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Eco Friendly Homes: अमेरिका-जापान भी रह गए पीछे, इको-फ्रेंडली घर बनाने में भारत नंबर 1, दुनिया भर में बदल रहे तरीके

Eco-friendly homes: दुनिया भर में घर बनाने के तरीकों में बड़ा बदलाव आ रहा है। भारत के 50 प्रतिशत लोग पर्यावरण के अनुकूल घरों को अपनी पहली पसंद मान रहे हैं। चीन और अमेरिका जैसे देशों को पीछे छोड़कर भारतीय इस मामले में सबसे आगे निकल गए हैं। जानिए क्यों बढ़ रहा है ग्रीन होम्स का क्रेज।

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Apr 26, 2026
इको-फ्रेंडली घर बनाने में भारत नंबर 1 (AI)

Eco friendly homes: दुनिया इस समय जलवायु परिवर्तन (Climate Change) से जूझ रही है। ऐसे में घर बनाने और रहने को लेकर भारतीयों की सोच तेजी से बदल रही है। दुनिया के कई विकसित देश अब भी पुरानी सोच और पुराने तरीकों पर टिके हुए हैं। आधे से ज्यादा भारतीय साफ कह चुके हैं कि उनके लिए ईको- फ्रेंडली यानी पर्यावरण के अनुकूल घर पहली पसंद हैं। आंकड़े बताते हैं कि भारत सिर्फ आधुनिकता की ओर नहीं बढ़ रहा, बल्कि प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर आगे चलना चाहता है। इस मामले में चीन, ब्रिटेन और अमेरिका जैसे ताकतवर देश भी भारत से काफी पीछे नजर आ रहे हैं।

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ईको-फ्रेंडली घर बनाने में भारत नंबर 1

'स्टेटिस्टा' (Statista) की रिपोर्ट के अनुसार भारत की तुलना पश्चिमी देशों से की जाती है तो अक्सर माना जाता है कि अमेरिका, जर्मनी और जापान जैसे विकसित देश तकनीक और जागरूकता के मामले में आगे हैं। लेकिन पर्यावरण के अनुकूल घर बनाने के मामले में पूरी तस्वीर ही बदलती नजर आई। भारत में 50% लोग ग्रीन होम्स यानी ईको-फ्रेंडली घरों को अपनी पहली पसंद मान रहे हैं। वहीं दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अमेरिका सिर्फ 26% पर सिमट गया। हर चार में से केवल एक अमेरिकी मानता है कि उसका घर पर्यावरण के अनुकूल होना चाहिए।

ग्रीन लिविंग का बड़ा केंद्र भारत !

जर्मनी में सिर्फ 23% लोग ही ईको-फ्रेंडली घर बनवाना पंसद करते हैं । सफाई और तकनीक के लिए मशहूर जापान में केवल 12% लोग ही अपने घर को पर्यावरण के अनुकूल बनाने के पक्ष में हैं। भारत के पड़ोसी देश चीन में भी यह आंकड़ा 36% ही रहा। इन आंकड़ों से साफ है कि भारत सिर्फ दूसरे देशों की नकल नहीं कर रही, बल्कि पर्यावरण बचाने के मामले में दुनिया को नई राह दिखा रहा है। जहां कई बड़े देश अब भी क्लाइमेट चेंज पर सिर्फ बात कर रहे हैं, वहीं भारत के लोग अपने घरों को प्रकृति के साथ जोड़ने की दिशा में कदम बढ़ा चुके हैं। यह बदलाव आने वाले समय में ग्रीन लिविंग का बड़ा केंद्र भारत बन सकता है।

ईको-फ्रेंडली घर बनाने की गणना

देशप्रतिशत (%) लोग जो ईको-फ्रेंडली घर चाहते हैं
भारत50%
चीन36%
यूनाइटेड किंगडम31%
कनाडा29%
फ्रांस26%
अमेरिका26%
जर्मनी23%
जापान12%

पुरानी समझ और नई तकनीक का मेल

भारत की यह सफलता अचानक नहीं आई है। भारत में पुराने घर मिट्टी की दीवारें, खुला आंगन और छतों को ठंडा रखने के तरीके। पहले के लोग बिना बड़ी मशीनों के भी मौसम के हिसाब से घर बनाना जानते थे। वहीं नई तकनीक उसी पुरानी समझ को नया रूप दे रही है। फ्लाई ऐश ब्रिक्स, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम और ईको-फ्रेंडली पेंट का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है। भारतीय बिल्डर्स भी ग्राहकों की बदलती पसंद को समझ रहे हैं। इसी वजह से ईको-फ्रेंडली हाउसिंग प्रोजेक्ट्स पर ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, जहां हरियाली हो, प्रदूषण कम हो और कचरे का सही तरीके से प्रबंधन किया जा सके।

इको-फ्रेंडली घर होता क्या है ?

  • जिसमें छत पर सोलर पैनल लगे हों ताकि सूरज की रोशनी से बिजली बन सके।
  • बारिश के पानी को सहेजने (Rainwater Harvesting) का सिस्टम हो।
  • घर का डिजाइन ऐसा हो कि दिन में लाइट न जलानी पड़े और हवा के लिए बड़े- बड़े रोशनदान या खिड़कियां हों।
  • इसे बनाने में ऐसे पेंट, ईंट और सीमेंट का इस्तेमाल हो जो प्रकृति को नुकसान न पहुंचाए और घर को अंदर से ठंडा रखे।

बिजली और पानी के भारी बिल से राहत

भारतीय लोग बचत करने में हमेशा आगे रहते हैं। आजकल गर्मियों में AC और सर्दियों में हीटर चलाने से बिजली का बिल हजारों रुपये तक पहुंच जाता है। लोगों को समझ आने लगा है कि अगर घर बनाते समय ही सोलर पैनल लगवा लिए जाएं और हवा आने-जाने का अच्छा इंतजाम हो, तो लंबे समय तक बिजली के बड़े बिल से राहत मिल सकती है। यह भविष्य के लिए समझदारी भरा निवेश है।

सरकारी योजनाएं बन रही हैं वरदान

इस बड़े बदलाव में सरकार की भी अहम भूमिका है। हाल ही में शुरू हुई पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना जैसी योजनाओं ने लोगों की सोच बदल दी है। अब घरों की छत पर सोलर पैनल लगाने के लिए सरकार सब्सिडी दे रही है, जिससे लोगों का खर्च काफी कम हो रहा है। इसके अलावा कई राज्यों में रेनवॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम लगाने पर प्रॉपर्टी टैक्स में छूट भी मिलती है। इन फायदों को देखते हुए लोग तेजी से अपने घरों को ग्रीन और ईको-फ्रेंडली बना रहे हैं।

सेहत को लेकर बढ़ती जागरूकता

कोरोना महामारी के बाद लोगों में सेहत को लेकर जागरूकता तेजी से बढ़ी है। अब लोग समझने लगे हैं कि बंद घरों में हवा का सही बहाव नहीं होने से कई तरह की परेशानियां बढ़ सकती हैं। ईको-फ्रेंडली घरों में घर के अंदर की हवा ज्यादा साफ रहती है। केमिकल फ्री पेंट और प्राकृतिक रोशनी की वजह से वहां रहने वालों की शारीरिक और मानसिक सेहत पर अच्छा असर पड़ता है।

पश्चिमी देश क्यों पीछे रह गए?

रिपोर्ट के अनुसार जो देश पर्यावरण की सबसे ज्यादा बात करते हैं, वे इस लिस्ट में पीछे क्यों हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि अमेरिका और यूरोप में ज्यादातर घर और सिस्टम काफी पुराने हैं। उन्हें ईको-फ्रेंडली बनाने के लिए बड़े बदलाव करने पड़ते हैं, जिसमें काफी खर्च आता है। वहीं भारत अभी तेजी से विकास कर रहा है। यहां लगातार नए घर और नई सोसायटियां बन रही हैं। ऐसे में लोगों के पास शुरुआत से ही घरों को ग्रीन और बेहतर तरीके से बनाने का मौका है, और भारतीय इसका फायदा उठा रहे हैं।

बिजली-पानी का खर्चा कम

स्टेटिस्टा की रिपोर्ट में भारतीय लोग पर्यावरण को लेकर सिर्फ बातें नहीं कर रहे, बल्कि जमीन पर बदलाव भी ला रहे हैं। 50 फीसदी का यह आंकड़ा सिर्फ एक नंबर नहीं, बल्कि बदलती सोच की पहचान है। जिस तरह पहले लोग प्रकृति के साथ तालमेल बनाकर रहते थे, अब आधुनिक तकनीक के सहारे हम फिर उसी दिशा में बढ़ रहे हैं। ईको-फ्रेंडली घर सिर्फ पर्यावरण की रक्षा नहीं करते, बल्कि बिजली-पानी के खर्च को भी कम करते हैं और सेहत के लिए भी बेहतर होते हैं।

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Published on:
26 Apr 2026 10:00 am
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