
इंदौर के चिड़ियाघर में 14-D सिनेमा शुरू हो गया है। यानी अब जंगल देखने के लिए जंगल जाने की जरूरत नहीं है। टिकट खरीदो, थिएटर में सीट हिलेगी, हवा चलेगी, बारिश का अहसास होगा और आप जंगल में पहुंच जाएंगे। वर्चुअल जंगल सफारी में जानवरों को देखने का रोमांच भी मिलेगा। लेकिन अगर हम इंदौर की सड़कों की बात करें, तो यहां जंगल का असली अनुभव लेने के लिए टिकट खरीदने की जरूरत नहीं है।
इसमें से कोई कहानी बहुत पुरानी नहीं है। बार-बार दोहराई जाती है। हाल की एक घटना ने फिर इस अजीब रिश्ते की याद दिला दी। चंडीगढ़ से इंदौर आ रही ऊना-इंदौर एक्सप्रेस के फर्स्ट एसी कोच में 78 वर्षीय सेवानिवृत्त अधिकारी सो रहे थे। रात करीब साढ़े दस बजे चूहे ने उनकी नाक काट दी। दर्द और खून निकलने से नींद खुली। परिजनों का कहना है कि कोच में चूहों और गंदगी की शिकायत पहले की गई थी।
यह पहली बार नहीं है जब ट्रेन में चूहे के होने की खबर बनी हो। कभी एसी कोच में चूहे घूमते मिले, कभी यात्रियों ने शिकायत की कि चूहों ने उनके सामान कुतर दिए। इसलिए इस घटना को केवल एक बुजुर्ग यात्री के साथ हुई विचित्र दुर्घटना मानकर आगे बढ़ जाना आसान है, लेकिन इंदौर के संदर्भ में यह कहानी कुछ ज्यादा बड़ी है। क्योंकि चूहे यहां सिर्फ ट्रेन के डिब्बे तक सीमित नहीं हैं। एयरपोर्ट पर भी यात्री के चूहे के काटने की शिकायत सामने आ चुकी है। यानी शहर में जिससे आने-जाने का सबसे सुरक्षित और आधुनिक माध्यम माना जाता है, वहां भी चूहे यात्री से पहले पहुंच जा रहे हैं।
प्रदेश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल एमवायएच में अगस्त 2025 में चूहों द्वारा दो नवजातों को काटने की घटना ने पूरे देश का ध्यान खींचा था। घटना के बाद अस्पताल में पेस्ट कंट्रोल और निगरानी को लेकर सवाल उठे और कार्रवाई भी हुई। लेकिन कुछ महीनों बाद इसी अस्पताल में बिल्ली और उसके बच्चों की मौजूदगी सामने आई। बिल्ली अस्पताल की ओपीडी में घूमती मिली और उसे पकड़ने के लिए पिंजरे लगाने पड़े। यह घटना अपने आप में छोटी लग सकती है, लेकिन दोनों घटनाओं को साथ रखिए तो सवाल बड़ा हो जाता है।
अस्पताल में मरीजों की सुरक्षा के लिए सिर्फ डॉक्टर और दवाइयां पर्याप्त हैं या यह भी जरूरी है कि वहां कौन प्रवेश कर रहा है, इस पर नियंत्रण हो?
अस्पताल वह जगह है जहां लोग अपनी बीमारी लेकर आते हैं। वहां चूहा हो, बिल्ली हो या आवारा कुत्ता- तो संक्रमण और सुरक्षा का क्या? और यह बात सिर्फ एमवायएच तक सीमित नहीं है। इंदौर के दूसरे अस्पतालों और शिक्षण संस्थानों में भी आवारा कुत्तों का घूमना कोई असामान्य दृश्य नहीं है। यही वह बिंदु है जहां मामला पशु नियंत्रण से निकलकर सार्वजनिक सुरक्षा का विषय बन जाता है।
नवंबर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ निर्देश दिए थे कि अस्पताल, शिक्षण संस्थान, खेल परिसर, बस स्टैंड और रेलवे स्टेशन जैसे संवेदनशील परिसरों को आवारा कुत्तों से सुरक्षित रखा जाए। इसके लिए फेंसिंग, गेट और दूसरे जरूरी इंतजाम करने तथा ऐसे परिसरों में पाए जाने वाले कुत्तों को निर्धारित शेल्टर में भेजने की व्यवस्था करने को कहा गया था। अदालत ने यह भी कहा कि उन्हें उसी स्थान पर वापस न छोड़ा जाए। मई 2026 में भी सुप्रीम कोर्ट ने इन संस्थागत परिसरों को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट रखी।
तो सवाल अब और सीधा है-
अगर अस्पताल और कॉलेज सुरक्षित परिसर होने चाहिए, तो इंदौर में उनकी सीमा इतनी खुली क्यों है?
इंदौर में चूहों की कहानी का सबसे विचित्र अध्याय तब सामने आया जब उनका असर शहर के इंफ्रास्ट्रक्चर पर दिखाई दिया। शास्त्री ब्रिज की सड़क धंस गई। करीब पांच फीट गहरा और छह फीट लंबा गड्ढा बन गया। जांच में पुल के नीचे चूहों के बिल मिले और मिट्टी खोखली होने की बात सामने आई। इससे पहले भी इसी इलाके में बड़ी संख्या में सुराख मिलने की बात सामने आई थी। फिर रीगल चौराहे पर भी जमीन के भीतर चूहों के बिलों से जमीन कमजोर होने की चिंता सामने आई और विशेषज्ञों की मदद लेनी पड़ी। नगर निगम को बाद में इन इलाकों में चूहों की गतिविधि रोकने के लिए विशेष उपाय करने पड़े।
यहां चूहा सिर्फ सफाई का विषय नहीं रह गया था। वह शहर की सुरक्षा का विषय बन गया था। एक छोटा-सा जीव, जिसकी मौजूदगी आमतौर पर रसोई के डिब्बे, कचरे या नाली तक सीमित मानी जाती है, शहर के पुल और सार्वजनिक स्थानों की जमीन तक पहुंच गया।
सवाल यह है कि कहां इंसान और जानवर के बीच दूरी जरूरी है? और यह तय करने और उस दूरी को बनाए रखने की जिम्मेदारी किसकी है?
ऐसा नहीं है कि इंदौर अचानक ऐसा शहर बन गया है। न ही इसका समाधान यह है कि शहर से हर जानवर को बाहर कर दिया जाए। दरअसल यह तय किया जाना जरूरी है कि मनुष्य और जानवरों के बीच एक निश्चित दूरी बनाना कहां-कहां जरूरी है।
कुत्ते-बिल्ली प्यारे जीव हैं और उनके प्रति संवेदनशील होना बहुत अच्छा और जरूरी है। लेकिन यह भावना और सार्वजनिक स्थानों को सुरक्षित रखना एक-दूसरे के विरोध में नहीं हैं। बल्कि जिम्मेदार शहर वही है जो दोनों को एक उचित तरीके से समायोजित कर सके।
इंदौर की पहचान स्वच्छता से बनी है। अब शहर के सामने अगली चुनौती शायद इससे आगे की है। सिर्फ सड़क के ऊपर सफाई नहीं। सिर्फ अस्पताल के भीतर सफाई नहीं। सिर्फ ट्रेन के कोच में झाड़ू नहीं। बल्कि यह देखना भी कि सार्वजनिक जगहों की सीमाएं कितनी सुरक्षित हैं। कौन अस्पताल में प्रवेश कर रहा है? कौन कॉलेज परिसर में घूम रहा है? कौन रेलवे परिसर में रह रहा है? और किसकी वजह से सड़क या पुल की सुरक्षा प्रभावित हो सकती है? इन सवालों का जवाब सिर्फ पेस्ट कंट्रोल की एक बोतल या किसी घटना के बाद लगाए गए पिंजरे में नहीं है। जवाब एक ऐसी व्यवस्था में है जो समस्या दिखाई देने का इंतजार न करे। क्योंकि अभी तक हमारी व्यवस्था का तरीका कुछ ऐसा दिखता है- पहले समस्या अंदर आती है, फिर घटना होती है, फिर शिकायत होती है, फिर पेस्ट कंट्रोल होता है, फिर पिंजरा लगता है और फिर जिम्मेदारी तय करने की कोशिश होती है।
सुरक्षित शहर का तरीका इसका उलटा होना चाहिए- पहले सीमा सुरक्षित हो, फिर समस्या अंदर आए ही नहीं।
और शायद यही इंदौर के 14-D सिनेमा का सबसे अच्छा व्यंग्यात्मक अर्थ भी है। वहां अनुभूति चाहे इस बात की हो कि हम जंगल और जानवरों के साथ हैं, लेकिन असल में वहां जानवर अपनी तय सीमा में होंगे और इंसान सुरक्षित दूरी पर। यही सुरक्षा हमे सिनेमा से उतार कर शहर की सड़कों पर लाना होगा। जरूरत इस बात की है कि जिम्मेदार लोग शहर को, उसकी व्यवस्था को और उसकी सुरक्षा को हर चश्मे से आजाद होकर देखें।