
Indian Children Fitness Report 2026: एक दौर ऐसा भी गुजरा है, जब गांवों, शहरों की गलियां और मोहल्ले शाम होते ही बच्चों के हुल्लड़ करने की आवाजों से गूंज उठते थे। कहीं खाली पड़े मैदान में क्रिकेट खेला जा रहा है, कहीं फुटबॉल। इधर मैदान में बच्चे दौड़-दौड़कर खेल रहे हैं, तो उधर साइकिल चलाने की होड़ मची है। तब हर घर में बस एक ही आवाज गूंजती थी अंधेरा होने वाला है, अब घर आ जाओ। लेकिन आज तस्वीर ठीक इससे उलटी है…। आज बच्चे घर से बाहर नहीं निकलते, उनके पैर नहीं दौड़ते मोबाइल स्क्रीन पर उंगलिया चलती हैं। पहले आंखें दूर तक देखते हुए बॉल कैच करने के लिए प्रेरित करती थीं आज घंटों स्क्रीन पर अटकी रहती हैं। शरीर कई घंटों से बैठा हुआ है, जैसे मोबाइल ने जकड़ लिया हो, ऐ नादान बच्चे यहां से हिलना भी मत…। फिक्र इस बात की है कि ऐसा ठहराव वाला बचपन अब आदत तक सीमित नहीं रहा, यह देश के भविष्य के लिए चिंतन का बड़ा सबब बन गया है। patrika.com पर पढ़ें संजना कुमार की खास रिपोर्ट…
दरअसल हाल ही में इंडियन चिल्ड्रन फिटनेस 2026 के एक सर्वे में चौकाने वाले फैक्ट सामने आए हैं। देशभर के 112 शहरों में 333 स्कूलों में एक लाख 40 हजार बच्चों की हेल्थ पर एक स्टडी की गई। इस हेल्थ स्टडी में 34 फीसदी बच्चे ही एरोबिक फिटनेस पर खरे उतरे हैं। यानी बाकी बच्चों में इतना स्टेमिना ही नहीं है कि वे लंबे समय तक दौड़-भाग सकें या शारीरिक एक्टिविटीज कर सकें। यह सभी फिटनेस पैरामीटर्स में अब तक सबसे कमजोर प्रदर्शन रहा। बता दें कि ये सर्वे Sportz Village की 14वीं Annual Health Survey का हिस्सा है।
इस सर्वे रिपोर्ट में बच्चों की कार्डियोवैस्कुलर एंड्योरेंस यानी दिल और फेफड़ों की क्षमता बेहद कमजोर पाई गई। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसका सीधा असर बच्चों के दौड़ने, खेलने और लंबे समय तक एक्टिव रहने की क्षमता पर दिखाई दे रहा है।
हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि भारतीय बच्चों में मोटापा तेजी से बढ़ रहा है। चाइल्डहुड ऑबेसिटी का बड़ा कारण एरोबिक फिटनेस गिरना। मोटापे के कारण बच्चे जल्दी थक रहे हैं और उनकी शारीरिक क्षमता लगातार घट रही है।
वैश्विक स्तर पर, सरकारों ने 2025 तक बच्चों में मोटापे की बढ़ती दर को रोकने का लक्ष्य रखा था। यह लक्ष्य पहले ही चूक गया है। अगला बड़ा पड़ाव अब 2030 में है, हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि प्रगति के लिए कहीं ज्यादा मजबूत नीतिगत कार्रवाई की जरूरत होगी।
चिंता सिर्फ शारीरिक वजन को लेकर नहीं है। मेडिकल शोधकर्ता बच्चों में मोटापे को तेजी से गंभीर, लंबे समय तक चलने वाली स्वास्थ्य समस्याओं का बड़ा खतरा माना है। वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस का अनुमान है कि अगर मौजूदा रुझान जारी रहे, तो 2040 तक भारतीय युवाओं में कई मेटाबॉलिक बीमारियों में तेजी से बढ़ेंगी।
सर्वे में सामने आया है कि बच्चों की लोअर बॉडी स्ट्रेंथ यानी पैरों और शरीर के निचले हिस्से की ताकत भी कमजोर हुई है। इस कमजोरी के कारण उनकी मोबिलीटी और ओवरऑल बॉडी की कंडिशनिंग भी प्रभावित हुई है।
आज बच्चे घर में कैद रहकर मोबाइल पर गेम खेलते हैं। रील्स देखते हैं, इसी में उनका समय गुजर रहा है। घर के आसपास खाली पड़े या फिर खेल के मैदान नहीं हैं। ऐसे में बच्चे फिजिकली एक्टिव ही नहीं हो रहे। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इनकी फिटनेस के लिए इनका फिजिकली एक्टिव होना बेहद जरूरी है।
रिपोर्ट में 70% बच्चों की फ्लैक्सिबिलिटी अच्छी पाई गई, जबकि 87% बच्चों की कोर स्ट्रेंथ बेहतर रही। यानी बच्चों की बेसिक फिटनेस क्षमता अब भी बची हुई है। लेकिन इस पर ध्यान देने की जरूरत है।
रिपोर्ट में एक और हैरानी वाला तथ्य सामने आया है, जिसमें सामने आया है कि सरकारी स्कूलों के बच्चे प्राइवेट स्कूलों के बच्चों से ज्यादा फिट हैं। सरकारी स्कूलों में सात में से पांच बच्चे फिटनेस पैरामीटर्स में प्राइवेट स्कूलों के बच्चों से बेहतर पाए गए। खासतौर पर एरोबिक और एनारोबिक क्षमता में उनका प्रदर्शन बेस्ट रहा है।
इस बारे में हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसकी बड़ी वजह ये हो सकती है कि उन्हें खेलने-कूदने और फिजिकली एक्टिव बने रहने के मौके ज्यादा मिलते हैं। यह मामला एक सीख भी देता है कि फिटनेस पैसों से नहीं खरीदी जा सकती है। इसे बनाए रखने के लिए सही आदतों का होना जरूरी है।
सर्वे को लेकर बैरियाट्रिक सर्जन डॉ. संजय बोरुडे के मुताबिक बच्चों को डाइट में पर्याप्त प्रोटीन नहीं मिल पा रहा है। खासतौर पर शाकाहारी डाइट्स में मांसपेशियों के विकास के लिए जरूरी प्रोटीन की कमी देखी गई है।
बच्चों की फिटनेस के इस सर्वे में लड़कों में एरोबिक क्षमता और लोअर बॉडी स्ट्रेंथ लड़कियों के मुकाबवे ज्यादा बेहतर पाई गई। जबकि लड़कियां BMI और फ्लैक्सिबिलिटी के साथ ही बैलेंस रखने में लड़कों से आगे रहीं। लेकिन दोनों की ही फिटनेस में एरोबिक फिटनेस कमजोर पाई गई।
क्षेत्रीय स्तर पर देखा जाए तो पश्चिम भारत के बच्चों का प्रदर्शन देश के बाकी क्षेत्रों से ज्यादा बेहतर रहा। हालांकि किसी भी क्षेत्र में ज्यादातर बच्चे फिटनेस के एंड्योरेंस मानकों पर खरे नहीं उतरे।
सर्वे रिपोर्ट की मानें तो 2020 में बच्चों का फिटनेस लेवल 70.5 प्रतिशत था, जो 2022 में गिरकर केवल 56 प्रतिशत रह गया। इसकी वजह ये रही कि कोविड-19 के दौरान स्कूल बंद रहे, बच्चों में फिजिकल एक्टिविटी भी कम हो गई। यही वो समय था जब बच्चों में मोबाइल एडिक्शन डेवलप हुआ। हालांकि 2025 तक बच्चों की फिटनेस में थोड़ा सुधार देखने को मिला। फिटनेस स्तर करीब 85 प्रतिशत तक पहुंचा।
इंडियन चिल्ड्रन फिटनेस 2026 की रिपोर्ट में सामने आया कि जिन बच्चों ने सालभर 80 से ज्यादा फिजिकल एजुकेशन सेशंस किए, उनका प्रदर्शन सभी फिटनेस पैरामीटर्स पर बेहतर रहा।
एक्सपर्ट्स ने चेतावनी भी दी है कि यदि आज बच्चों की लाइफस्टाइल नहीं बदली गई, तो वे भविष्य में डायबिटीज, हार्ट डिजीज, हाइपरटेंशन और मोटापे जैसी बीमारियों से परेशान होंगे।
ध्यान दें अगर आज हमने बच्चों को मैदान नहीं दिया, तो कल उन्हें अस्पताल देना पड़ेगा। ऐसे में ज्यादा जरूरी है कि माता-पिता खुद बच्चों के रोल मॉडल बनें, बच्चों के साथ खेलें, एक्टिव रहें।