
Successful Women : जिंदगी जब किसी के सामने मुसीबतों के पहाड़ खड़े करती है, तो दो ही रास्ते बचते हैं या तो इंसान हालात के आगे घुटने टेक दे या फिर उन्हीं संघर्षों को अपनी जीत की सीढ़ी बना ले। मध्य प्रदेश के विभिन्न अंचलों चंदेरी, गुना और राजगढ़ की कुछ असाधारण महिलाओं ने दूसरा रास्ता चुना। किसी के पास मनपसंद साड़ी खरीदने के पैसे नहीं थे, तो उसने खुद करघा थाम लिया, किसी ने कम उम्र में वैवाहिक और पारिवारिक प्रताड़ना व अकेलेपन का सामना करते हुए समाज सेवा और बच्चों की उच्च शिक्षा को अपनी ढाल बनाया, तो किसी ने चाय के ठेले और मजदूरी से निकलकर कलेक्ट्रेट परिसर तक अपने उद्यम का परचम लहराया। अभावों से शुरू हुई इन कहानियों में जिद है, जुनून है और अपने दम पर आसमान छू लेने का हौसला है। आइए जानते हैं इनकी प्रेरणादायक दास्तां…
दुनिया भर में अपनी अनूठी कला के लिए मशहूर चंदेरी साड़ी के ताने-बाने में सिर्फ रेशमी धागे ही नहीं, बल्कि यहां के बुनकरों का पसीना और संघर्ष भी घुला हुआ है। वार्ड-2, पसियापुरा निवासी 48 वर्षीय गायत्री देवी की कहानी ऐसी ही बुलंदियों की मिसाल है। वर्षों पहले जब वह एक दुकान पर अपनी पसंद की साड़ी देखने गईं, तो तंगहाली के कारण उसे खरीद नहीं पाईं। मन मसोसकर लौटने के बजाय उस कसक ने उनके भीतर एक ऐसी आग जलाई कि उन्होंने ठान लिया जो साड़ी वह खरीद नहीं सकतीं, उसे खुद बुनकर दिखाएंगी।
कोली समाज से ताल्लुक रखने वाली गायत्री ने बचपन में अपने पिता नारायण दास को करघा चलाते देखा था। बस, उसी पुश्तैनी हुनर को अपना हथियार बनाया। पिछले 30 सालों से लगातार करघे पर अपनी उंगलियों का जादू बिखेरती आ रही गायत्री अब तक अड्डा किनार, जंगला, दाढ़ीदार, वानेवार, पटोला, टिशु और शोल्डर जैसी अनगिनत वैरायटी की तीन हजार से अधिक साड़ियां बुन चुकी हैं। उन्होंने अपने दम पर पक्का मकान खरीदा, जिसमें आज तीन करघे स्थापित हैं। उनके पिता को राज्य स्तरीय कबीर पुरस्कार मिल चुका है, और अब गायत्री भी वर्ष 2026-27 के कबीर पुरस्कार के लिए अपनी एक विशेष कलाकृति भेजने की तैयारी कर रही हैं।
चंदेरी के ही प्राणपुर की रेखा बाई कोली की कहानी भी कम प्रेरणादायक नहीं है। साधारण बुनकर परिवार में जन्मीं और विवाह के बाद तमाम चुनौतियों से जूझने वाली रेखा ने बाजार की नब्ज को पहचाना। उन्होंने अशरफी बूटी, शचकरी बूटी, किनार बेल और जाल पल्लू जैसी पारंपरिक डिजाइनों में ऐसा नयापन घोला कि साड़ियों की मांग तेजी से बढ़ने लगी। उनके इसी नवाचार ने उन्हें 2019-20 में मप्र सरकार के राज्य स्तरीय पुरस्कार से नवाजा। कभी खुद पेट पालने के लिए संघर्ष करने वाली रेखा आज न सिर्फ अपने परिवार की आर्थिक रीढ़ हैं, बल्कि कई अन्य बुनकर परिवारों को रोजगार भी दे रही हैं।
जिंदगी जब बहुत कम उम्र में कड़े इम्तिहानों के भंवर में धकेल दे, तो इंसान टूट जाता है, लेकिन चंदेरी की आसमा परवीन ने उन आंसुओं को अपनी कमजोरी नहीं बल्कि अपनी सबसे बड़ी ताकत बना लिया। आठवीं की पढ़ाई के बाद बाल विवाह की बेड़ियों में जकड़ीं आसमा को ससुराल में वह सम्मान नहीं मिला जिसकी वे हकदार थीं। इसके बाद जवानी में ही पति के साये से महरूम हो जाने का ऐसा वज्रपात गिरा, जो किसी को भी पूरी तरह तोड़ सकता था। लेकिन आसमा ने हार नहीं मानी।
आसमा ने 'नव दिशा सहारा महिला मंडल' और अल्पसंख्यक बुनकर स्वयं सहायता समूह से जुड़कर समाज की पीड़ित महिलाओं के लिए न्याय की आवाज बनना शुरू किया। घरेलू हिंसा की शिकार 18 महिलाओं को उनका हक दिलाने वाली आसमा ने सिलाई को अपना हथियार बनाया। पाई-पाई जोड़कर अपना आशियाना बनाया और अपनी कड़ी मेहनत से तीनों बच्चों को उच्च शिक्षा दिलाई—बड़ी बेटी ने एमटेक किया, छोटी बेटी ने जोधपुर से टेक्सटाइल डिजाइनिंग की और बेटे ने बायोलॉजी से ग्रेजुएशन के साथ डीएमएलटी कोर्स किया। समाजसेवा की मिसाल बन चुकीं आसमा जरूरतमंदों के लिए अब तक 35 बार रक्तदान कर चुकी हैं और पर्यावरण संरक्षण में भी सक्रिय रूप से जुटी हैं।