Javed Akhtar B'day: फिल्मी गीतकार और शायर जावेद अख्तर का जन्म 17 जनवरी 1945 में हुआ था। वह आज 81 साल के हो गए। उन्हें हर विषय पर खुलकर अपने विचार रखने के लिए जाना जाता है। वह हिंदी, उर्दू, होली, दिवाली, आस्तिकता और नास्तिकता पर क्या राय रखते हैं, जानिए।
Javed Akhtar birthday : प्रसिद्ध लेखक, शायर और गीतकार जावेद अख्तर (Javed Akhtar Age) आज 81 वर्ष के हो गए। वह पूरी तरह स्वस्थ हैं और अपने खुले विचारों के लिए दुनिया भर में जाने जाते हैं। वह भाषा, भगवान, होली, संस्कृति को लेकर काफी मुखर रहते हैं। आइए उनके विचार जानते हैं।
Urdu is not Muslim Langauage : भारत की एक बड़ी आबादी उर्दू को मुसलमानों की भाषा मानती है, लेकिन जावेद अख़्तर मानते हैं कि उर्दू को इस्लाम धर्म से जोड़कर देखना एक बहुत बड़ी ऐतिहासिक भूल है। वह कहते हैं कि उर्दू और हिंदी हिंदुस्तान में पैदा हुई भाषा है। दोनों ही भाषा यहां पैदा हुई, पनपीं और पली-बढ़ीं। वह कहते हैं कि उर्दू को मुसलमानों की भाषा बताना सांस्कृतिक अन्याय भी है। वह बताते हैं कि तेलंगाना का मुसलमान तेलुगु, तमिलनाडु का मुसलमान तमिल और केरल का मुसलमान मलयाली बोलता है। एक तथ्य के अनुसार, दुनिया में मुसलमानों की संख्या दो अरब से ज्यादा है जबकि उर्दू बोलने वालों की संख्या सिर्फ 24 करोड़ के आसपास है।
वह उर्दू की समावेशी प्रकृति पर जोर देते हुए कहते हैं कि यह अरबी, देवनागरी और गुरुमुखी तीनों लिपियों में लिखी जाती है। भाषा को लिपि से जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए। वह कहते हैं कि भाषा किसी की बपौती नहीं होती है। वह बताते हैं कि पाकिस्तान बंटवारे से पहले सिर्फ हिंदुस्तान था और हिंदी सिर्फ हिंदुओं की भाषा नहीं है।
Bangladeshi Muslim Speaks Bengali not Urdu : वह कहते हैं कि भाषा व्यवहार की चीज है। वह इसे एक उदाहरण देकर समझाते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान और बांग्लादेश का बंटवारा भाषा को लेकर हुआ। वह कहते हैं कि दो देशों के बंटवारे में हमेशा यह देखा गया कि अल्पसंख्यक ही अलग होने की मांग करते हैं। हालांकि पाकिस्तान से बांग्लादेश के अलग होने की कहानी बिल्कुल अलग है। पाकिस्तान की आबादी विभाजन से पहले 17 करोड़ के करीब थी। वहां 7 करोड़ लोगों की जुबान उर्दू थी और 10 करोड़ लोगों की बंगाली थी। वहां के सियासतदान चाहते थे कि पाकिस्तान की 17 करोड़ की पूरी आबादी उर्दू पढ़े, लिखे और बोले। बंगाली जुबान वाले 10 करोड़ मुसलमानों ने साफ-साफ मना कर दिया कि वह उर्दू नहीं पढ़ेंगे। उन्होंने बांग्ला भाषा को लेकर लड़ाई लड़ी और देश का बंटवारा किया। बांग्लादेश में मुसलमानों की मादरी जुबान उर्दू है।
वह मानते हैं कि किसी भाषा को किसी धर्म से जोड़ना गलत है। वह कहते हैं कि भाषा समाज और क्षेत्र से जुड़ती है और भाषा का यह संघर्ष दिखाता है कि कैसे धार्मिक आधार पर भाषाई पहचान को दबाने के प्रयास विफल होते हैं। वह यह बात पाकिस्तान और बांग्लादेश को लेकर कहते हैं। वह पाकिस्तान की आलोचना करते हुए कहते हैं कि पाकिस्तान में भाषाई और सांस्कृतिक पहचान को लेकर गंभीर मुद्दे रहे हैं। वह मानते हैं कि वहां की सेना और सत्ता प्रतिष्ठान अक्सर सांस्कृतिक समझ के रास्ते में बाधा डालते हैं। वह कहते हैं, 'उर्दू आम आदमी को आकर्षित करती है। मुझे गर्व है कि मेरी मातृभाषा उर्दू है। अन्य भाषाएं धर्म से प्रेरित होकर शुरू हुईं, लेकिन उर्दू भाषा किसी धर्म का अनुसरण नहीं करती।
वह भाषाओं की शुद्धता पर बहस को अनावश्यक मानते हैं। उनका कहना है कि भाषा संवाद और आपसी आदान-प्रदान से समृद्ध होती हैं। उन्होंने कहा कि ‘बंदूक’ और ‘संदूक’ शब्द तुर्की मूल के हैं, जबकि ‘ऑटो-रिक्शा’ ग्रीक और जापानी शब्दों के मेल से बने हैं। इसके बावजूद भारत में ये शब्द वर्षों से व्यवहार में लाए जाते हैं।
Javed Akhtar on Atheism : जावेद अख्तर न सिर्फ भाषा पर बल्कि आस्तिकता और नास्तिकता पर मुखरता से अपनी बात रखते हैं। वह ब्रिट्रिश विकासवादी जीवविज्ञानी और लेखक रिचर्ड डॉकिंस और भारतीय क्रांतिकारी भगत सिंह की नास्तिकता के विचार से प्रभावित मालूम पड़ते हैं। वह खुद को नास्तिक (atheist) बताते हैं। रिचर्ड का मानना है कि ईश्वर के अस्तित्व का कोई ठोस प्रमाण नहीं है। भगत सिंह की तरह रिचर्ड भी हर चीज को तर्क की कसौटी पर कसने की बात को प्राथमिकता देते हैं।
गीतकार का मानना है कि तर्क और सोच के आधार पर ईश्वर में विश्वास नहीं किया जा सकता। वह कहते हैं कि अगर खुदा होता तो गाजा या दुनिया के किसी हिस्से में बच्चे नहीं मारे जाते। सभी धर्म अतीत की देन हैं। वह कहते हैं कि सोचने की क्षमता के कारण ही वह नास्तिक हैं। उनका मानना है कि तर्कसंगत व्यक्ति ही नास्तिक हो सकता है। वह नास्तिक कैसे बने? इस सवाल के जवाब में वह कहते हैं बचपन के अनुभव, विज्ञान और साहित्य ने उन्हें निडर नास्तिक बनाया है।
जावेद अख्तर खुद ही बताते हैं कि वह होली और दिवाली खूब बढ़-चढ़कर मनाते हैं। उनका दावा है कि फिल्म इंडस्ट्री में सबसे बड़ी होली उनके घर ही होती है। वह कहते हैं कि मैं धार्मिक नहीं हूं लेकिन मैं खुद को भारतीय संस्कृति से जुड़ा हुआ पाता हूं। वह होली और दिवाली जैसे त्योहारों को धार्मिक नहीं मानते हैं। वह कहते हैं कि होली और दिवाली भारत के सांस्कृतिक त्योहार रहे हैं। इसे जबरदस्ती का धार्मिक बनाया गया है। वह कहते हैं कि धर्म, अंधकार युग की चीज है। अगर कोई किसी चीज के बारे में 'है' की बात करता है तो उसे तर्क देना होगा।