भारत में कोयला आधारित बिजली संयंत्रों के चलते CO₂-SO₂ का उत्सर्जन बहुत ज्यादा होता है। सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन के मामले हम दुनिया में पहले, जबकि कार्बन डाइऑक्साइड के मामले में तीसरे नंबर पर आते हैं। आइए जानते हैं कि नई रिपोर्ट में क्या कहा गया है।
Air Pollution Deaths India: भारत में कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)और सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) के उत्सर्जन से सालाना लाखों लोगों की मौत हो जाती है। द लांसेट (The Lancet) और ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज (Global Burden of Disease) के ताजे अध्ययन में यह बात सामने आई है कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) से हर साल 15-20 लाख लोगों की मौत हो जाती है।
वहीं नेचर जर्नल में प्रकाशित एक दूसरे अध्ययन में कहा गया है कि कोयला आधारित बिजली संयंत्रों (Coal-Fired Power Plants) से निकलने वाले सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) उत्सर्जन से देश में हर साल करीब 1.24 लाख लोगों की मौत हो जाती है। कोयला आधारित संयंत्रों से सिर्फ सल्फर डाइऑक्साइड ही नहीं, कार्बन डाइऑक्साइड का भी उत्सर्जन होता है। आइए समझते हैं कि कार्बन डाइऑक्साइड और सल्फर डाइऑक्साइड हमारे लिए कितना घातक है।
आईआईटी दिल्ली के शोधकर्ताओं का कहना है कि सल्फर डाइऑक्साइड के उत्सर्जन को नियंत्रित कर लिया जाए तो हर साल करीब 1.24 लाख लोगों को सालाना बचाया जा सकता है। दरअसल सल्फर डाइऑक्साइड केवल वातावरण में सल्फर डाइऑक्साइड के स्तर को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि द्वितीयक सूक्ष्म कण पदार्थ यानी PM2.5 के निर्माण में भी योगदान देता है। भारत दुनिया में सबसे बड़ा SO₂ उत्सर्जक देश है। SO₂ उत्सर्जन के मामले में चीन, रूस, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त राज्य अमेरिका क्रमश: दूसरे, तीसरे, चौथे और पांचवें पायदान पर हैं।
कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) के उत्सर्जन के मामले में भारत, दुनिया में तीसरे नंबर पर है। इस मामले में दुनिया में चीन सबसे ज्यादा CO₂ उत्सर्जन करने वाला देश है। चीन अकेले दुनिया का 30% कार्बन उत्सर्जन करता है। दूसरे नंबर पर संयुक्त राज्य अमेरिका है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) और ग्लोबल कार्बन प्रोजेक्ट के अनुसार, भारत से हर साल लगभग 2.7 से 3 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड का उत्सर्जन होता है। इसका सबसे बड़ा स्रोत कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र हैं। देश में बिजली जरूरतों का लगभग 70% हिस्सा थर्मल पावर प्लांट से ही पूरा होता है। इसके अलावा परिवहन, इस्पात, सीमेंट, रिफाइनरी और निर्माण क्षेत्र भी बड़े उत्सर्जन के स्रोत हैं।
कार्बन डाइऑक्साइड स्वयं सीधे जहरीली गैस नहीं है, लेकिन यह ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा कारण मानी जाती है। इसके उत्सर्जन के चलते धरती, समुद्र और वायुमंडल का तापमान बढ़ रहा है। कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन के चलते लगातार धरती का तापमान बढ़ रहा है। हीटवेव के दिनों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इसके चलते ग्लोबल वार्मिंग की समस्या बढ़ रही है, जो सूखा, बाढ़, जंगल की आग और वायु प्रदूषण जैसी समस्याएं पैदा कर रही है। नतीजे के तौर पर इनके चलते हर साल लाखों लोगों को जान की कीमत चुकानी पड़ती है।
कार्बन डाइऑक्साइड गैस का स्वास्थ्य पर बेहद नकारात्मक प्रभाव दर्ज किया जा रहा है। दरअसल जीवाश्म ईंधन जलाने से निकलने वाले अन्य प्रदूषक जीवन को खतरे में डालते हैं। कार्बन डाइऑक्साइड सीधे मौत का कारण नहीं बनती, लेकिन इसके साथ निकलने वाले सूक्ष्म कण (PM2.5), सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और ओज़ोन जैसे प्रदूषक फेफड़ों, हृदय और मस्तिष्क पर गंभीर असर डालते हैं।
वर्ल्ड वेदर एट्रिब्यूशन के अनुसार, कार्बन डाइऑक्साइड के उत्सर्जन ने हीटवेव के दिनों की संख्या और उनकी तीव्रता दोनों ही बढ़ाई हैं। भारत में वर्ष 2023 और 2024 में हीटवेव ने चिंताजनक स्थिति पैदा कर दी। वर्ष 2024 में कई राज्यों में तापमान 48 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया, जिसके चलते सैकड़ों लोगों की मौत हुई। हजारों लोग हीट स्ट्रोक से प्रभावित हुए। वर्ष 2026 में अल नीनो की परिस्थितियां तैयार होती दिख रही हैं। यह बताया जा रहा है कि इस साल हीटवेव से बुरा हाल होने वाला है। मानसून भी सामान्य से 8 फीसदी कम रहने वाला है।
जलवायु परिवर्तन के चलते यह बताया जा रहा है कि वर्ष 2026 में अल नीनो के चलते ज्यादा गर्मी, मानसून का असमान वितरण, बाढ़ की तीव्रता बढ़ सकती है और जिसके चलते देश में फसल के उत्पादन में 15 फीसदी तक की गिरावट दर्ज की जा सकती है। यानी कार्बन का बढ़ता उत्सर्जन देश और दुनिया में कृषि और खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित कर रहा है। जाहिर सी बात है कि इससे देश में कुपोषण और ग्रामीण इलाके में गरीबी बढ़ रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2030 से लेकर अगले 20 वर्षों के दौरान दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन के चलते सालाना अतिरिक्त 2.5 लाख मौतें हो सकती हैं। यह भी कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से मौतों में भारत सबसे अधिक प्रभावित देशों में शामिल होगा।
पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂)और सल्फर डाइऑक्साइड (SO₂) के चलते पैदा हो रहे स्वास्थ्य संकट और जलवायु परिवर्तन से बचना हो तो कोयले से पैदा होने वाली ऊर्जा पर निर्भरता कम करनी होगी। बिजली के लिए सौर और पवन ऊर्जा को बढ़ावा देना होगा। इसके साथ ही इलेक्ट्रिक वाहन, सार्वजनिक परिवहन और हरित उद्योगों को बढ़ावा देना आवश्यक है। भारत ने 2070 तक जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है।
थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाला सल्फर डाइऑक्साइड सिर्फ पर्यावरण में SO₂ के स्तर को ही नहीं बढ़ाता, बल्कि प्रदूषण बढ़ाने वाले कण PM2.5 के निर्माण में भी योगदान देता है। सल्फर डाइऑक्साइड वातावरण में प्रतिक्रिया करके सल्फेट, नाइट्रेट और अमोनियम जैसे द्वितीयक अकार्बनिक एरोसोल बनाता है, जो श्वांस, हृदय संबंधी बीमारियों में अपना योगदान देते हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि यदि इन उत्सर्जनों में कमी लाई जाए, तो विभिन्न राज्यों में वार्षिक PM2.5 संपर्क स्तर 0.3 से 12 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर तक और वातावरणीय सल्फर डाइऑक्साइड स्तर 0.1 से 13.6 पार्ट्स प्रति बिलियन तक कम हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं ने वायु प्रदूषण मॉडल और थर्मल प्लांट्स से SO₂ उत्सर्जन से जुड़े उपग्रह आंकड़ों का उपयोग किया। इसके साथ ही, उन्होंने ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज’ फ्रेमवर्क का उपयोग किया, जो स्थान, समय, आयु और लिंग के आधार पर स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को मापता है। इसके जरिए वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों जैसे हृदय और श्वसन रोग से होने वाली संभावित रोकी जा सकने वाली मौतों का अनुमान लगाया गया। अध्ययन के अनुसार, यदि थर्मल पावर प्लांट्स से सल्फर डाइऑक्साइड के उत्सर्जन पर पूरी तरह नियंत्रण पा लिया जाए, तो हर साल 14,777 हृदय संबंधी और 8,476 श्वसन संबंधी मौतों को रोका जा सकता है। इसके अलावा कुल मृत्यु दर में भी बड़ी कमी आएगी।
यह अध्ययन ऐसे समय में सामने आया है, जब कोयला आधारित बिजली संयंत्रों में फ्ल्यू गैस डीसल्फराइजेशन (FGD) सिस्टम लगाने को लेकर बहस जारी है। एफजीडी एक ऐसी तकनीक है, जो जीवाश्म ईंधन आधारित बिजली संयंत्रों और औद्योगिक बॉयलरों से निकलने वाली गैसों से सल्फर डाइऑक्साइड को हटाती है, जिससे अम्लीय वर्षा और वायु प्रदूषण कम होता है। इस तकनीक के महंगा होने के चलते इसपर कई तरह के तर्क दिए जा रहे हैं। हालांकि लोगों की जान बचाने, पर्यावरण की स्वच्छता से मिलने वाला लाभ एफजीडी तकनीक पर होने वाले खर्चों से अधिक होगा।
7 दिसंबर 2015 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने CFPPs के लिए अनिवार्य उत्सर्जन मानक लागू किए थे, जिनका उद्देश्य सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, पारा और कण पदार्थ के स्तर को काफी कम करना था। हालांकि, 11 जुलाई 2025 को केंद्र सरकार ने 2015 के इन मानकों में ढील देते हुए लगभग 79% कोयला आधारित इकाइयों को सल्फर डाइऑक्साइड नियंत्रण के लिए एफजीडी सिस्टम लगाने से छूट दे दी।
आईआईटी दिल्ली के नए अध्ययन के अनुसार, 2005 से 2021 के बीच दुनिया भर में थर्मल पावर प्लांट से सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन घटा, लेकिन भारत में इसका उल्टा रुझान देखने को मिला। उपग्रह आंकड़ों के आधार पर अनुमान लगाया गया कि भारत में सल्फर डाइऑक्साइड उत्सर्जन 2005 में 2.36 हजार किलो टन प्रति वर्ष से बढ़कर 2021 में 5.05 हजार किलो टन प्रति वर्ष हो गया, और 2023 तक इसमें लगभग 30% और वृद्धि हुई। शोधकर्ताओं का मानना है कि यदि मौजूदा नियमों को पूरी तरह लागू किया जाए, तो 2030 तक कोयला आधारित बिजली संयंत्रों से जुड़े सल्फर डाइऑक्साइड और पीएम 2.5 उत्सर्जन में 80% से अधिक कमी लाई जा सकती है।