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2030 से पहले थम सकता है भारत में CO2 उत्सर्जन! चौंकाने वाले संकेत

India CO2 emission: 2025 में भारत का CO2 उत्सर्जन केवल 0.7% बढ़ा, पिछले 20 साल में रिकॉर्ड कम रहा, पावर सेक्टर में -3.8% की गिरावट और रिकॉर्ड स्वच्छ ऊर्जा विस्तार से क्या 2030 से पहले ही आएगा उत्सर्जन का पीक? राज्यों का हाल सुनाती, सरकार की नीतियां बताती, आम आदमी पर असर दिखाती खास रिपोर्ट...

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Apr 28, 2026
Renewable Energy Growth India(creative AI)

India CO2 emission: क्या भारत पहले से ही अपने कार्बन उत्सर्जन के पीक पर पहुंच रहा है? हाल के आंकड़े तो यहीं संकेत दे रहे हैं। दरअसल 2026 की IEA की रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2025 में कार्बनडाय ऑक्साइड की मात्रा के उत्सर्जन में पिछले दो दशकों के मुकाबले सबसे धीमी वृद्धि दर्ज की गई है। आमतौर पर तेज विकास के साथ ही उत्सर्जन भी तेजी से बढ़ता है, लेकिन इस बार ट्रेंड अलग ही रहा है।

एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसके पीछे दो बड़े कारण हैं, बिजली की मांग में अपेक्षित वृद्धि न होना और स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों का रिकॉर्ड विस्तार होना। भारत में सौर और पवन ऊर्जा की तेज रफ्तार ने कोयले पर निर्भरता को कुछ हद तक कम करने में मदद की है। हालांकि इस गिरावट की तस्वीर अभी पूरी तरह से साफ नहीं है। अभी समझना ये होगा कि यह बदलाव का कारण स्थायी कारणों का परिणा है या फिर मौसम का? यदि आने वाले सालों में भी यही ट्रेंड बना रहा, तो भारत अपने निर्धारित लक्ष्य 2030 से पहले ही कार्बन उत्सर्जन के पीक पर पहुंच सकता है। लेकिन अभी कोयले की भारी निर्भरता देश के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। patrika.com पर पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…

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क्या कहते हैं ताजा आंकड़े

ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विश्लेषकों का कहना है वर्ष 2025 में भारत में CO₂ की वृद्धि दर बेहद धीमी रही है, जो पिछले 20 सालों में सबसे कम है। इस बार ये ट्रेंड कुछ अलग नजर आ रहा है।

CO2 emission trend in India(graphic AI)

क्या भारत पीक के करीब पहुंच रहा है

कार्बन उत्सर्जन पीक का अर्थ होता है, वह बिंदु, जहां किसी देश का कार्बन उत्सर्जन अपने उच्चतम स्तर पर पहुंचकर उसके बाद गिरावट शुरू कर देता है। भारत ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर साफ संकेत दिया है कि वह 2030 तक अपने उत्सर्जन को नियंत्रित करने की दिशा में काम करेगा। लेकिन इस साल का ट्रेंड देखा जाए, और भविष्य में भी यही ट्रेंड बना रहा तो भारत 2030 से पहले ही अपने लक्ष्य को प्राप्त कर लेगा।

तेजी से बढ़ती रिन्यूएबल एनर्जी

इस बदलाव की बड़ी वजह भारत में स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार माना जा रहा है। सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में भारत ने पिछले कुछ वर्षों में भारी निवेश बढ़ाया है। इसका सीधा असर यह हुआ है कि कोयले पर निर्भरता अब यहां धीरे-धीरे कम होने लगी है। बिजली उत्पादन में भी अब स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि कार्बन के कुल उत्सर्जन पर दबाव बना है।

मौसम का भी असर

पर्यावरणविद सुभाष सी पांडेय कहते हैं कि इस पूरी कहानी में एक अहम ट्विस्ट भी है, जिसे इग्नोर नहीं किया जा सकता। 2025 में अपेक्षाकृत कम गर्मी और ज्यादा वर्षा के कारण बिजली की मांग में उतनी तेजी नहीं आई, जितनी आमतौर पर देखी जाती है। खासतौर पर कूलिंग की जरूरत कम होने से ऊर्जा की खपत घटी है। उनका कहना है कि, संभव है कि उत्सर्जन में आई यह धीमी तकि आंशिक रूप से मौसम की ही मेहरबानी रहा हो, न केवल नीतिगत सफलता।

अब भी कोयले पर ही टिकी है व्यवस्था

भले ही भारत में स्वच्छ ऊर्जा का विस्तार हो रहा हो, लेकिन देश में ऊर्जा व्यवस्था अब भी बड़े पैमाने पर कोयले पर ही निर्भर है। देश की बिजली जरूरतों का बड़ा हिस्सा थर्मल पावर प्लांट्स से ही पूरा होता है। ऐसे में अगर आर्थिक गतिविधियां तेज होती हैं और अचानक बिजली की मांग बढ़ती है, तो कार्बन उत्सर्जन में फिर तेजी आ सकती है। यानी पीक के करीब पहुंचने का संकेत जरूर है, लेकिन वहां टिके रहना फिर भी सबसे बड़ी चुनौती होगी।

जमीनी हकीकत जानने देखें राज्यों में क्या है ट्रेंड

मध्य प्रदेश पर नजर डालें तो, प्रदेश ने रिन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में सांची को देश का पहला सोलर सिटी बनाकर शानदार और मजबूत पहल की थी। इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य था शहर की ज्यादातर ऊर्जा जरूरतें सौर ऊर्जा से पूरी हों। रीवा और ओंकारेश्वर की फ्लोटिंग सोलर एनर्जी जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स से एमपी को पहचान मिली है। हालांकि वर्षों बाद भी राज्य की ऊर्जा व्यवस्था में कोयले की भूमिका अब भी महत्वपूर्ण और मजबूत बनी हुई है। यहां बिजली उत्पादन का एक बड़ा हिस्सा कोयला आधारित संयंत्रों से ही आता है। इससे साफ है कि शुरुआती मजबूत पहल के बाद काम आगे बढ़ा, लेकिन रफ्तार उतनी तेज नहीं रही।

India Renewable energy growth (photo: AI)

इन राज्यों में क्या स्थिति, कौन है नंबर वन

मध्यप्रदेश के अलावा राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात, कर्नाटक जैसे राज्य रीन्यूएबल एनर्जी के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। राजस्थान सौर ऊर्जा में अग्रणी है, जबकि तमिलनाडु पवन ऊर्जा का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। गुजरात और कर्नाटक में सोलर विंड हाईब्रिड मॉडल ऊर्जा संक्रमण को गति दे रहे हैं।

  • तेलंगाना में सौर ऊर्जा तेजी से पारम्परिक स्रोतों की जगह ले रही है।
  • महाराष्ट्र में बढ़ती बिजली की मांग के बीच रीन्यूएबल प्रोजेक्ट्स का विस्तार हो रहा है। यहां सोलर और विंड दोनों में ग्रोथ हो रही है। शहरी मांग के कारण इस क्षेत्र में तेजी आई है।
  • कर्नाटक में बड़े सोलार पार्क्स (मेगा प्रोजेक्ट्स) ने स्वच्छ ऊर्जा की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ाई है। यह ग्रीन एनर्जी का हब बन चुका है। यहां भी सोलर और विंड दोनों एनर्जी दोनों की ग्रोथ तेज है।
  • गुजरात में सोलर और विंड की मिक्स ग्रोथ हो रही है। हाईब्रिड प्रोजेक्टस ऊर्जा संक्रमण को नई दिशा दे रहे हैं।-तमिलनाडु विंड एनर्जी में भारत का सबसे बड़ा राज्य है, जहां पवन ऊर्जा तेजी से ग्रोथ कर रही है। मुप्पन्डल विंड फार्म सबसे ज्यादा मशहूर है। इसका परिणाम यह ह कि तमिलनाडु में पवन ऊर्जा ने कोयले पर निर्भरता को करने में बड़ी और अहम भूमिका निभाई है।
  • राजस्थान का भड़ला सोलर पार्क दुनिया के सबसे बड़े सोलर पार्क में शामिल है। देश में सबसे ज्यादा सोलर क्षमता वाला यह राज्य सौर ऊर्जा में देश की अगुवाई कर रहा है। इस प्रोजेक्ट के लिए थार के पूरे रेगिस्तान का इस्तेमाल किया जा रहा है।

भारत सरकार की स्वच्छ ऊर्जा नीतियां

  • भारत सरकार ने स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण और अहम कदम उठाए हैं। 2030 तक 500 गीगावॉट नान-फॉसिल ईंधन क्षमता प्राप्त करने का लक्ष्य रखा गया। इसमें सौर ऊर्जा 280 गीगावॉट और पवन ऊर्जा 140 गीगावॉट शामिल है। लेकिन 2025 में ही देश ने रिकॉर्ड 44-48 गीगावॉट नवीनीकरणीय ऊर्जा क्षमता जोड़ी है। इसमें सोलर और विंड एनर्जी की बड़ी भूमिका रही है।
  • सरकार की इंटरस्टेट ट्रांसमिशन सिस्टम चार्ज में छूट, ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर, रिन्यूएबल पर्चेज ऑब्लिगेशन (RPO) और सोलर पार्क स्कीम जैसी नीतियों ने इस तेजी को बढ़ावा दिया है।
  • इसका परिणाम यह रहा कि 2025 में बिजली उत्पादन क्षमता में नॉन-फॉसिल स्रोतों की हिस्सेदारी 50 फीसदी के करीब पहुंच गई है। जिसने 2030 का लक्ष्य पांच साल पहले ही हासिल कर लिया।
  • कुल मिलाकर कहना होगा कि ये सरकारी नीतियां कोयले पर निर्भरता कम करने और ऊर्जा सुरक्षा बढ़ाने में मददगार साबित हो रही हैं। लेकिन अगली चुनौती अभी भी बाकी है औऱ वह है ट्रांसमिशन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी और राज्यों के स्तर पर इसकी अलग-अलग रफ्तार।

आम आदमी पर दिखेगा ये असर

  • इस स्वच्छ ऊर्जा संक्रमण का असर आम आदमी की जिंदगी पर भी साफ और सीधे तौर पर नजर आएगा। लंबे समय से महंगी होती बिजली कीमतें स्थिर या कम भी हो सकती हैं। क्योंकि सौर और पवन ऊर्जा का उत्पादन सस्ता पड़ता है।
  • शहरों में होने वाला वायु प्रदुषण का खतरनाक स्तर भी घटेगा। इसका फायदा आम आदमी की सेहत पर पड़ेगा, श्वास संबंधी, एलर्जी संबंधी बीमारियां कम होंगी। एक्सपर्ट्स को कहना है कि ऐसा होने पर हर साल होने वाली लाखों मौतों में भी कमी आएगी।
  • रोजगार के नए अवसर बढ़ेंगे। रिन्यूएबल सेक्टर में फॉसिल फ्यूल से 4 गुना ज्यादा नौकरियां पैदा हो रही हैं। सोलर इंस्टॉलेशन, मेंटेनेंस, मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन हाइड्रोजन जैसे क्षेत्रों में युवाओं को नए अवसर मिलेंगे।
  • हालांकि इसके बाद कोयला खनन और थर्मल पावर प्लांट वाले इलाकों में कुछ नौकरियां प्रभावित हो सकती हैं। इसलिए स्किल ट्रेनिंग और जस्ट ट्रांजिशन की जरूरत है।

कहना होगा कि यदि ऊर्जा संक्रमण सही तरीके से हुआ, तो आम आदमी को केवल स्वच्छ हवा ही नहीं बल्कि, सस्ती बिजली और बेहतर स्वास्थ्य मिलेगा।

2025 के आंकड़े साफ तौर पर बताते हैं कि भारत स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में तेज कदम बढ़ा रहा है। कार्बन उत्सर्जन की धीमी वृद्धि दर और रिन्यूएबल का रिकॉर्ड विस्तार संकेत दे रहा है कि यही रफ्तार रही तो तय समय से पहले भारत कार्बन डायऑक्साइड का पीक हासिल कर लेगा। लेकिन भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती उसके स्थायित्व की है। जब तक कोयले पर निर्भरता बनी रहेगी, ट्रांसमिशन और स्टोरेज जैसी बुनियादी सुविधाएं मजबूत नहीं होंगी, तब तक यह ट्रेंड अस्थायी रहने की आशंका भी कम नहीं है। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के साथ ही आम जन भी मिलकर और लगातार प्रयास बनाए रखें, तो भारत अपने लक्ष्य की प्रतिबद्धताओं को जरूर पूरा करेगा। वहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए स्वच्छ और सस्ती ऊर्जा का बेहतर भविष्य भी सुनिश्चित कर ही लेगा।

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Published on:
28 Apr 2026 08:00 am
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