Patrika Special News

Unsafe Government schools : राजस्थान में 56% तो देश में 22 फीसदी स्कूल भवन जर्जर, 26% स्कूलों के शौचालयों में पानी तक नहीं

Unsafe School : राजस्थान सरकार के इस बयान के बाद कि राज्य के 56% से ज्यादा स्कूलों की बिल्डिंग पूरी तरह से जर्जर अवस्था में है। इसके बाद से राज्य के लोग सकते में हैं। हालांकि, कमोबेश यही हालात देश के ज्यादातर राज्यों में बहुत सी स्कूलों की है। पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।

4 min read
Feb 06, 2026
Unsafe government schools

Unsafe government schools : हाल ही में राजस्थान विधानसभा में एक प्रश्न के उत्तर में राजस्थान सरकार ने कहा कि राज्य के सरकारी स्कूलों के सभी कमरों में से 56% से अधिक या तो जर्जर हैं, अनुपयोगी हैं या बड़े पैमाने पर मरम्मत कार्य की आवश्यकता है। अगर हम पूरे भारत की बात करें तो बाल अधिकार संस्था राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण परिषद (एनसीपीसीआर) ने 'सुरक्षित और संरक्षित विद्यालय वातावरण' पर एक रिपोर्ट में कहा है कि देश में कार्यरत विद्यालयों के लगभग 22 प्रतिशत भवन जर्जर अवस्था में हैं।

'भामाशाहों के भरोसे राज्य के स्कूल की व्यवस्था नहीं चल सकती'

जयपुर के एक सरकारी स्कूल की प्रधानाचार्य ने बताया कि यह सच है कि राज्य सरकार की स्कूलों की बिल्डिंग की हालत बहुत खराब है। अगर किसी ने भी स्कूल की बिल्डिंग किसी भामाशाह की सहायता से बनवा ली तो अब सरकार ने आसपास के जर्जर स्कूल को उसी स्कूल में ही मर्ज कर दिया। एक तरह से सरकार ने उस प्राइमरी स्कूल को बंद ही कर दिया न? भामाशाहों के भरोसे राज्य के स्कूल की व्यवस्था चल नहीं सकती है, जबकि सरकार व अधिकारियों का कहना है कि भामाशाहों को प्रेरित करें व विद्यालय निर्माण करवाएं।

'सरकार स्कूलों की दशा सुधारने के लिए कुछ भी नहीं कर रही है'

क्या सरकार स्कूलों की बिल्डिंगों को सुधारने के लिए कुछ कर है? इस सवाल के जवाब में वह साफ शब्दों में कहती हैं, 'सरकार इस बारे में कुछ भी नहीं कर रही है। सरकार ने अधिकतर जर्जर विद्यालयों में दो या तीन कमरों के निर्माण के आदेश दे दिए हैं। जिनमें भी कुछ के टेंडर नहीं हुए हैं, कुछ अन्य सरकारी आदेशों की वजह से अटके हुए हैं।'

'दो-तीन कमरों में स्कूल कैसे चलाए जा सकते हैं?'

क्या दो-तीन कमरों में कोई भी स्कूल चलाया जा सकता है? इस सवाल के जवाब में वह कहती हैं कि किसी भी सीनियर सेकेंडरी स्कूल को दो शिफ्ट में भी चलाना पड़े तो कम से कम 15 कमरे चाहिए। शिक्षकों, प्रधानाध्यापक, कम्प्यूटर लैब, मिड डे मील, साइंस लैब, पुस्तकालय आदि के अलावा बच्चों की कक्षाओं के लिए कमरे चाहिए। तो ऐसी स्थितियों में कोई भी बता दे कि दो, तीन कमरों में स्कूल कैसे चलाए जा सकते हैं? यह आम जनता के साथ सरासर मजाक है।

झालावाड़ के शिक्षकों ने बच्चों के लिए तैयार किए अस्थायी कक्षाएं

झालावाड़ जिले की मनोहरथाना तहसील के खेइआडी का पुरा सरकारी स्कूल की छत गिरने से पिछले साल जुलाई में सात छात्रों की मौत हो गई और 20 घायल हो गए थे। इस घटना के बाद शिक्षकों ने इसका समाधान ढूंढ निकाला। 4 फरवरी 2026 को स्कूल के लिए नए भवन का निर्माण कार्य शुरू हुआ। खेइआडी का पुरा सरकारी स्कूल की इमारत को असुरक्षित होने के कारण ध्वस्त कर दिया गया था। स्कूल का मलबा अभी तक हटाया नहीं गया है। इसके दो शिक्षक दो अस्थायी कक्षाओं में कक्षाएं ले रहे हैं। इन दोनों शिक्षकों ने इन अस्थायी कक्षाओं को तैयार करने में जरूरी धन जुटाने में मदद की।

झालावाड़ जिला प्रशासन ने खेइआड़ी का पुरा स्कूल की इमारत गिरने के बाद यह प्रस्ताव दिया था कि स्कूल को 5 किलोमीटर दूर स्थित एक भवन में स्थानांतरित कर दिया जाए। इन दोनों शिक्षकों को यह लगा कि प्राथमिक कक्षा के बच्चों के लिए यह दूरी बहुत अधिक होगी। यही वजह है कि सांवरिया मीणा और जगदीश मीना ने मिलकर एक अस्थायी कक्षा तैयार करने का मन बनाया, जहां बच्चों की पढ़ाई चलती रहे।

पांच वर्षों में स्कूल निर्माण के लिए किए 10 लाख इकट्ठा

खेइआडी का पुरा वाली ही तहसील के हांडोतिया लोधन में स्थित सरकारी उच्च प्राथमिक विद्यालय के शिक्षकों का अनुमान है कि उन्होंने पिछले पांच वर्षों में विद्यालय की मरम्मत के लिए लगभग 10 लाख रुपये एकत्र किए हैं।

महात्मा गांधी गर्वनमेंट सीनियर सेकेंडरी स्कूल, अलवर में कार्यरत शिक्षिका सरिता भारत ने पत्रिका को बताया कि 'राजस्थान ही नहीं, बल्कि देश के कई इलाके ऐसे हैं जहां स्कूल पेड़ के नीचे चलाए जा रहे हैं। बहुत सारे स्कूलों के भवनों की हालत बहुत खराब है। बारिश के मौसम में स्कूल की छतें चूने लग जाती हैं। पहाड़ी राज्यों में तो स्कूल पहुंचना ही मुश्किल काम हो जाता है। कई बार शिक्षक और स्थानीय लोग मिलकर कुछ अस्थायी ढांचा तैयार कर लेते हैं लेकिन इस तरह से देश की शिक्षा व्यवस्था को नहीं चलाया जा सकता है।

सरिता का कहना है कि झालावाड़ ही नहीं अन्य जिलों में भी कमोबेश एक जैसी स्थिति है। शिक्षकों के योगदान से स्कूल की इमारत कैसे खड़ी की जा सकती है? बच्चों के लिए सरकार को ही कमर कसनी होगी।

'स्कूल ही नहीं सरकारों की सोच ही जीर्णशीर्ण हो गई है'

वहीं राजस्थान कांग्रेस के प्रवक्ता अरुण शर्मा ने पत्रिका से बातचीत में कहा कि राज्य ही नहीं देश में सरकारी शिक्षा व्यवस्था चौपट हो चुकी है। ​स्कूलों के भवन होने से पहले सरकारों की सोच ही जीर्णशीर्ण हो चुकी है। यह मैं सिर्फ राजस्थान के बारे में नहीं कह रहा हूं। देश की लगभग सभी सरकारों ने शिक्षा के बारे में कोई वायदा भी करना भी छोड़ दिया। पहले सरकारें कम से कम शिक्षा को लेकर कुछ न कुछ वादा करती थी। अब कोई भी सरकार हो, वह स्कूली शिक्षा को लेकर कोई वादा भी नहीं करती है। यह बहुत गंभीर समस्या है। मैं यह सोचकर कभी-कभी बहुत दुखी हो जाता हूं कि जिस देश में इतनी गरीबी है, वहां के करोड़ों बच्चे शिक्षा कैसे पाएंगे?

हमारे देश के नौनिहालों के स्कूल बेहाल

  • एनसीपीसीआर 2025 की सर्वेक्षण रिपोर्ट में कहा है कि देश में लगभग 22 प्रतिशत स्कूल भवन जर्जर अवस्था में हैं, जबकि लगभग 31% स्कूलों की संरचनाओं में दरारें पाई गईं।
  • 19% स्कूल रेलवे ट्रैक के आसपास पाए गए और केवल 1% स्कूलों में ही उचित जेब्रा क्रॉसिंग के संकेत थे।
  • 51% स्कूलों में दिव्यांगों के लिए अनुकूल शौचालय नहीं थे।
  • सिर्फ 57% बच्चे ही मिड डे मील के तहत परोसे जाने वाले भोजन की गुणवत्ता से संतुष्ट पाए गए।
  • 60% स्कूलों में व्हीलचेयर से लैस सुलभ कक्षाएं, खेल के मैदान और शौचालय नहीं थे।
  • स्कूलों में से केवल 32% में ही दृष्टिबाधित छात्रों के लिए सुविधाएं पाई गईं।
  • जिन स्कूलों में बिजली के कनेक्शन पाए गए, उनमें से सिर्फ 77% स्कूलों में ही कक्षाओं और गलियारों में पूरी तरह से बिजली की फिटिंग लगी हुई है।
  • सिर्फ 55% स्कूलों में ही कंप्यूटर उपकरण की व्यवस्था पाई गईं।
  • उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, छत्तीसगढ़, हरियाणा, राजस्थान, ओडिशा, मिजोरम, उत्तराखंड, मेघालय, झारखंड और चंडीगढ़ राज्यों के 26,071 स्कूलों की स्थितियों के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई।
Also Read
View All

अगली खबर