
चित्रकूट की मंदाकिनी के किनारे रामघाट पर सुबह की आरती हो रही है। कामदगिरि की परिक्रमा में श्रद्धालु राम नाम जपते हुए आगे बढ़ रहे हैं। गुप्त गोदावरी की गुफाओं में पर्यटक पहुंच रहे हैं। कोई सतना से चित्रकूट आता है, कोई दूर-दराज के शहरों से। लेकिन यदि कोई श्रद्धालु यहां से भगवान श्रीराम के वनवास से जुड़े मध्यप्रदेश के दूसरे स्थलों की यात्रा पर निकलना चाहे, तो उसके सामने पहला सवाल यही होगा कि अगला पड़ाव कहां है, वहां पहुंचने का रास्ता कौन-सा है और उस जगह का रामायण से संबंध क्या है?
जिस राम वन गमन पथ को चित्रकूट से आगे मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों में रामायण से जुड़ी मान्यताओं और स्थलों को जोड़ने वाली धार्मिक-सांस्कृतिक यात्रा के रूप में विकसित करने की परिकल्पना की गई थी, वह आज भी एक मुकम्मल, पहचान योग्य और सुविधाजनक यात्रा मार्ग के रूप में सामने नहीं आया है। अलग-अलग स्थलों पर विकास कार्य होने और पूरे मार्ग के विकसित होने में बड़ा अंतर है। श्रद्धालुओं को जिस एकीकृत यात्रा अनुभव की उम्मीद थी, उसकी जगह उन्हें अलग-अलग स्थानों तक अपने स्तर पर पहुंचने की व्यवस्था पर निर्भर रहना पड़ता है।
भगवान श्रीराम ने 14 वर्ष का वनवास पूरा किया था, लेकिन उनके वनवास से जुड़े स्थलों को जोड़कर धार्मिक-सांस्कृतिक पर्यटन परिपथ बनाने की सरकारी परिकल्पना 18 साल बाद भी अधूरी है। वर्ष 2008 में सर्वेक्षण और मैप तैयार करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इसके बाद सरकारें बदलीं, चुनाव आए, घोषणाएं हुईं, करोड़ों रुपये की योजनाएं बनीं और श्रीरामचंद्र पथ गमन न्यास का गठन भी हुआ। इसके बावजूद श्रद्धालुओं को ऐसा एकीकृत मार्ग नहीं मिल सका, जिस पर वे सुविधाजनक यात्रा कर सकें।
राम वन गमन पथ की परिकल्पना को लेकर वर्ष 2004 से चर्चा के उल्लेख मिलते हैं। तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने वर्ष 2007 में इसके निर्माण की घोषणा की। वर्ष 2008 में संस्कृति विभाग ने अवधेश प्रसाद पांडेय के नेतृत्व में 11 विद्वानों की समिति गठित की। समिति ने अध्ययन और स्थलों की पहचान की प्रक्रिया आगे बढ़ाई तथा वर्ष 2010 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। लेकिन योजना आगे बढ़ने के बजाय सरकारी प्रक्रियाओं और बदलती प्राथमिकताओं में उलझती रही।
वर्ष 2018 के विधानसभा चुनाव से पहले परियोजना फिर चर्चा में आई। भाजपा सरकार के बजट में रामपथ विकास के लिए एक हजार रुपये का सांकेतिक प्रावधान दर्ज किया गया। इसके बाद कांग्रेस ने भी अपने चुनावी वचनपत्र में राम वन गमन पथ को शामिल किया। राहुल गांधी की चित्रकूट यात्रा के बाद यह मुद्दा और चर्चा में आया। सत्ता परिवर्तन के बाद कमलनाथ सरकार ने परियोजना को आगे बढ़ाने की पहल की।
नवंबर 2019 में तत्कालीन धार्मिक न्यास एवं धर्मस्व मंत्री पीसी शर्मा ने चित्रकूट से अमरकंटक तक करीब 200 किलोमीटर के मार्ग के विकास और 22 करोड़ रुपये की स्वीकृति की बात कही थी। योजना में मार्ग पर रामायण के प्रसंग और श्लोक प्रदर्शित करने की परिकल्पना थी, ताकि श्रद्धालु स्थलों के धार्मिक महत्व को समझ सकें। लेकिन सरकार अपने कार्यकाल में पूरी परियोजना को जमीन पर नहीं उतार सकी। सरकार बदली तो योजना की दिशा और क्रियान्वयन की प्रक्रिया फिर सवालों में आ गई।
वर्ष 2020 में भाजपा सरकार की वापसी के बाद पर्यटन, संस्कृति और आध्यात्म विभाग को नोडल विभाग बनाते हुए मध्यप्रदेश सड़क विकास निगम (एमपीआरडीसी) को निर्माण संबंधी जिम्मेदारी सौंपी गई। इस दौरान करीब 500 किलोमीटर लंबा मार्ग प्रस्तावित किया जो चित्रकूट से सतना, पन्ना, अमानगंज, कटनी, जबलपुर, मंडला और डिंडोरी होते हुए अमरकंटक तक जाता था।
व्यवहार्यता रिपोर्ट और डीपीआर तैयार करने के लिए एक करोड़ रुपये की प्रशासनिक स्वीकृति भी दी गई और 50 लाख रुपये जारी भी हुए। लेकिन तत्कालीन पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री उषा ठाकुर की चित्रकूट में हुई समीक्षा बैठक में यह मार्ग 8 फीट चौड़ा कच्चा रास्ता बताया गया। इसका व्यापर विरोध होने पर यह कवायद रोक दी गई। इस दौरान तत्कालीन कांग्रेस विधायक नीलांशु चतुर्वेदी ने दावा किया था कि कांग्रेस सरकार ने करीब दो हजार करोड़ रुपये की परियोजना तैयार की थी, जबकि भाजपा सरकार आठ फीट के कच्चे रास्ते की तैयारी कर रही है। सवाल आज भी यही है कि सरकार यह स्पष्ट नहीं कर सकी है कि राम वन गमन पथ एक सामान्य सड़क होगी या धार्मिक स्थलों को जोड़ने वाला सुविधायुक्त पर्यटन परिपथ।
परियोजना के व्यापक स्वरूप में धार्मिक स्थलों तक पहुंच मार्ग, पार्किंग और ठहरने की सुविधाएं विकसित करना जरूरी माना गया। फिर 1400 किलोमीटर लंबे मार्ग का प्लान सामने आया। लेकिन बाद में इसे भी निरस्त कर दिया गया। इसके बाद निर्माण की जिम्मेदारी संस्कृति विभाग के अंतर्गत आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास को सौंपे जाने की चर्चा हुई। लेकिन जमीन पर कुछ नजर नहीं आया।
शिवराज सिंह चौहान सरकार के कार्यकाल में श्रीरामचंद्र पथ गमन न्यास का गठन किया गया। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में जनवरी 2024 में चित्रकूट में न्यास की पहली बैठक हुई। न्यास में मुख्यमंत्री अध्यक्ष और विभिन्न विभागों के पदेन सदस्यों सहित 33 सदस्यों की व्यवस्था दी गई। लेकिन इसके बाद एक साल से ज्यादा समय तक न्यास की अगली बैठक नहीं हुई। इसी दौरान परियोजना के तहत करोड़ों रुपये के कार्य जारी होने की बात भी कही गई, जबकि स्थलों के अंतिम चयन की प्रक्रिया पूरी होना बाकी बताया गया। लेकिन इन कार्यों में कितने पूरे हो चुके हैं, किन स्थलों पर काम चल रहा है और श्रद्धालुओं को उनसे क्या सुविधाएं मिली हैं? इसका समेकित ब्योरा आज तक सामने नहीं रखा गया।
परियोजना में शामिल स्थलों की संख्या भी बदलती रही। जनवरी 2024 की बैठक में 23 स्थलों का उल्लेख था। अप्रैल 2026 में शोधकर्ता डॉ. रामअवतार के हवाले से 25 स्थलों की पहचान और दस नए स्थल जोड़ने की प्रक्रिया की जानकारी सामने आई। संबंधित जिलों के कलेक्टरों से सत्यापन कराने की बात भी कही गई। सितंबर में परियोजना की रूपरेखा और डीपीआर तैयार करने के लिए वास्तुकारों से प्रस्ताव मांगने की प्रक्रिया शुरू होने की जानकारी सामने आई। अक्टूबर में 31 नए स्थानों के विकास की दिशा में आगे बढ़ने की बात कही जा रही है।
चित्रकूट में कामदगिरि, रामघाट, मंदाकिनी, स्फटिक शिला, गुप्त गोदावरी और अत्रि आश्रम प्रमुख धार्मिक स्थल हैं। प्रस्तावित परिपथ में शरभंग आश्रम, सुतीक्ष्ण आश्रम, सिद्धा पहाड़, रक्सेलवा की सीता रसोई और रामशिला जैसे स्थलों को भी शामिल करने की चर्चा रही है। पन्ना जिले के बृहस्पति कुंड और अगस्त्य आश्रम जैसे स्थानों को जोड़ने की परिकल्पना भी सामने आई है। इन स्थलों को सुविधाजनक मार्ग से जोड़ने पर स्थानीय परिवहन, होटल, भोजनालय, गाइड और हस्तशिल्प कारोबार को लाभ मिल सकता है। लेकिन इसके लिए सड़क के साथ दिशासूचक बोर्ड, स्थल परिचय, पार्किंग, पेयजल और शौचालय जैसी सुविधाएं भी जरूरी हैं।
चित्रकूट-सतना मार्ग पर करीब 1700 करोड़ रुपये का फोर लेन निर्माण शुरू है। निर्माण के दौरान कई हिस्सों में सड़क की खराब स्थिति और धूल यात्रियों के लिए परेशानी का सबब बना हुआ है। अन्य धार्मिक स्थलों तक पहुंचने वाले मार्गों की स्थिति, संकेतकों की कमी और प्रमाणिक जानकारी का अभाव बाहरी पर्यटकों के लिए परेशानी पैदा करता है। कई स्थल स्थानीय लोगों तक सीमित रह गए हैं। जबकि बेहतर मार्गदर्शन से इन्हें व्यापक धार्मिक पर्यटन से जोड़ा जा सकता है।
राम वन गमन पथ को उपयोगी बनाने के लिए सरकार को छह बुनियादी व्यवस्थाओं पर ध्यान देना होगा।
मार्गदर्शन: प्रत्येक स्थल तक दूरी और दिशा बताने वाले स्पष्ट संकेतक।
प्रामाणिक जानकारी: धार्मिक महत्व, स्थानीय मान्यता और शोध आधारित तथ्यों का अलग-अलग उल्लेख।
यात्री सुविधाएं: पार्किंग, पेयजल, शौचालय और जरूरत के अनुसार ठहरने की व्यवस्था।
डिजिटल नक्शा: सभी स्थलों, सड़क मार्गों, दूरी और संपर्क की जानकारी वाला आधिकारिक पोर्टल।
स्थानीय रोजगार: गाइड, परिवहन, भोजन और होमस्टे कारोबार को जोड़ना।
पर्यावरण संरक्षण: जंगलों, पहाड़ियों और नदियों के आसपास प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा।
1- अंतिम मार्ग और स्थलों की सूची क्या है? कितने जिले, कितने स्थल और कितनी लंबाई परियोजना में शामिल है?
2- अब तक कितना पैसा स्वीकृत, जारी और खर्च हुआ? शुरुआती सर्वेक्षण से लेकर डीपीआर और न्यास गठन तक का समेकित ब्योरा सार्वजनिक हो।
3- करीब 160 करोड़ रुपये के कार्यों की स्थिति क्या है? किन स्थलों पर काम चल रहा है, कितने पूरे हुए और श्रद्धालुओं को क्या सुविधाएं मिलीं?
4- न्यास की नियमित समीक्षा क्यों नहीं हुई, बैठकों और तय लक्ष्यों की प्रगति सार्वजनिक कर जवाबदेही सुनिश्चित की जाए।
5- श्रद्धालुओं को पूरा मार्ग कब मिलेगा, स्थलों के चयन, डीपीआर, निर्माण और यात्री सुविधाओं के लिए चरणवार समयसीमा घोषित हो।