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India US agriculture deal :देश के किसानों को 25 वर्षों में हुआ 111 लाख करोड़ का घाटा, भारत-अमेरिका कृषि समझौता से क्यों पैदा हो रही आशंका?

India US agriculture deal impact : भारत और अमेरिका के बीच हुए कृषि समझौते को लेकर कृषि विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा (Devinder Sharma) आशंकित हैं। उन्होंने पत्रिका से विशेष बातचीत में इस डील से जुड़े कई गंभीर पहलुओं की ओर इशारा किया। उन्होंने किसानों को पिछले 25 वर्षों में हुए 111 लाख करोड़ रुपये के घाटे और सोयाबीन उत्पादकों की बढ़ती आत्महत्याओं के मद्देनजर यह बताया कि सरकार को इस समय किन मुद्दों पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए।

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Feb 10, 2026
भारत अमेरिका कृषि समझौता

India US agriculture deal impact : भारत और अमेरिका के बीच हुए कृषि समझौते से किसको कितना फायदा या नुकसान हो रहा है?

India US agriculture deal explained :अमेरिका को इससे क्या फायदे होंगे और भारत को क्या नुकसान हो सकता है? इस सवाल से पहले कि हम मौजूदा व्यापार का विश्लेषण करें तो भारत, अमेरिका को ज़्यादा निर्यात करता है और अमेरिका, भारत को कम निर्यात करता है। दोनों के बीच लगभग आधे का अंतर है। अमेरिका को उम्मीद है कि कृषि समझौते के बाद उनके उत्पादों को भारत में ज़्यादा बाज़ार मिलेगा।

इसी उम्मीद के साथ अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक एल. रोलिंस ने और जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ट्वीट किया कि भारत का बाजार खोलने का व्यापार समझौता हो गया है। अमेरिकी कृषि सचिव ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा, 'भारत, दुनिया का सबसे बड़ा बाजार है और जब हमें यह बाज़ार मिलेगा तो अमेरिका के किसानों को बेहतर दाम मिलेंगे और इसका मतलब यह होगा कि अमेरिकी ग्रामीण अर्थव्यवस्था में धन का प्रवाह बढ़ेगा। यह उत्साह भारत के बाज़ार को लेकर अलग तरह का था।' इसका मतलब है कि वे यह देख पा रहे हैं कि आने वाले वर्षों में अमेरिका को कृषि के लिए टिकाऊ बाज़ार या व्यापार मिलेगा। कृषि सचिव ने धन के प्रवाह की बात भी की, तो इसका मतलब है कि अमेरिकी किसान और समृद्ध होंगे। उन्हें लाभ होगा।

सवाल: अमेरिकी कृषि सचिव ने कहा कि धन का प्रवाह बढ़ेगा और उनके उत्साह से यह बात समझ में आती है कि वहां के किसानों को फायदा होगा और वे अमीर होते जाएंगे?

आपने बिल्कुल ठीक कहा। अगर ऐसा नहीं होता तो वहां की कृषि सचिव इतनी खुशी क्यों जाहिर करतीं? अमेरिका को वित्तीय घाटा हो रहा था इसलिए भारत के साथ कृषि डील करके वह इस नुकसान की भरपाई करेंगे और वह अपने लिए ज्यादा आर्थिक लाभ उठाना चाहेंगे।

एक और बात यह है कि अगर हम अमेरिका सरकार और भारत के बीच जारी संयुक्त बयान को देखें, जिसे अमेरिका ने रिलीज किया है। उसमें साफ़ है कि कृषि के किन क्षेत्रों या किन उत्पादों में शुल्क शून्य कर दिए गए हैं, यानी आयात शुल्क हटा दिए गए हैं। उनका भारत में आयात करना सस्ता हो जाएगा।

उनका बाज़ार पर दबाव बढ़ेगा और अभी वे यही अल्पकालिक लाभ के रूप में देख रहे हैं। लेकिन अगर हम उस बयान को ध्यान से पढ़ें, तो यह भी लिखा है कि आगे और चीज़ें आएंगी। कृषि के अतिरिक्त उत्पाद भी उसमें शायद शामिल होंगी। अभी कृषि डील को लेकर पूरी जानकारी सामने नहीं आई है। 15 मार्च तक दोनों देशों के बीच कृषि मसौदा सामने आएगा और तब यह पता चलेगा कि भारत ने क्या-क्या खोला है? अभी अमेरिका-भारत समझौते का सिर्फ़ एक फ्रेमवर्क सामने आया है। उसी फ्रेमवर्क से अगला कदम मसौदा सामने आने पर हमें पता चलेगा कि हम कहां हैं और बातचीत किस दिशा में जा रही है?

सवाल: अमेरिका, भारत के साथ लंबे समय से कृषि डील के लिए समझौता करना चाहता था। मुझे लगता है कि पहले भी सरकार की ओर से काफ़ी दबाव था, लेकिन तब समझौता नहीं हो पाया। अब यह समझौता संभव हुआ है, तो आप इसे कैसे देखते हैं?

मेरा मानना है कि अमेरिका ने कम से कम 50 वर्षों से भारत पर अपने कृषि क्षेत्र को अमेरिकी उत्पादों के लिए खोलने का दबाव बनाने की कोशिश कर रहा है। यह भी जानना ज़रूरी है कि जब जगजीवन राम भारत के कृषि मंत्री थे, तब भी उन पर दबाव डाला गया था कि अमेरिकी कृषि के लिए रास्ता खोला जाए। हम सभी जानते हैं कि जगजीवन राम ने अमेरिका के साथ डील के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था और कहा था कि वे कभी भी हमारे देश में आपके उत्पाद नहीं आने देंगे।

यह बहुत पुरानी बात है। इसके बाद डंकल प्रस्ताव 1991 में आया था। इसके बाद खासकर 1995 विश्व व्यापार संगठन की स्थापना के बाद, अमेरिका की ओर से भारत पर बाज़ार खोलने का लगातार दबाव बनाया जा रहा है। अमेरिका में 1990 के दशक में 14 अलग-अलग कृषि उत्पाद के निर्यात संगठन होते थे। दूध, सोयाबीन आदि उत्पादों के निर्यात संगठनों का दबाव था कि भारत में न्यूनतम समर्थन मूल्य न बढ़ने दिया जाए, क्योंकि अगर किसानों की आय बढ़ेगी तो वे अमेरिकी उत्पाद क्यों खरीदेंगे?

अमेरिका का हमारे ऊपर लगातार दबाव बनाने की कोशिश करता रहा है। विश्व व्यापार संगठन इस समय रूका हुआ है लेकिन वहां यह मुद्दा उठता रहा कि भारत को अपना बाज़ार खोलना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य को रोकना ही उन्हें एक रास्ता दिखता था। भारत ने इस मुद्दे पर डब्ल्यूटीओ में अच्छी तरह से जवाब दिया और अपने हितों की रक्षा भी की।

(Photo: IANS)

सवाल: सर, 2020-21 में जो किसान आंदोलन हुआ वहां तीन नए कृषि कानूनों और न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बहुत चर्चा हुई। क्या इस आंदोलन के दौरान भी सरकार पर अमेरिका का कोई दबाव था?

देखिए, इसमें दो बातें हैं। किसान आंदोलन के समय भी अमेरिका का दबाव था, लेकिन हमें यह समझना होगा कि किसान आंदोलन अंतरराष्ट्रीय दबाव की वजह से शुरू नहीं हुआ था। यह हमारी घरेलू मजबूरी थी। हमने आज तक कृषि क्षेत्र का जो बकाया बनता था और वह हमने नहीं दिया, इस वजह से किसान आंदोलन उठ खड़ा हुआ था।

आर्थिक सहयोग और विकास संगठन (OECD) की एक रिपोर्ट 2018 में आई थी। उस रिपोर्ट में कहा गया था कि 2000-2016 के बीच में भारत के किसानों को 45 लाख करोड़ का नुकसान हुआ था। अभी जो OECD की रिपोर्ट आई है, उसमें कहा गया है कि भारत के किसानों को 2000-2025 के बीच 111 लाख करोड़ का नुकसान हुआ है। किसानों का कहना है कि उनका नुकसान बढ़ता जा रहा है और दूसरी ओर वह पैदावार बढ़ाते जा रहे हैं इसलिए उनको उनका हक मिलना चाहिए। किसानों की यह मांग कि न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी अधिकार मिले, बिल्कुल जायज़ थी।

पहले किसान तीन नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ आए थे, लेकिन बाद में न्यूनतम समर्थन मूल्य को कानूनी दर्जा देने की मांग की। अब यह राष्ट्रीय मांग बन गई। देश के हर कोने में किसान यही मांग करते हैं।

अगर किसानों को 25 वर्षों में किसानों को इतना नुकसान हुआ है, तो आगे अमेरिका से आयात बढ़ने पर क्या होगा, यह हमें अभी नहीं पता। अच्छी बात है कि पीयूष गोयल और कृषि सचिव ने भी कहा है कि हमने खाद्य सुरक्षा के प्रमुख उत्पादों को इस कृषि व्यापार से बाहर रखा है। गेहूं, धान, मक्का, सोयाबीन और दूध को कृषि डील से बाहर रखा है। यह अच्छी बात है। लेकिन फिर यह सवाल उठता है कि भारत को इतना कुछ बाहर रखना ही था तो फिर अमेरिका के साथ डील क्यों करना था? इन्हीं बातों से दबाव बनता है। मेरा मानना है कि सरकार को साफ़ और पारदर्शी संदेश देना चाहिए और यह दस्तावेज़ के माध्यम से सार्वजनिक करने चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि समझौते में क्या होने जा रहा है?

(Photo: IANS)

सवाल: अब एक और सवाल मन में आता है। देश में मोटे अनाज को बढ़ावा देने की बात हो रही है और प्रधानमंत्री भी इसका कई बार ज़िक्र करते रहे हैं। यह स्वास्थ्य से जुड़ा मसला भी है। क्या अमेरिका के साथ व्यापार समझौता से हमारे मोटे अनाज की ओर बढ़ने वाली बात को नुकसान पहुंचेगा या क्या होगा?

अभी इस समझौते में मुझे एक ही बात दिख रही है। वह यह है कि लाल ज्वार की बात हो रही है। लाल ज्वार पशु के आहार में नहीं बल्कि पोल्ट्री फ़ीड में इस्तेमाल होता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मोटा अनाज वर्ष (Millets year in india, 2023) मनाया। इसके लिए बहुत प्रचार-प्रसार हो रहा है। इसके समर्थन में बहुत हो रही है, लेकिन इन तमाम प्रयासों के बावजूद भारत के किसानों ने मोटे अनाज का रकबा नहीं बढ़ाया है। इसका मतलब साफ है कि किसान मोटे अनाज की खेती को लेकर खुश नहीं हैं। हम जितना प्रचार कर लें कि मोटा अनाज स्वास्थ्य के लिए, पर्यावरण के लिए बहुत अच्छा है, लेकिन जब तक किसानों को सही दाम नहीं मिलेगा, तब तक वे उत्पादन नहीं बढ़ाएंगे। यह एक घरेलू मुद्दा है और इस पर ज़्यादा ध्यान देने की ज़रूरत है।

(Photo: IANS)

सोयाबीन के उत्पादन में लगातार गिरावट आ रही है? क्या वजह है?

हमारे देश में पिछले तीन-चार सालों से सोयाबीन घाटे की खेती बनती जा रही है। इतना नुकसान बढ़ रहा है कि सोयाबीन के किसानों में आत्महत्याएं बढ़ रही हैं। इसका मतलब साफ है कि हमें सोयाबीन की फसल को बाहरी दख़ल से बचाना होगा। बाहर से आने वाली सोयाबीन की जगह हमें अपने घरेलू किसानों की सोयाबीन फसलों को तवज्जो देनी पड़ेगी। इन दिनों इथेनॉल की बहुत बात हो रही है। इसमें मक्के का ज्यादा प्रयोग होता है लेकिन सोया तेल के आयात की बात भी हो रही है, जिससे सोयाबीन का उत्पादन प्रभावित होगा। मुझे लगता है कि इससे सोयाबीन किसानों को चपत पड़ेगी। घरेलू आर्थिक नीतियां इस तरह बननी चाहिए कि हमारे किसान संकट से बाहर निकल सकें। यह तभी संभव है जब किसानों की फसलों को सुनिश्चित या गारंटीड दाम मिले।

Updated on:
10 Feb 2026 02:35 pm
Published on:
10 Feb 2026 01:16 pm
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