
Kamini Struggle Story: सक्ती जिले के डबरा ब्लॉक के कोमो गांव की 52 वर्षीय कामिनी धरमा ने अपनी जिंदगी की मुश्किलों को कमजोरी नहीं, बल्कि ताकत बनाया। करीब तीन दशक पहले गांव में शराबबंदी के खिलाफ आवाज उठाने से शुरू हुआ उनका संघर्ष आज महिलाओं के अधिकार, घरेलू हिंसा, लैंगिक समानता, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की मुहिम में बदल चुका है। आसपास के 25 से अधिक गांवों की महिलाएं आज उन्हें अपना आदर्श मानती हैं। कामिनी ने न केवल महिलाओं को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया, बल्कि उन्हें रोजगार से जोड़कर आर्थिक रूप से मजबूत बनाने की दिशा में भी लगातार काम किया।
कामिनी का मानना है कि महिला सशक्तीकरण का अर्थ अधिकारों की जानकारी देने के साथ ही उन्हें इतना सक्षम बनाना है कि वह खुद निर्णय ले सके। महिलाएं अपने हुनर को आय में बदलें और परिवार के साथ अपने भविष्य के फैसले भी ले सकें।
22 वर्ष की उम्र में शराबबंदी के लिए आवाज उठाने वाली कामिनी ने करीब तीन दशक के इस सफर में आंदोलन से लेकर जागरूकता, प्रशिक्षण और रोजगार तक महिलाओं को जोड़ने का काम किया है। उनकी कहानी बताती है कि परिस्थितियां कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि इंसान हिम्मत नहीं हारता तो वही मुश्किलें आगे चलकर उसकी सबसे बड़ी ताकत बन जाती हैं।
कामिनी बताती हैं कि गांव में शराब के कारण परिवारों पर पड़ रहे असर को देखते हुए उन्होंने शराबबंदी के खिलाफ आवाज उठानी शुरू की थी। शुरुआत आसान नहीं थी। विरोध और सामाजिक दबाव के बावजूद उन्होंने कदम पीछे नहीं खींचे। धीरे-धीरे गांव की महिलाएं उनके साथ जुड़ती गईं और यहीं से महिलाओं के लिए काम करने का उनका सफर शुरू हुआ।
कामिनी ने गांव और आसपास की महिलाओं को छोटे घरेलू व्यवसायों से जोड़ना शुरू किया। सैकड़ों महिलाओं को दोना-पत्तल बनाने, हल्दी-मिर्च जैसे घरेलू उत्पादों के कारोबार और अन्य छोटे रोजगार के लिए प्रशिक्षण दिया।
महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत करने की मुहिम को आगे बढ़ाते हुए कामिनी अब सूत बुनाई का प्रशिक्षण देकर उन्हें नियमित रोजगार से जोड़ना चाहती हैं। इसके लिए वह बिहान के माध्यम से आर्थिक सहयोग लेकर महिलाओं को सूत बुनने की मशीन उपलब्ध कराने का प्रयास कर रही हैं।
कामिनी का मानना है कि विपरीत परिस्थितियों से डटकर मुकाबला करने से आत्मविश्वास बढ़ता है और फिर हर परेशानी का समाधान आसान लगने लगता है।