कई मामलों में पंजीकृत आईडी धारक की जगह दूसरा व्यक्ति गाड़ी चलाता या डिलीवरी करता पाया जाता है। बंद कैब में सफर करने वाली महिलाओं और घरों में अकेले रहने वाले बुजुर्गों के लिए यह व्यवस्था सुरक्षा जोखिम खड़ा करती है।

पार्सल में क्या है, किसी को खबर नहीं: इंस्टेंट डिलीवरी और पिक-एंड-ड्रॉप सेवाओं में सीलबंद बैग की जांच नहीं होती। सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह स्थिति संवेदनशील है, क्योंकि भौतिक जांच के बिना संदिग्ध सामग्री का परिवहन शहर के भीतर आसानी से संभव है।

उपभोक्ता बेबस : छिपे चार्ज, शिकायत पर रोबोटिक जवाब

त्योहारी सीजन में ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल बढ़ जाता है, लेकिन उपभोक्ता अधिकारों से जुड़े सवाल भी बने हुए हैं।

मेनू से 30 प्रतिशत तक महंगे दाम: रेस्टोरेंट के काउंटर पर 200 रुपए की सामग्री ऐप पर 260 रुपए में दर्ज होती है। इसके ऊपर पैकेजिंग चार्ज, 5 से 10 रुपए प्लेटफॉर्म फीस, डिलीवरी फीस और जीएसटी जोड़कर उपभोक्ता पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

ठंडा-बासी खाना और पार्सल में हेरफेर: पैकेट से सामग्री गायब होने या बासी खाना मिलने पर ऐप का चैटबॉट पूर्वनिर्धारित संदेश भेजकर शिकायत का जवाब देता है।

सुनवाई का अभाव: साइबर फ्रॉड, रिफंड अटकने या गलत बिलिंग की स्थिति में उपभोक्ता को स्थानीय प्रतिनिधि नहीं मिलता। साइबर सेल या उपभोक्ता आयोग तक पहुंचने की प्रक्रिया जटिल होने से आम आदमी कई बार नुकसान को अपनी ही गलती मानकर शांत बैठ जाता है।

कमाई का मायाजाल : 12 घंटे की ड्यूटी, फिर भी हाथ खाली

प्लेटफॉर्म इकोनॉमी का सबसे स्याह पहलू वे करीब 50 हजार युवा हैं, जो धूप से लेकर देर रात तक सड़कों पर दौड़ते हैं।

कमाई का वास्तविक गणित: कंपनियां 30,000 से 40,000 रुपए मासिक कमाई का विज्ञापन करती हैं। जमीनी बही-खाते के अनुसार, 12 घंटे में 20 ऑर्डर पूरे करने पर 1,000 से 1,200 रुपए की सकल आय होती है। इसमें से पेट्रोल पर 300 रुपए, वाहन की किस्त और रखरखाव पर 150 रुपए तथा मोबाइल का खर्च घटाने के बाद युवा के हाथ में रोजाना केवल 450 से 650 रुपए बचते हैं।

इंसेंटिव की अंधी दौड़: बेस पे घटाकर कंपनियों ने कमाई का बड़ा हिस्सा इंसेंटिव पर निर्भर कर दिया है। 18 ऑर्डर पूरे करने पर बोनस का लालच देकर युवाओं पर अधिक ऑर्डर पूरे करने का दबाव बनाया जाता है। इससे ट्रैफिक सिग्नल तोड़ने और जान जोखिम में डालकर तेज वाहन चलाने की आशंका बढ़ती है।

दुर्घटना पर हाथ खड़े: कंपनियों का बीमा केवल ‘एक्टिव ट्रिप’ यानी पार्सल साथ होने की अवधि तक सीमित है। डिलीवरी देकर लौटते समय सड़क हादसा होने पर कंपनियां देनदारी से इनकार कर देती हैं।

कानूनी शून्यता : राजस्थान में कानून, छत्तीसगढ़ में नीति का इंतजार

संसद द्वारा पारित सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 में गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स को सामाजिक सुरक्षा देने का प्रावधान किया गया था, लेकिन इसके नियम अब तक प्रभावी रूप से लागू नहीं हुए हैं। राजस्थान देश का पहला राज्य है, जिसने कानून बनाकर ‘प्लेटफॉर्म बेस्ड गिग वर्कर्स वेलफेयर बोर्ड’ का गठन किया और प्रत्येक ट्रांजैक्शन पर उपकर तय किया।

छत्तीसगढ़ में ई-श्रम पोर्टल पर असंगठित कामगारों के रूप में पंजीकरण हो रहा है, लेकिन राज्य में न तो कोई नियामक कानून है और न ही कंपनियों की स्थानीय जवाबदेही तय करने वाली गाइडलाइन।

'खाद्य सुरक्षा के अलग नियम नहीं'

खाद्य नियंत्रक दीपक अग्रवाल ने पत्रिका से बातचीत में कहा , 'प्रदेश में ऑनलाइन फूड डिलीवरी के लिए खाद्य सुरक्षा से जुड़े अलग विशेष नियम नहीं हैं। हालांकि, खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम के तहत खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता में कमी पाए जाने पर उपभोक्ता खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में शिकायत कर सकते हैं।'

दीपक अग्रवाल, आईएएस

'गिग वर्कर्स को कर्मचारी का दर्जा मिले'

ऑल इंडिया गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन के अध्यक्ष संजय गाबा ने पत्रिका से कहा, “गिग वर्कर्स को कर्मचारी का दर्जा दिया जाना हमारी प्रमुख मांग है। देश में 1 करोड़ से अधिक गिग वर्कर्स हैं और 10 हजार से अधिक छोटी-बड़ी ऑनलाइन फूड व प्रोडक्ट डिलीवरी कंपनियां काम कर रही हैं। कंपनियां जब चाहें, तब गिग वर्कर्स को काम से हटा देती हैं। इन्हें नौकरी की सुरक्षा के साथ ही राज्य सरकारों द्वारा निर्धारित न्यूनतम वेतन का लाभ भी मिलना चाहिए। खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता का जिम्मा गिग वर्कर्स के बजाय कंपनियों पर होनी चाहिए।”

संजय गाबा, अध्यक्ष, ऑल इंडिया गिग एंड प्लेटफॉर्म वर्कर्स यूनियन

'जल्द लागू होगी एग्रीगेटर्स पॉलिसी'

छत्तीसगढ़ परिवहन विभाग के सचिव एस. प्रकाश ने पत्रिका से बताया, “राज्य में इस समय एग्रीगेटर्स पॉलिसी लागू नहीं है। राज्य सरकार से अनुमति मिलते ही इसे जल्द लागू किया जाएगा। इसके लिए विभागीय स्तर पर तैयारी चल रही है। पॉलिसी अनिवार्य होने पर राज्य और केंद्रीय एग्रीगेटर्स पॉलिसी के तहत नियमानुसार अनुमति लेना जरूरी होगा। निजी वाहनों का व्यावसायिक उपयोग करने के लिए अलग से पंजीयन कराना अनिवार्य है। इसकी जांच के लिए राज्य पुलिस अभियान चलाकर कार्रवाई करती है।”

एस. प्रकाश, सचिव, परिवहन विभाग
Updated on:
27 Oct 2026, 1:48 PM IST
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